अन्‍ना ने कहा - मेरी यात्रा देश के लिए, आडवाणी की पार्टी के लिए

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: रालेगण सिद्धी की यात्रा और अन्ना हजारे से बातचीत : कैसा समर्थन? 12 दिनों तक न तो भागवत मिले और न ही संघ का कोई और : पुणे से औरंगाबाद जाते हुए रालेगण सिद्धी की ओर मुड़ जाता हूं. एक कौतूहल, एक जिज्ञासा मुख्य सड़क से छोटी सड़क की ओर खींच ले जाती है.

लगभग पांच किलोमीटर बाद गांव आ जाता है. वहां देश के दूर दराज क्षेत्रों से आये लोगों की भीड़ दिखती है- वे सभी अन्ना हजारे से मिलना चाहते हैं और अन्ना के निवास मंदिर के सामने के बरगद के विशालकाय पेड़ के इर्द गिर्द समूहों में खडे़ होकर बात करते दिखते हैं. बातचीत के केंद्र में अन्ना ही हैं. दोपहर के तीन बज रहे हैं. ज्यादातर बसों से आयें हैं, जो इस साफ सुथरे गांव के पास के चौराहे के पास रुकती है. तभी कोई बताता है कि अन्ना चार बजे सभी से यहीं पर मिलेंगे. मैं भी कौतुक नजरों से आसपास का मुआयना करता हूं. प्रायः सभी अपरिचित हैं, लेकिन उनके बीच माध्यम अन्ना हैं. इसलिए परिचय और वार्ता का सूत्र सहज ही मिल जाता है. थोड़ी देर में अन्ना आकर वहां जमा भीड़ को संबोधित करते हैं. बीच-बीच में भीड़ अन्ना के समर्थन में नारे लगाती है, उन्हें फूल-माला से नवाजना चाहती है. अन्ना रोकते हैं. कहते हैं- ’अन्ना हजारे को भगवान मत बनाओ, वरना गड़बड़ हो जाएगी.' लेकिन लोग कहां मानने वाले. वे धक्का मुक्की करके उन तक पहुंचना चाहते हैं.

इन सबके बीच मेरा पत्रकार मन बड़ी गहराई से पड़ताल कर रहा है. एक सीधा-सादा सरल व्यक्तित्व, लेकिन चाल से ही ’जिद' की स्पष्ट अभिव्यक्ति. शायद सधे कदम और चश्मे के पीछे से बोलती-चमकती आंखें इसका अहसास करा जाती हैं. पूछता हूं कि कांग्रेस के खिलाफ पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रचार की बात आपने कही है, क्या यह वही गलती नहीं जो जेपी ने की थी? 1973-74 में जेपी ने महंगाई, भ्रष्टाचार, भूख, गरीबी, बेकारी के खिलाफ संपूर्ण क्रांति आंदोलन शुरू किया था, लेकिन क्या तब वो आंदोलन भी ऐसे ही नहीं बिखर गया था, जब वो मुद्दों से भटक कर सिर्फ कांग्रेस और इंदिरा गांधी के खिलाफ सिमट कर रह गया? माना कांग्रेस भ्रष्ट है तो क्या दूसरी भ्रष्ट पार्टियों को आप के प्रचार से फायदा नहीं होगा? मायावती तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री की तरह हैं, ऐसे में ...? अन्ना बिना भूमिका के जवाब देते हैं- ’कांग्रेस को उन्हें फायदा नहीं लेने देना चाहिए. कांग्रेस को लोकपाल बिल पास करना चाहिए.' लेकिन यदि दूसरी पार्टियां सत्ता में आईं और उन्होंने भी बिल पारित नहीं किया तो?... ''तो भी हमारा आंदोलन जारी रहेगा... हम जानते हैं कि ये ’ग्रेजुएट' हैं तो उन्होंने ’डॉक्टरेट' कर रखी है... लेकिन अब आंदोलन रुकने वाला नहीं है.''

आप अगले साल होनेवाले चुनावों में यात्रा पर जाने वाले हैं, उधर, लालकृष्ण आडवाणी भी यात्रा पर हैं- दोनों यात्राओं का फर्क क्या है? अन्ना थोड़ा सोच कर जवाब देते हैं. कहते हैं- ’एक में देश की भलाई है तो दूसरे में पक्ष की. आडवाणी की यात्रा सिर्फ उनके पक्ष तक सीमित है. वह अपने पक्ष (यानी कि भाजपा) का प्रचार कर रहे हैं. मेरी यात्रा देश के लिए समर्पित है. यदि भाजपा शासित राज्यों में पहले ही लोकायुक्त कानून आ जाए तो हमें भी और जनता को भी यकीन हो जाएगा कि वे वाकई भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं, लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं. उन्हें लोक आयुक्त बिल अपनी पार्टी द्वारा शासित राज्यों में पारित करना चाहिए, तब जनता उन्हें खुद ही सहयोग देगी.'

लेकिन आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आपके आंदोलन को संघ का समर्थन रहा है? संघ इस बात को प्रमुखता से उठा रहा है. अन्ना जवाब देते हैं: ’भागवत गलत बोल रहे हैं. 12 दिनों तक आंदोलन के दौरान मुझसे संघ का कोई आदमी नहीं मिला. न तो भागवत आये और न ही संघ का कोई और आया. यदि उनका कोई समर्थन होता तो कोई तो मुझसे मिलता और समर्थन की बात कहता. लेकिन मैंने तो नहीं देखा.' तो फिर यह समर्थन की बात संघ कैसे कह रहा है?... अन्ना समझाते हैं: ’यह साजिश है, हमें बदनाम करने के लिए. कांग्रेस में भी अनेक लोग हैं जो खिलाफ बोल रहे हैं. दरअसल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां लोकपाल तो ला नहीं रही हैं, इसलिए लगता है कि दोनों पार्टियों की मिलीजुली साजिश है.' यदि इसे साजिश मानकर आपके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात मान भी ली जाए तो क्या आपको नहीं लगता कि दो आंदोलनों के बीच पर्याप्त अंतर होना चाहिए और इस समय का उपयोग रचनात्मक कार्यों द्वारा आंदोलन की तैयारी में होना चाहिए, गांधी हमेशा ऐसा ही करते थे, आप भी गांधीवादी हैं, तो आप...? अन्ना विनम्रता से जवाब देते हैं: ’मेरी पात्रता गांधी के चरणों में बैठने की भी नहीं है. वैसे गांव में साफ-सफाई, शिक्षा, पंचायत और अनेक दूसरे समाजोपयोगी काम यहां भी चलते ही रहते हैं. ये भी तो आखिर रचनात्मक ही हैं. वैसे, जरूरी यह है कि एक ओर रचनात्मक कार्य चलते रहें तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार को दूर करने का भी प्रयास जारी रहे.'

वह युवाओं को, महिलाओं को, बुजुर्गों को, सभी को बदलाव की मुहिम से जोड़ने पर जोर देते हैं. अन्ना बताते हैं: ’अब तक पुरस्कारों में 35 लाख रुपये मिले हैं, जिन्हें ट्रस्ट में लगा दिया है. हर साल करीब तीन लाख ब्याज मिलता है. जिससे अनेक समाजोपयोगी कार्य हो जाते हैं. 30-35 गरीब बच्चों की शादियां करवाता हूं. अब तक करीब 15 बार अनशन कर चुका हूं. छह कैबिनेट मंत्रियों का विकेट भी लिया है. सैकड़ों भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी घर भेजे गए. आधा दर्जन से ज्यादा अच्छे कानून बने. आखिर सूचना का अधिकार कानून बना तो आदर्श सोसायटी घोटाला, कलमाडी का खेल घोटाला, टूजी घोटाला जैसी चीजें बाहर आईं. लोगों को जानकारी तो मिली लेकिन भ्रष्टाचारियों को सूचना अधिकार से जेल भेजना तो संभव नहीं है. इसलिए जेल भेजने के लिए और भ्रष्टाचार में खाये पैसे निकलवाने के लिए जनलोकपाल जरूरी है. यह सूचना के अधिकार का दूसरा पहलू है. अब सिर्फ जेल भेजना ही जरूरी नहीं है, पैसे की वसूली भी जरूरी है. जनलोकपाल को सुप्रीम कोर्ट के जज और चुनाव आयोग की तरह स्वायत्त भी बनाना होगा. सीबीआई पर सरकार का नियंत्रण हटाना होगा. लेकिन इसके लिए सरकार को समय समय पर इंजेक्शन देना पड़ता है. अभी यह कह कर दिया है कि पांच राज्यों के चुनावों में जाऊंगा...'

क्या इससे बात बन जाएगी? ऐसी शंकाओं का जवाब भी अन्ना के पास है. कहते हैं: भ्रष्टाचारमुक्त भारत के लिए लंबी लड़ाई लड़नी है. अभी चुनाव में लड़ रहे प्रत्याशियों को रद्द करने या नापसंदी के अधिकार, जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार और विकेंद्रीकरण के लिए संघर्ष करना है. और फिर कानून बनाने के बाद उस पर अमल भी जरूरी है- यह ध्यान रखना है. अन्ना कहते हैं कि 26 जनवरी 1950 से आज तक हर साल हम स्कूल के मैदान में प्रजासत्ताक दिन (गणतंत्र दिवस) मनाते हैं, लेकिन सत्ता स्कूल के मैदान में नहीं, मुंबई और दिल्ली में केंद्रित है, क्यों? इसे विकेंद्रित करो. गांव तक जनता की कमिटी बनाओ- यही लोकशाही है. हुआ यह है कि आजादी के बाद जनता ने अपने प्रतिनिधियों को सेवक बनाकर भेजा कि अच्छे कानून बनें, लेकिन मालिक सो गया. बस यहीं गड़बड़ हो गई. फिर सेवक चोरी करने लगा. लेकिन अब मालिक जाग गया है. अब मालिक को जागते रहना चाहिए. यदि जनता फिर सो गई तो गड़बड़ हो जाएगी.

अन्ना ईमानदारी से सच्चाई के मार्ग पर जोर देते हैं तो सतर्कता की बात भी करते हैं. बताते हैं कि तेलगी के घोटाले में ढाई सौ लोग जेल गए. पुलिस कमिशनर तक गिरफ्त में आए. फिर मुझे भी मारने के लिए सुपारी दी गई. लेकिन ईश्वर मदद करता है. वो जन समूह का ढांढस बंधाते हैं कि संत ज्ञानेश्वर का भी अपमान हुआ, तुकाराम की पीठ पर लाठी टूटी. पैगंबर, यीशू के साथ भी ऐसा ही हुआ. आखिर जिस पेड़ में फल आते हैं, उसी पर लोग पत्थर मारते हैं. आपको बड़ा काम करना है तो धैर्य रखना है. अपमान को पीना सीखना है. नीयत ठीक है तो प्रकृति भी साथ देती है. यहां गांव में जब शुरू में सफाई की बात कहता था, तो लोग नहीं सुनते थे. फिर मैंने खुद झाडू उठाई, तो सबकी बैटरी चार्ज हो गई. अभी भी थोडे़-थोडे़ समय पर बैटरी चार्ज करने के लिए झाडू उठाता हूं. आखिर, गांधी, विनोबा, संत गाडगे ने यही तो किया था, तो मैं नया क्या कर रहा हूं?...

तो मैं नया क्या कर रहा हूं?... यह सवाल भीतर तक घर कर जाता है. अन्ना के इस सवाल पर रालेगण सिद्धी से लौटते हुए विचार करता रहा. लगा कि कितना जीवंत है यह सवाल. जीवंत इसलिए कि उन्होंने कुछ किया हो या न किया हो- एक काम तो भरपूर किया है. सोते हुओं को जगा दिया है. और इसी जागृति से चेहरे खिल गए हैं और नई सुबह की आस जगी है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में प्रकाशित हो चुका है. गिरीशजी से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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