गूंजा बैंड.. बाजा... और निकल पड़ा खबरों का जनाजा

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जब आप टेलीविजन ऑन करते हैं तो स्क्रीन पर चमकता है नजरबाग इलाके के मशहूर दर्जी भारत टेलर्स का 'भारत न्यूज', आजाद ब्रास बैंड का 'आजाद भारत न्यूज' और तालकटोरा के प्रेम स्टूडियो का 'क्राइम नजर'। हंसने या चौंकने की जरूरत नहीं है। ये राजधानी के 'मीडिया मुगल' हैं, जो केबल टीवी पर अपने खबरिया चैनल चलाते हैं।

राज्य में केबल के धंधे ने जैसे-जैसे पांव पसारे, हर गली-मुहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह स्थानीय समाचार चैनल भी खुलते चले गए। लखनऊ में ही ऐसे दर्जन भर से ज्यादा चैनलों के प्रतिनिधि खबरिया बुलेटिन के लिए मसाले की तलाश में रोज सड़कों पर नजर आते हैं। मजे की बात है कि राज्य के दूर-दराज के जिलों मसलन बहराइच में भी ऐसे कई चैनल फल-फूल रहे हैं।

इनमें कई चैनल तो राष्ट्ररीय खबरिया चैनलों से भी ज्यादा लोकप्रिय हैं और इस लोकप्रियता के लिए इन्हें रकम भी ज्यादा खर्च नहीं करनी पड़ती। बस... केबल ऑपरेटर से गठजोड़, कुछ हजार रुपये में वीडियो कैमरे का जुगाड़ और बन गए अपने चैनल के मालिक। यह बात अलग है कि इनमें किसी के भी पास टिकाऊ कारोबारी मॉडल नहीं है। तकरीबन सभी चैनल कमाई के लिए स्थानीय दुकानों, स्कूलों या छुटभैये नेताओं के विज्ञापन का सहारा तकते हैं।

लखनऊ ही नहीं बल्कि प्रदेश में पहला स्थानीय समाचार चैनल 'सिटी न्यूज' शुरू करने वाले नरेंद वर्मा कहते हैं, 'इस धंधे में लोग बढ़ते गए और विज्ञापन घटते गए। बड़े प्रतिष्ठान ही विज्ञापन पर खर्च कर सकते हैं, उन्हें भी नामी क्षेत्रीय टीवी चैनल पकड़ लेते हैं। स्थानीय खबरिया चैनलों को 1,000-2,000 रुपये के विज्ञापन ही मिल पाते हैं।' 1997 में शुरू हुआ सिटी न्यूज बंद हो चुका है और वर्मा के मुताबिक डीटीएच की वजह से केबल ऑपरेटरों का धंधा सिमट रहा है, इसलिए इन चैनलों के लिए भी मुश्किल भरा वक्त है। मनोरंजन कर विभाग भी मानता है कि आधा बाजार अब डीटीएच के पास ही है।

हालांकि केबल टीवी विज्ञापन देने वाले स्थानीय साड़ी व्यवसायी करण कपूर बताते हैं कि मध्यम और निम्न वर्ग के लोग अब भी केबल ही देखते हैं और शाम को आने वाले स्थानीय खबरिया बुलेटिन भी खूब देखे जाते हैं। कम लागत में प्रचार तलाशने वालों के लिए ये बड़ा सहारा हैं। किसी वक्त शहर में स्थानीय समाचार चैनल चलाने वाले संजोग वाल्टर अब एक प्रमुख राष्ट्रीय चैनल में काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस धंधे में कोई नियम नहीं है और न ही कोई रोकटोक। इसलिए कैमरा लिए लोग दिन भर फिरते रहते हैं। हां, चुनावों के वक्त उनकी गहमागहमी बढ़ जाती है क्योंकि उस वक्त उन्हें सबसे ज्यादा विज्ञापन हासिल होते हैं। लेकिन यह मौका कई साल में एक बार ही आता है।

उत्तर प्रदेश के सहायक सूचना निदेशक जेड ए सलमानी बताते हैं कि लखनऊ में सबसे बड़े केबल नेटवर्क डेन पर चलने वाला 'न्यूज 18' इकलौता स्थानीय खबरिया चैनल है। बाकी का वजूद न के बराबर है। सलमानी ने बताया कि इनके लिए वाकई में कोई नियम-कायदा नहीं है। हां, अगर कभी कोई चैनल आपत्तिजनक खबर या विज्ञापन दिखाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है। उन्होंने बताया कि हाल में ऐसे केबल वालों से सालाना 2,400 रुपये शुल्क और 100 रुपये प्रति उपभोक्ता शुल्क मांगा गया तो ज्यादातर ने फिल्में या समाचार दिखाना बंद ही कर दिया।

सिद्धार्थ कलहंस का यह लेख बिजनेस स्‍टैंडर्ड में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.


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