लड़ाई-झगड़ा+धक्का-मुक्की+छीना-झपटी+उगाही = साउथ कनपुरिया पत्रकारिता

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कहने को तो कानपुर महान पत्रकार अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी जी का शहर है. ऐसा नहीं की उनके बाद ये परम्परा पूरी तरह से विलुप्त हो गयी. देश की राजनीति और पत्रकारिता  जगत में तमाम बड़े नाम कानपुर कि धरती पर ही पले-बढे. लेकिन अब इसमें बाजार की जरूरतें और महंगाई की मार के कारण सारी “लैमारी” और “लम्पटई” आ गयी है.

पत्रकारिता थाना और पुलिस चौकी स्तर पर उतर आई है. प्रत्येक पुलिस थाने में अब ऐसे चैनलों और अखबारों के पत्रकारों का डेरा रहता है जो शायद ही आम जन-मानस को पढ़ने व देखने को मिलते हों. पर अब इस सबसे कोई मतलब रहा नहीं. मोबाइल चोरी की रिपोर्ट लिखाने से लेकर बड़ी-बड़ी घटनाओं की पैरवी और पैरोकारी यही सब करते हैं. यानी खुले शब्दों में आयोजित और प्रायोजित ख़बरों के बारे में चर्चा और बहस के बाद आम जनता को घटनाओं के बारे में जानकारी मिल पाती है.

रात बारह के बाद जब प्रिंट मीडिया की रिपोर्टिंग बंद हो जाती है तब रात के रखवाले–पुलिस, अपराधी और गुमनाम इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के पत्रकार कहलाने वाले प्रकट होते हैं. वैसे भी इस समय के जुर्म की कहानियां आम चर्चा नहीं बन पाती, जब तक बहुत बड़ी खबर न हो. बड़े समाचार-पत्रों के पत्रकारों के लिए इस समय ये संवाद-सूत्र से ज्यादा कुछ नहीं होते. राष्ट्रीय चैनलों की आईडी हाथ में लिए ये किसी सुनामी से कम नहीं होते. मुझे हाल में एक बड़े और नए नर्सिंग होम के संचालक डॉक्टर ने बताया कि उसके द्वारा जैसे ही इस नर्सिंग होम की शुरुआत की गयी, कुछ दिनों बाद तमाम सारे चैनलों की आईडी सामने रखकर कहा जाने लगा कि आपकी शिकायत आई है. उन्होंने कहा कि मैं शिकायतों की जिम्मेदारी लेता हूँ और जो सवाल-जवाब सरकार करेगी उसका यथासंभव जवाब दूंगा. आखिर में वे सभी महीने और हफ्तावारी पर उतारू हो गए.

इस दक्षिण कानपुर की इस बीमारी से सभी नर्सिंग होम वाले दुखी हैं. कुछ प्रसन्न भी हैं इनको पालकर बाकियों को डंडा कराने का मजा लेते हैं. साथ ही इनको साधकर जुर्म पर पर्दा डालने में मदद मिलती है. सारे फर्जी सेक्सोलाजिस्ट कहलाने वाले कथित डाक्टरों और तंत्र-मन्त्र वाले बाबा भी इसी दक्षिण कानपुर में ही पाए जाते हैं. इनके लोकल चैनलों में चलने वाले विज्ञापन से इनका भी धंधा चोखा रहता है. इस तरह पाप की नगरी बन गयी है कानपुर दक्षिण की बस्ती. नेता अपराधी और अपराधी बने नेता और नेता बने अपराधी सभी इनके संरक्षक हैं. इस क्षेत्र की पुलिस पर इनका गहरा दबाव है. पुलिस इनकी धमाचौकड़ी से परेशान है पर कोई विकल्प नहीं है. ये इतना कड़ा माहौल बना कर रखते हैं कि पुलिस में दहशत रहती है.

ऐसी ही एक घटना विगत रात घटी जिसकी गुहार पुलिस कहाँ लगाये? : हुआ यूं कि बर्रा थाने के दो सिपाहियों के साथ बैठकर कभी ब्रह्मनगर से निकलने वाले एक गुमनाम से अखबार में हाकर रहे इलेक्ट्रानिक मीडिया के आज के माफिया ने अपने चिंटुओं के साथ बैठकर शराब पी. इस “त्रिपाठी” में सारे राक्षसी गुण हैं. लड़कीबाजी के शौकीन यह महोदय किसी नए नेशनल चैनल के संवाद-सूत्र यानी स्ट्रिंगर “शर्मा” के साथ थे. दोनों ने शराब पीने बाद पुलिस के दोनों सिपाहियों के सोने का इंतज़ार किया. शराब पीने में झगड़ा हो ही चुका था. अब बदला भी तो लेना था. वो भी ऐसा-वैसा नहीं. पूरी पत्रकारिता भी दिखानी थी. ऎसी व्यवस्था करनी थी कि अब दूसरे पुलिस के सिपाही और दरोगा घर में ही शराब, लड़की और गाड़ी और गाड़ियों एवं मोबाइलों का खर्चा दे जाएँ. चौराहे में पीना अब ठीक नहीं लगता, कारण अब स्तर बढ़ गया है. उन दोनों के सोने के बाद अन्य चैनलों के कैमरामैन बुलाकर बाकायदा वीडियो बनाया गया कि ये ड्यूटी के दौरान नशे में हैं, नेम-प्लेट नहीं है और पत्रकारों को मारने के लिए इन्हों ने राइफल लोड की. इस पूरे खेल में गाली-गलौज, धक्का-मुक्की और मार-पीट की स्थितियां भी क्रियेट की गयीं. वीडियो बनाने में चूक ये हुयी कि ये अनकट मेरे पास भी आ गया. जिस में सारा खेल उजागर हो गया. ये वीडियो कहीं भी किसी चैनल में नहीं चला. किसी भी अखबार में ये घटनाक्रम नहीं छापा गया. सुबह वो दोनों सिपाही निलंबित कर दिए गए. लेकिन सवाल उतना ही गंभीर है कि उन गिद्धों को क्या सज़ा मुकर्रर की जायेगी जिनका दोष इसमें बहुत संगीन है? सरकारी सेवा में तैनात सिपाहियों के साथ नशेबाजी करना और मार-पीट और धक्का-मुक्की करने की धाराएं क्या होती हैं? उस वीडियो का एक भाग इस खबर के साथ है, जिसे देखकर सारा खुलासा होता है.

वीडियो यहां देखें

ईश्वर भी इन और ऐसे शैतानों को बनाकर पछताता होगा. ऐसे ही एक महान पत्रकार की लाश उसकी कार में ही कुछ वर्षों पहले रतनलाल नगर में मिली थी. उसका दमन-चक्र दक्षिण के चार थानों में बहुत बड़े स्तर पर था. लड़कियों को भगाने में वो माहिर था. ऎसी ही एक लड़की ने रोज-रोज के शोषण से आजिज आकार उसकी हत्‍या करवा दी थी. इनका दोनों के आतंक  और दमन का स्तर अगर इसी तरह बढ़ता रहा तो संभव है कि किसी दिन किसी पुलिसिया गोली या साजिश का शिकार होने में देर नहीं लगेगी. पुलिस और सरकार से खिलवाड़ “विनाश काले विपरीत बुद्धि” ही कही जानी चाहिए. अन्यथा फाइलें खुलने और बनने में देर नहीं लगती है. संरक्षक भी विपरीत स्थितियों में पल्ला झाड़ने में देर नहीं लगाते हैं.

लेखक अरविंद त्रिपाठी कानपुर में पत्रकार हैं तथा चौथी दुनिया से जुड़े हुए हैं.


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