मैंने क़सम ली- मैं फासिस्ट राजनीति और उसके कारिंदों के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा

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शेष नारायण सिंहप्रशांत भूषण की पिटाई के बाद इस देश की राजनीति ने करवट नहीं कई, पल्थे खाए हैं. जिन लोगों को अपना मान कर प्रशांत भूषण क्रान्ति लाने चले थे, उन्होंने उनकी विधिवत कुटम्मस की. टीवी पर उनकी हालत देख कर मैं भी डर गया हूँ. जिन लोगों ने प्रशांत जी की दुर्दशा की, वही लोग तो पोर्टलों पर मेरे लेख पढ़कर गालियाँ लिखते हैं.

लिखते हैं कि मेरे जैसे देशद्रोहियों को देश से निकाल दिया जाएगा... मार डाला जाएगा... काट डाला जाएगा.... कुछ ऐसी गालियाँ लिखते हैं जिनका उल्लेख करना असंभव है. मुझे मुगालता था. मैं समझता था कि यह बेचारे किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी में नौकरी करते हैं जिसको हमारी बातें कभी नहीं अच्छी लगीं. उसी पार्टी को खुश करने के लिए इस तरह की बातें लिखी जा रही हैं. मुझे इस बात का बिलकुल अंदाज़ नहीं था कि यह लोग बाकायदा तशरीफ़ लाकर शारीरिक रूप से कष्ट भी दे सकते हैं. प्रशांत भूषण की पिटाई का मेरे ऊपर यह असर हुआ है कि अब मैं फासिस्ट राजनीति के खिलाफ कुछ नहीं लिखूंगा. मैं दहशत में हूँ. यह भाई लोग कभी भी पहुंच सकते हैं और धुनाई कर सकते हैं. मुझे ऐसा इसलिए लगता है कि प्रशांत जी की कुटाई कोई हादसा नहीं था. बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से उन्हें घेरकर लतियाया गया था. यह भी हो सकता है कि जिस टीवी चैनल वाले उनसे बात कर रहे थे, वहां भी इन मारपीट वालों का कोई बंदा रहा हो जिसने पिटाई वाली सेना को एडवांस में खबर कर दी हो.

अब यहाँ यह कहकर कि जिन लोगों ने पिटाई की वे सब आरएसएस के अधीन संगठनों से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं, मैं अपनी शामत नहीं बुलाना चाहता हूँ. लेकिन जिन लोगों को पिटने का डर नहीं है, वे यह बात खुलेआम कह रहे हैं. मेरी हिम्मत तो नहीं है कि मैं लिख सकूं लेकिन बताने वाले बता रहे हैं कि पिटाई करने पहुंचे लोग बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ भी अक्सर फोटो खिंचवाते रहते थे. और उनके बहुत भरोसे के बन्दे थे. श्री राम सेना के कर्नाटक राज्य के अधिपति श्री प्रमोद मुथालिक ने भी कहलवा भेजा है कि प्रशांत भूषण को पीटने वाले लोग उनके अपने बन्दे नहीं थे. उन्हें तो प्रमोद जी ने केवल टेक्नीकल ज्ञान मात्र सिखाया था. वह भी खुद प्रमोद जी का इन योद्धाओं से कुछ लेना देना नहीं था. उनके किसी मातहत अफसर ने दिल्ली की श्रीराम सेना को फ़्रैन्चाइज़ी दी थी जिसकी जानकारी मुथालिक श्री को नहीं थी. भगत सिंह के नाम पर धंधा कर रहे भारतीय जनता युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पूर्व सदस्य का बीजेपी या उसकी किसी सहयोगी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. वह कभी भी बीजेपी में नहीं था क्योंकि अगर वह बीजेपी में कभी भी रहा होता तो उसे अपने पराये की पहचान होती और अपनी ही पार्टी के पूर्व सदस्य के बेटे को सरेआम देश की सबसे बड़ी अदालत के आसपास इतनी बेरहमी से न पीटता. ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आरएसएस के विरोधी लिख रहे हैं लकिन अपनी हिम्मत नहीं है कि मैं यह लिख दूं कि जिन लोगों ने प्रशांत भूषण को पीटा वे आरएसएस या उसके अधीन काम करने वाले किसी संगठन से किसी तरह से सम्बंधित रहे होंगे.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की पिटाई का मैं अपनी पूरी ताक़त से विरोध करता हूँ. उनके बहुत सारे विचारों से सहमत नहीं हुआ जा सकता लेकिन विचारों से असहमत होने पर किसी को पीटना बिकुल गलत है. इसलिए मेरे अलावा जो भी चाहे, उन लोगों की भरपूर भर्त्सना कर सकता है. वैसे सही बात यह है कि उन लोगों की जितनी निन्दा की जाए कम है. पिटाई करने वाले निंदनीय लोग हैं.  जिन लोगों ने "मैं अन्ना हूँ" की टोपी पहनकर नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में टीवी कैमरों को धन्य करने की कोशिश की, उनकी पिटाई करने वालों की भी सभी निंदा कर ही रहे हैं. वह निंदा बिलकुल सही है. लेकिन मैं उन लोगों की कोई निंदा नहीं कर सकता. क्योंकि कई बार मैं भी पटियाला हाउस कोर्ट के बगल वाली पुराना किला रोड से अपने घर जाता हूँ. लेकिन प्रशांत भूषण को भी आरएसएस प्रायोजित किसी आन्दोलन में शामिल होने के पहले यह सोच लेना चाहिए था कि अगर वे अन्ना हजारे के साथ आरएसएस वालों के आन्दोलन का संचालन करने के प्रोजेक्ट में शामिल हो रहे हैं तो उन्हें आरएसएस की हर बात को मानना पड़ेगा.

आरएसएस के कई बड़े नेताओं ने बार बार बताया है कि वे लोग बहुत ही लोकतांत्रिक सोच के लोग हैं, लोगों के विरोध करने के अधिकार को सम्मान देते हैं लेकिन वे यह बात कभी नहीं बर्दाश्त कर सकते कि अपना कोई बंदा उनकी मंज़ूर शुदा राजनीतिक लाइन से हटकर कोई बात कहे. इसका सबसे पहला शिकार प्रो. बलराज मधोक बने थे. किसी ज़माने में वे पार्टी के बहुत बड़े नेता थे. भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे. पं. दीन दयाल उपाध्याय के साथ पार्टी को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन कुछ मंचों पर उन्होंने अपने विचार रख दिए और पार्टी से निकाल दिए गए. यह जो अपने डॉ सुब्रमण्यम स्वामी हैं. बड़े विद्वान हैं. नानाजी देशमुख जैसा बड़ा नेता उनको अमरीका से पकड़ कर जनसंघ में लाया था. १९७४ में उत्तर प्रदेश में जो विधानसभा का चुनाव हुआ था, उसमें इनकी खासी भूमिका थी. बहुत ही सुरुचिपूर्ण पोस्टर बनाए गए थे. आज़ादी के छब्बीस साल के बाद कांग्रेस की नाकामियों को बहुत ही अच्छे तरीके से उभारा गया था लेकिन निकाल दिए गए. केएन गोविन्दाचार्य की बात तो बहुत ही ताज़ा है. उनको राजनीति के दूध और मक्खी वाले चैप्टर के हवाले से सारी बारीकियां समझा दी गयीं. बेचारे आजकल व्यवस्था परिवर्तन की राजनीति के मैदान में फ्रीलांसिंग कर रहे हैं. हाँ, यह लोग प्रशांत भूषण से ज्यादा भाग्यशाली थे क्योंकि इनको टीवी कैमरों के सामने बैठाकर पीटा नहीं गया.

इसलिए प्रशांत भूषण को समझ लेना चाहिए था कि अगर वे आरएसएस वालों से घनिष्ठता जोड़ रहे हैं तो उन्हें बाकी जीवन बहुत आनंद रहेगा, बशर्ते वे संघ की हर बात को अपनी बात कहकर प्रचारित करते रहते. देश के कई बड़े अखबारों के पत्रकारों ने भी आरएसएस की शरण ग्रहण कर ली है. हमेशा मौज करते रहते हैं. लेकिन उनको मालूम है कि अगर बीच में पत्रकारिता की शेखी बघारेंगे तो वही हाल होगा जो प्रशांत भूषण का हुआ है. ऐसा कुछ पत्रकारों के साथ हो चुका है. प्रशांत जी को भी चाहिए था कि वे अगर आरएसएस वालों के साथ जुड़ रहे थे तो बाकी ज़िंदगी उनके कानूनी विशेषज्ञ बने रहते और मौज करते. लेकिन उन्होंने अन्य बुद्धिजीवियों की तरह अपनी स्वतंत्र राय का इज़हार किया तो उनके नए आका लोग इस बात को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे.

हाँ आजकल ज़माना ऐसा है कि कुछ छिपता नहीं. यह संभव नहीं है कि आप किसी पार्टी या संगठन के साथ गुपचुप काम करने लगें और बात में फायदा उठा लें. लालू प्रसाद यादव ने सबको बता दिया कि किरण बेदी चांदनी चौक से टिकट के चक्कर में हैं. कांग्रेस वाले दिग्विजय सिंह भी बहुत गलत आदमी हैं, उन्होंने सारी दुनिया को बता दिया कि अपने अन्ना जी राष्ट्रपति बनना चाहते हैं. दिग्विजय सिंह को पता ही नहीं है कि देवतास्वरूप अन्ना जी की पोल खोल कर उन्होंने देश और समाज का बहुत नुकसान किया है. हालांकि यह भी सच है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम ने भी देश के साथ दग़ा किया है. भ्रष्टाचार से त्राहि त्राहि कर रही देश की जनता सड़कों पर आने का मन बना रही थी.

शासक वर्गों का वही हाल होने वाला था जो चेकोस्लोवाकिया में १९९० में हुआ था, या चिली के तानाशाहों के खिलाफ जनता ने मैदान ले लिया था. जनता तो उस मूड में थी कि वह सत्ता के सभी दलालों को हमेशा के लिए खत्म कर देती लेकिन शासक वर्गों की कृपा के साथ साथ कांग्रेस और बीजेपी के सहयोग से अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान में जनता के बढ़ रहे तूफ़ान को मोड़ दिया. अब पता नहीं इतिहास के किस मोड़ पर जनता इतनी तैयारी के साथ भ्रष्टाचार को चुनौती दे पायेगी.  लेकिन २०११ वाला जनता का गुस्सा तो निश्चित रूप से अन्ना वालों ने दफ़न कर दिया है. और अब हिसार में उस भजनलाल की राजनीति को समर्थन दे रहे हैं जिसने भ्रष्टाचार के तरह तरह के प्रयोग किये थे. या उस चौटालावाद को बढ़ावा दे रहे हैं जो हरियाणा में भ्रष्ट राजनीति के पुरोधा के रूप में किसी सूरत में भजनलाली परंपरा से कम नहीं हैं. जहां तक कांग्रेस की बात है वह तो पिछले चुनाव में भी वहां तीसरे स्थान पर थी, और इस चुनाव में भी तीसरे पर ही रहेगी. वहां भी लगता है कि अन्ना के चेला नंबर वन राजनीतिक सपने देखने की तैयारी कर रहे हैं.

मैं अपने पूरे होशो हवास में घोषणा करता हूँ कि ऊपर जो कुछ भी लिखा है, उसे मैंने बिलकुल नहीं लिखा है. यह सारी बातें सुनी सुनायी हैं और अगर कोई भगवा वस्त्रधारी मुझे पीटने आया तो मैं साफ़ कह दूंगा कि यह सब बकवास मैंने नहीं लिखी है.

लेखक शेष नारायाण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.


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