राजनीति जनता की चीज़ है, किसी हरम की नहीं

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जिस भी किसी इंसान को यह भ्रम होता है कि उसमें कुछ कर सकने की क्षमता है वह राजनीति का हिस्सा बनना चाहता है. मैं भी इस रोग से पीड़ित हूँ और मुझे यह बात हमेशा दिमाग में रहती है कि यद्यपि पुलिस विभाग की नौकरी किसी भी तरह से खराब नहीं हैं, आईपीएस की नौकरी तो बहुत अच्छी मानी जाती है पर फिर भी मेरे अंदर कुछ और अधिक करने की इच्छा और अभिलाषा लगातार मंडराती रहती है, जिसके लिए मुझे ऐसा ज्ञात होता है कि शायद मुझे आईपीएस की नौकरी से बड़े प्लेटफोर्म का हिस्सा बनना चहिये.

अतः जितनी जल्दी मुझे उचित अवसर जान पड़ेगा, मैं राजनीति का हिस्सा जरूर बनूँगा. पर यहाँ मेरा उद्देश्य अपनी राजनैतिक इच्छा (जिसे हम अपने देश में बहुधा राजनैतिक महत्वाकांक्षा कहते हुए कुछ खराब निगाह से देखते हैं) को जाहिर करना नहीं है. वह तो जब भी राजनीति भी जाऊँगा, वह स्वयं ही सम्बंधित इष्ट-मित्रों को मालूम हो जाएगा. यहाँ मेरा मुख्य उद्देश्य मेरी इस बात को सन्दर्भ के रूप में लेते हुए भारतीय राजनीति पर अकादमिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करते हुए इस सम्बन्ध में अपने कुछ महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करना है.

मैं सबसे पहली बात यह कहना चाहूँगा कि जहां तक मेरी खुद की निगाह जाती है मैं किसी भी देश की समस्त गतिविधियों के केन्द्र में राजनीति को पाता हूँ. चाहे वह कोई सेवा हो अथवा व्यवसाय या शिक्षा या जीवन का कोई अन्य क्षेत्र, इन सबों के केन्द्र और धुरी में देश की शासन व्यवस्था होती है. इसी शासन व्यवस्था से ही किसी भी देश की सभी नीतियों का निर्धारण और समस्त गतिविधियों का संचालन होता है. अर्थ नीति, व्यापार नीति, कर नीति, शिक्षा नीति, कृषि नीति, खेल नीति-आप जिस क्षेत्र का नाम लें, उस क्षेत्र में देश की शासन प्रणाली का सीधा दखल होता है और इस शासन प्रणाली के शीर्ष पर राजनैतिक लोग होते हैं. मेरी निगाह में यह स्थिति आज ज्यादातर देशों में है- केवल उन कुछ देशों को छोड़ कर जहां आज भी राजशाही या किसी प्रकार की सामंतशाही है.

यदि हम इस शासन प्रणाली की महत्ता और अनिवार्यता को स्वीकार करते हैं तो हमें किसी भी देश के सम्यक संचालन और विकास में राजनीति की केन्द्रीय भूमिका को स्वीकार करना ही चाहिए. ऐसा नहीं करने का अर्थ अपने आप से ईमानदार नहीं होना हुआ. फिर यदि राजनीति देश के केन्द्र में हुई तो उसके जीवंत पात्रों के रूप में राजनैतिक लोग स्वतः ही देश की समस्त गतिविधियों की धुरी में आ गए. यह एक सच्चाई भी है पर उस समय कुछ तकलीफ जरूर होती है जब हमारे देश का मध्यवर्ग यह बात भली-भाँति जानने के बाद भी जीवन में राजनीति की केन्द्रीय भूमिका को बाह्य तौर पर अस्वीकार करता दिखता है. यदि ऐसा नहीं है तो क्या कारण है कि जब किसी मध्यवर्गीय परिवार का लड़का यह कहता है कि उसे बड़ा हो कर राजनेता बनना है तो उसके घर वाले चिढ़ से जाते हैं? हमें इस बात पर विशेष रूप से चिंतन करना होगा और इस तथ्य को खुले रूप में स्वीकार करते हुए अपने घरों के बच्चों को राजनीति के भागीदारी करने के लिए स्वस्थ मन के साथ प्रोत्साहित करना होगा. यदि राजनीति महत्वपूर्ण कार्य है तो मेरे परिवार का बच्चा या बच्ची भी उसमे शिरकत करे, ऐसी भावना हम सबों को लानी ही होगी.

इसके साथ कई ऐसी बातें है जहां हमारी राजनीतिक संस्कृति में भी व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है. उसमे सबसे पहली बात है सच्चाई और ईमानदारी की. यहाँ जब मैं सच्चाई और ईमानदारी की बात कर रहा हूँ तो मेरा वह अर्थ कदापि नहीं जिसमे आम तौर पर कई नेता आज इसका प्रयोग कर रहे हैं. वे इन शब्दों को उन भारी-भरकम और खूबसूरत शब्दों की तरह प्रयोग करते हैं जिसका उनके लिए मात्र बोलने तक ही मतलब होता है, उसके आगे नहीं. मैं ईमानदारी और सच्चाई से यह समझ रहा हूँ कि राजनीति में रत लोग बड़ी-बड़ी बातें ना करें, गलत ख्वाब नहीं दिखाएँ, झूठे सपने ना लाएं, यानि वह सब ना करें जिसे आज के समय हम लफ्फाजी और फर्जीपना कहते हैं. राजनीति में जुटा व्यक्ति अपने सामने वाले को अपने घर के आदमी की तरह समझे और उससे वही कहे जिसके बारे में वह ईमानदारी से यकीन करता है. यानि कि सच बोले, झूठ का व्यापार नहीं खड़ा करे. सपनों को देखते-देखते हमें कई साल गुजार गए और अब समय आ गया है कि जनता और राजनीतिज्ञों का रिश्ता खुलेपन और ईमानदारी पर आधारित हो. राजनीतिज्ञ उतना ही कहें जितना वे कर सकते हैं और जनता भी उनसे खुल कर इस विषय में पूछे तथा पूछ सके. असली ईमानदारी और सच्चाई यही है कि आदमी अपने आप के प्रति ईमानदार और सच्चा हो. इस बात की जरूरत हमें भारतीय राजनीति से अधिक शायद कहीं नहीं दिखती जान रही. यह भी सच है कि अब शायद जनता भी रटी-रटाई और अच्छी लगने वाली भारी-भरकम बातों से ऊबने लगी है.

दूसरी बात यह कि ईमानदारी का यह भी तकाजा हो कि आदमी खुल कर यह कहे कि मैं राजनीति में हूँ क्योंकि मेरी राजनैतिक महत्वाकांक्षा है. आखिर किसी को पागल कुत्ता तो नहीं काटे होता कि वह घर-बार छोड़ कर गलियों और सड़कों में भटके. यदि कोई साधू, संत और संन्यासी होगा तो कहीं बैठ कर धुनी रमायेगा, गली-कूचे में क्यों मंडराएगा? इसीलिए यदि कोई राजनीति में आया है तो उसकी कुछ चाहते हैं और उसे यह बात खुल कर कहनी चाहिए. अब यदि कोई पैसा बनाये या पद का दुरुपयोग करके अवैध कृत्य करने ही यहाँ आया है उसकी तो अलग बात है, वह बेचारा कैसे यह सब कह पायेगा? क्या जनता उसे मार नहीं डालेगी? पर कम से कम वे शरीफ लोग, जो बाकी ईमानदारी से, केवल अपनी प्रतिष्ठा और इज्जत के लिए, अपने नाम और शोहरत के लिए राजनीति में आये हैं वे भी तो इतना कहें कि हाँ, मेरी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. यदि अमेरिका में एक अज्ञात व्यक्ति खुल कर सामने आ सकते हैं और कह सकते हैं- “एस, वी कैन” तथा संसार के सबसे ताकतवर पद के लिए खुलेआम अपना दावा ठोंक सकते हैं तो हमारे देश में क्यों नहीं?

मुझे सचमुच बड़ी तकलीफ और कोफ़्त होती है जब मैं बड़े बुजुर्ग और सम्मानित नेताओं को विभिन्न पार्टियों में उनके मुखिया या नेता के सामने अजीब स्थिति में देखता हूँ. उस समय भी बड़ा अजीब लगता है जब यदि उनसे किसी ने पूछ लिया कि आप कौन सा पद पा रहे हैं तो वे सेवा भावना और देश सेवा की बातें करने लगते हैं. वे सीधे क्यों नहीं कह सकते कि उनमें फलां कुव्वत है, उनके अंदर यह काबिलियत है और इसीलिए वे अमुक पद के लिए दावेदारी कर रहे हैं. वह पद उन्हें मिले या नहीं मिले, यह तो कई बातों पर निर्भर होगा लेकिन सार्वजनिक तौर पर पद का नाम सुनते सांप सूंघ जाने और घुप्प अँधेरे में पद के लिए हर संभावित तिकड़म लगाने की कार्यसंस्कृति से हमें शायद अब उबरना होगा.

अगली बात यह कि जैसे ही एक आदमी किसी पार्टी का सदस्य हुआ उसे बंधुआ मजदूर का खिताब मिल गया. पार्टी में गलत हो, सही हो उसे चुप रहना है. यदि कुछ कह दिया तो अनुशासनहीनता, यानि पार्टी डिसिप्लिन यानि अनुशासनात्मक कार्रवाई, यानि दुनिया भर की नौटंकी. मैं पूछता हूँ कि कोई भी व्यक्ति इंसान पहले है या पार्टी कार्यकर्ता? जब कोई संस्था या व्यक्ति पूर्णतया सही नहीं हो सकती तो एक राजनैतिक कार्यकर्ता को अपनी बात खुल कर कहने का हको-अख्तियार क्यों ना रहे? यह बात हर पार्टी कार्यकर्ता के लिए आवश्यक प्रतीत होती है और पूरे देश के लिए भी क्योंकि तभी देश में वास्तविक लोकतंत्र का विकास हो सकता है. डिसिप्लिन के नाम पर बंधुआ मजदूरी की मानसिकता से हमें निकलना चाहिए. यदि लगता है कि पार्टी में किसी ने गलत किया या पार्टी की कोई बात गलत लगी तो उसे सार्वजनिक तौर पर प्रकट किया जाना ही देश और समाज के लिए उचित होगा. मेरी दृष्टि में पारदर्शिता की जो बात शासन और प्रशासन में की जाती है उसकी उतनी ही जरूरत आज देश की राजनीतिक क्रियाओं में भी है. क्या कोई भी न्याय यह कहेगा कि कोई राजनीतिक व्यक्ति अनुशासन के नाम पर इसीलिए चुप हो जाये ताकि पार्टी का नुकसान नहीं हो. क्या पार्टी देश से बढ़ कर है? इसी तरह क्या पार्टी मनुष्य और मनुष्यता से बढ़ कर है?

मैं जानता हूँ कि मेरी बातें कई सारे लोगों को आज हास्यास्पद अथवा मुंगेरीलाल के हसीन सपने या बेवकूफी भरी लगें. ऐसा खास कर इसीलिए भी लगेगा कि जो बात मैं कह रहा हूँ हम अमूनन वह चीज़ देखने के आदी नहीं हैं. हम तो यही देखते हैं कि बड़ी चुप्पी के साथ, बड़ी चतुराई से, बड़ी गहराई में तमाम राजनैतिक निर्णय लिए जाते हैं और राजनीति में लगे लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं को बड़े सलीके के साथ गहरे-खाने समेटे चाल पर चाल चलते दिख जाते हैं. यदि किसी ने कह दिया कि उसे कोई पद चाहिए तो उसे तुरंत सत्तालोलुप करार दिया गया. लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि इस कार्य संस्कृति में शीघ्र ही व्यापक परिवर्तन आयेंगे क्योंकि अब नयी पीढ़ी इस तरह के छद्म के स्थान पर सच्चाई और खुलापन चाह रही है. यही वक्त की जरूरत भी है और देश तथा समाज के लिए उपयोगी भी.

मैं भी अपनी सुविधा के अनुसार राजनीति में शरीक होऊंगा और खुल कर अपनी राजनैतिक इच्छाओं का इजहार करूँगा. मैं यह मानता हूँ कि यदि किसी व्यक्ति को समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन का संवाहक बनना है तो उसके लिए उसे राजनीति का अंग रहना होगा. साथ ही उसे मुख्यधारा की राजनीति में शरीक होना होगा. उसे पद भी पाने होंगे क्योंकि तभी तो वह अपनी कही गयी बातों को मूर्त रूप दे सकेगा. मैं इन में से प्रत्येक काम करूँगा और जिस लायक मैं खुद को समझूंगा अपनी दावेदारी भी प्रस्तुत करूँगा. यह दीगर बात है कि हो सकता है दूसरे लोग मुझे किसी छोटे से पद के लायक तक नहीं समझें. लेकिन मैं अपनी यह दावेदारी छिपे बंद कमरों में नहीं, दिन के उजालों में करूँगा. साथ ही मैं किसी पार्टी में रहते हुए भी अपने आप को पार्टी का ख़रीदा हुआ गुलाम नहीं, पहले एक स्वतंत्र इंसान समझूंगा और जो बात सही लगे, उसे देश और समाज के हित में खुल कर प्रकट करूँगा. हाँ, इसका यह भी अर्थ होता है कि मैं जो बात कहूँ वह किसी राग-द्वेष या व्यक्तिगत हित-सिद्धि से जुड़ा ना हो कर वास्तव में मेरे मन की आवाज़ हो.

भगवान ने एक जीवन दिया है और मैं इसके बचे हुए समय में यह सब पूरे मन से करने की कोशिश करूँगा पर समाज के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं कि अमिताभ जैसा एक अदना आदमी क्या कर रहा है अथवा करने वाला है, समाज के लिए तो यह बात मायने रखेगी कि अँधेरे बंद कोठरियों में दबे-छिपे राजनैतिक निर्णय दिन का उजास पा सकें और वास्तविक पारदर्शिता तथा लोकतंत्र की कसौटी पर खरे उतर सकें. राजनीति जनता की चीज़ है किसी हरम की नहीं, जहां सारी बाते छिप के हुआ करें.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.


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