टीआरपी का खेल : ड्रामा पास, पत्रकारिता फेल

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हिंदी खबरिया चैनलों का एक ऐसा कुरूप सच, जिसने एक टीवी रिपोर्टर को उसका 'सच' दिखा दिया और उसने पेशा ही बदल डाला..। दो दिन से मेरा ब्लडप्रेशर बढ़ा हुआ था। कारण था मेरे 'भाग्यविधाता' इनपुट हेड की अमृतवाणी, जो मेरे कानों में गूंज रही थी, 'अरे कंपनी पर बोझ.. पत्रकार बनने को डॉक्टर ने कहा था क्या? खबरें तान नहीं सकते, तो जाकर कहीं चाट-पकौड़ी का ठेला-खोमचा क्यों नहीं लगाते?

खबरें नहीं हैं तो पैदा करो.. वो भी झन्नाटेदार.. वरना तुम जैसे छत्तीस खड़े हैं रिपोर्टर बनने, वो भी कम सैलरी पर..।' टूं..टूं..टूं.. मोबाइल के साथ मेरी भी लाइन डिस्कनेक्ट हो गई। इनपुट हेड ने महीने भर पहले ही ज्वाइन किया था। शाम हो चुकी थी..। धमकी का एक दिन गुजरने वाला था, पर कोई झन्नाटेदार खबर नहीं मिली। अब मेरे पास आखिरी रास्ता प्रभु की प्रार्थना का था- 'हे प्रभु, मदद करो.. झन्नाटेदार खबर दिला दो..।' तभी मेरा मोबाइल बजा- 'अरे दादा.. कहां हैं? जल्दी आइए.. ड्रामा तैयार है, आपका ही इंतजार है। जल्दी से न्यू कॉलोनी डीएलडब्ल्यू आइए।'

मेरे वहां पहुंचने भर की देर थी कि ड्रामा शुरू..। इससे पहले कुछ समझता, चट.. चट.. ताड़.. चटाक.. चांटों-तमाचों के साथ गालियों की बौछार शुरू..। कैमरामैन कैमरा रोल कर चुका था। एक बाइस-तेईस बरस की लड़की अच्छे-भले घर के लड़के पर बेतहाशा टूटी हुई थी और लड़का चुपचाप पिट रहा था। पांच-छह मुस्तंडे टाइप लड़के उसे घेरे थे, ताकि वह भाग न निकले।

मालूम चला कि लड़के ने अपनी इस प्रेमिका से किनारा कर दो दिन पहले ही कहीं और शादी कर ली थी। शादी की बात किसी तरह प्रेमिका को मालूम चल गई। अब इस लड़के की फूटी किस्मत कहें या लालच.. लड़की की लच्छेदार बातों में आकर उससे मिलने आ पहुंचा और अपनी दुर्गति करा बैठा। लड़के के पिता बैंक अधिकारी थे। पुलिस आ गई। लड़की की रिपोर्ट और मेडिकल हुआ और लड़का हवालात में..। उसकी नई-नवेली दुल्हन सेज पर उसके इंतजार में।

इससे पहले अन्य पत्रकार खबर को सूंघते हुए वहां पहुंचते, ड्रामा खत्म हो चुका था। अब मैं राजा था, क्योंकि ड्रामे के एक्सक्लूसिव विजुअल्स मेरे पास ही थे। मैंने नंबर मिलाया इनपुट हेड को। 'क्यों भई, खबर मिल गई क्या?' उन्होंने व्यंग्य मारा। 'हां सर, एकदम एक्सक्लूसिव है। विजुअल्स सिर्फ मेरे पास हैं।'

'अच्छा.. लड़का-लड़की देखने में कैसे हैं? मेरा मतलब प्रोफाइल कैसा है उनका?'

'सर, हाईप्रोफाइल केस है, लड़के के पिता बैंक अधिकारी हैं।'

'ठीक है। जल्दी से भेज दो और सुनो, स्क्रिप्ट मेरे मेल आईडी पर मेल कर दो.. कल के डे-प्लान में डलवा देता हूं।'

'सर, एक रिक्वेस्ट थी.. दोनों का चेहरा मोजैक करवा दीजिएगा.. बेकार में बदनामी होगी।'

'हां-हां, इतनी अक्ल है मेरे पास.. चल तू जल्दी से खबर भेज।' ..और फोन कट गया।

सुबह के आठ बज चुके थे। मोबाइल के रिंगटोन से नींद टूटी-

'अरे, अपनी खबर देखी टीवी पर?' उधर मेरा दोस्त था।

मैंने झट से टीवी ऑन किया। मोटे अक्षरों में एक्सक्लूसिव लिखा था, पर विजुअल्स देखकर होश उड़ गए। लड़के को बेतहाशा पिटते बार-बार दिखाया जा रहा था। पीछे से एंकर चीख रहा था- 'देखिए इस हवस के पुजारी को, प्यार किसी से, शादी किसी और से.. इसने अब तक न जाने कितनी मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद किया होगा..।' स्क्रीन पर लड़की का चेहरा तो धुंधला था, पर लड़के का नहीं।

दस बजते-बजते इनपुट हेड का फोन आ गया- 'तुम तो छा गए.. टीआरपी नंबर एक पर पहुंच गई है। लड़के के घर, परिवार वालों के विजुअल्स और बाइट, हो सके तो दुल्हन के विजुअल्स भी उठा लेना.. स्पेशल खेलना है आज इस खबर पर..।' उनकी आवाज में शहद टपक रहा था।

'सर, मैंने आपसे कहा था कि चेहरा मोजैक करवा दीजिएगा, पर..।'

'अरे, करवा तो दिया था लड़की का..।'

'और लड़के का?'

'अरे, गोली मार उसे। डबल मजे करने के जुगाड़ में था। इन चिरकुटों की क्या इज्जात, क्या बेइज्जाती.. तू टेंशन मत ले.. बस, विजुअल्स भेज जल्दी से..।'

मैं भारी मन से लड़के के घर पहुंचा। वहां भीड़ लगी थी। मैंने सुमित को पास आने का इशारा किया। वह क्षेत्रीय न्यूज चैनल का पत्रकार था।

'यहां क्या कर रहे हो?' मैंने पूछा।

'बाइट लेने आया था। लेकिन कोई है ही नहीं बाइट देने वाला।'

'मतलब?' मैंने पूछा।

'आज सुबह जैसे ही आपके चैनल पर खबर चली, लड़के के पिता को हार्ट अटैक आ गया। वह अस्पताल में भर्ती हैं। बहन की शादी टूट गई। मां बेहोश पड़ी है। बहन पागल सी हो गई है।'

'और उसकी दुल्हन?' मैंने हड़बड़ा कर पूछा।

'उसने खुद को कमरे में बंद कर रखा है।'

मेरे पांव जवाब दे चुके थे। किसी तरह अपने को समेट घसीट कर घर लाया। टीवी पर अभी भी खबर 'तनी' थी। एक मनोचिकित्सक इसे आनुवांशिक मानसिक विकृति साबित करने पर तुले थे, वहीं पेज थ्री की एक सोशलाइट महिला इस आचरण को 'बलात्कार' से कम मानने को तैयार नहीं थीं।

तभी मोबाइल फिर बजा। इनपुट हेड का ही था। मेरा अंगूठा अपने आप लाल बटन पर चला गया और मोबाइल ऑफ हो गया। शायद हेड को मेरे इस्तीफे का फैक्स मिल गया था। वह द्वंद्व आज भी जारी है..। गुनाहगार कौन? मैं..वह लड़का.. या फिर इनपुट हेड..?

वाराणसी के रहने वाले जॉय बनर्जी का यह लेख जागरण में छप चुका है वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.


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Comments (6)Add Comment
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written by ram gopal , October 09, 2011
ye bhasa to sayad mere gyan ke hisab se anuranjan jha ki hai
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written by tarkrsh kumar ojha , October 07, 2011
kamal ka anubhav bayan kiya hai joy ji aap ne, iske liye aap ko bahut badhai
tarkesh kumar ojha
kharagpur (west bengal)
contact__ 09434453934
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written by suresh mishra, October 04, 2011
काबिले तारीफ़ है लेख भाई , टी.वी. पत्रकार के जीवन के हर पल की घटना है लेख में , ज्वाय ! आपने अपने को मुक्त कर लिया / लेकिन हम लोग आज भी इस खेल में शामिल हैं / मेरी नजर में दुनिया के सबसे बड़े गुनहगार पत्रकार ही हैं / उसमे भी टी.वी. पत्रकारों का तो पूछना ही क्या / सावधान रहना मेरे देशवासियों ! इस समय देश को चलाने का काम चोर टाईप के मिडिया वाले कर रहे हैं / शाबाश ! ज्वाय भाई / चलाते रहो हकीकत के लिए अपनी कलम !

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written by manish kumar buxar, October 04, 2011
aise hi chirkut input our out put head to khabro ka sarvnash kar dete hai,bas inko apne aakawo ko kush karne ke chchakr me lage rahte,
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written by आदिल अज़ीज़, October 04, 2011
दिल देह्ल देनी वाली इस कहानी ने मुझे शर्म सार कर दिया क्यूकि मै भि एक पत्र्कर जो हु लेकिन आप्ने पत्र्कारिता चोड कर एक मिसाल कायम कि है आप्को सलाम ॥
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written by मोहन, October 04, 2011
हमें लगता है इस द्धंद्ध से हर रिपोर्टर गुजरता है लेकिन मजबूरी में ही वह खबर के मूल रुप से समझौता करता है। और जब करता है तो यकीन मानिये उसके पाव भी आप की तरह जबाब दे जाते है लेकिन सच उसके सामने खड़ा होता और वह सच होता है अपने परिवार की जिम्मेदारी उससे अगर मुंङ मोड़ता है समाज उसे न जाने कई उपमाओं से नवाजता है अगर सच से इतर होता है तो उसकी आत्मा उसे रोकती है लेकिन क्या करे न जाने ऐसे द्धंद्ध से रोज कितने दो चार होते है। लेकिन इसी में कुछ सच कर ले जाने उनके बेबसी को थोड़ा कम कर देता है। लेकिन द्धंद्ध तो वाकई में चलता है और न जाने कब तक चलने के लिए मजबूर करता रहेगा। इसमें केवल दोष मीडिया हाउस का नही बल्कि उन लोगों का है जो ऐसी खबरो को नजर चुरा कर ही सही लेकिन देखते जरुर है और टीआरपी का लेखा जोखा अव्वल बना देता है। लेकिन थोड़ा सा ही सच सही लेकिन कुछ तो आप कर ही सकते है। इस तरह से मुख मोड़ना भी तो अनुचित ही कहा जायेगा । पानी में रहकर मगरमछ पर अंकुश लगे तो ठीक है वरना पानी के बाहर भाग जाने का मतलब हम परिस्थितियों से भाग रहे है । और यह शोभा नही देता । हमें उम्मीद है कि नई पारी में पुरे जोश के साथ सच के लिए दो कदम चलेगे । और थोपे गये खबरो को कुछ तो कम करेगे। मुझे तो कम से कम यही उम्मीद है।

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