मुद्दा टीम अन्ना नहीं भ्रष्टाचार है

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: ज़रूरत भारतीय जनमानस को समझने की है : “अन्ना सही हैं; अन्ना ग़लत हैं; अन्ना राजनीति कर रहे हैं, टीम अन्ना में फूट हो गई है; अन्ना फैक्टर की वजह से कांग्रेस उपचुनाव हारी है, अन्ना संघ के हाथों में खेल रहे हैं; लोकपाल बनाने से क्या भ्रष्टाचार मिट जाएगा, इतने क़ानून आए क्या भ्रष्टाचार मिटा?” इन तमाम प्रश्नों के बीच में मूल प्रश्न कहीं खो गया है।

वह मूल प्रश्न है क्या देश में भ्रष्टाचार चरम पर नहीं है? क्या इससे निज़ात पाना ज़रूरी नहीं है और क्या देश में आज़ादी के बाद पहली बार इतना बड़ा जनाक्रोश नहीं उभरा है? इन्हीं तीन प्रश्नों में ऊपर के सभी प्रश्नों का जवाब भी है। अंग्रेजी में एक मुहावरा है “शूटिंग द मैसेंजर”(संदेशवाहक को ही मार देना)। उहापोह की इस स्थिति में यह एक सामान्य प्रतिक्रिया देखने में आ रही है जो कि कुछ लोगों के अतार्किक चिंतन का फल है। क्या अन्ना को लेकर उभरे प्रश्नों से भ्रष्टाचार के मूल प्रश्न को बाधित किया जा सकता है? क्या टीम अन्ना के सदस्यों पर हमले से इस जनांदोलन को दबाया जा सकेगा? भारतीय समाज को गहराई से समझे बगैर फौरी तौर पर इस मुद्दे पर संशय रखना या समाधान निकालना अनुचित है। जब भारत को आज़ादी देने की बात चल रही थी तब हाउस ऑफ कॉमन्स में लॉर्ड इरविन की घोषणा पर आठ नवंबर 1929 को एक जबरदस्त बहस हुयी और बॉल्डविन ने कंज़रवेटिव पार्टी के समर्थन का आश्वासन दिया। गुस्साए चर्चिल ने अखबार डेली मेल में लिखा कि अंग्रेज़ों ने सदियों की बर्बरता से भारत को बचाया लेकिन इन भारतीयों को खुद सरकार चलाने देना मूर्खतापूर्ण होगा। चर्चिल ग़लत साबित हुए। 64 साल भारत प्रजातंत्र की राह पर हिचकोले लेकर ही सही अपनी गाड़ी चलाता रहा, न रास्ता बदला न गाड़ी टूटी। बस एक बार 1975 में पंक्चर हुई थी।

एक दूसरा उदाहरण लें। भारत के संविधान को अंगीकार करने के एक साल बाद विश्व विख्यात संविधान विशेषज्ञ सर आइवर जेनिंग्स को मद्रास विश्वविद्यालय में एक भाषण देने के लिए बुलाया गया। विषय था भारतीय संविधान और इसके प्रावधान। जेनिंग्स ने लगभग कटाक्ष करते हुए कहा कि संघीय व्यवस्था बेहद जटिल है। अंत में भारतीय संविधान को उन्होंने पश्चिमी उपकरणों का पूर्वीकरण बताया। उन्ही जेनिंग्स ने कुछ दिन बाद तत्कालीन सीलोन (श्रीलंका) का संविधान बनाया, वह संविधान महज सात साल चल पाया। हमने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की स्थिति देखी जहां 64 साल में लगभग 30 साल फौजी शासन रहा। ताजा उदाहरण नेपाल का है, सोवियत संघ टुकड़ों-टुकड़ों में बंट गया, चीन को एक पूर्ण यू-टर्न लेना पड़ा, अरब के देश अशांत हैं।

भारत में केवल एक बार आपातकालीन स्थिति लागू की गयी जिसके बारे में बाद में प्रसिद्ध संपादक इंदर मेहरोत्रा का कहना था कि आपातकाल लगाए जाने का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि अब कोई सरकार इसे दुबारा लगाने की हिम्मत नहीं करेगी। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ जनांदोलन को भारतीय समाज की आंतरिक शक्ति के मद्देनज़र देखना होगा। यह सही है कि भ्रष्टाचार एक व्यवस्थात्मक बुराई कम सामाजिक बुराई ज़्यादा है और ऐसे में इसका समाधान केवल संस्थाएं खड़ी कर या क़ानून बनाकर नहीं किया जा सकता। लेकिन नए शासन पद्धति में इसके बिना आत्मपरिवर्तन के रास्ते समाज को सुधारना कत्तई संभव नहीं है।

भारतीय समाज के कुछ अद्भुत लक्षणों में से एक है सहिष्णुता। पश्चिमी समाज के प्रजातंत्र की उपादेयता पर प्रश्नचिह्न लगाने पर सुकरात को ज़हर दे दिया, ईसा मसीह को सही बात करने पर शूली पर चढ़ा दिया, धर्म के नाम पर इसाईयों के दो वर्गों के बीच में जबरदस्त मार-काट हुई, गैलिलियो को धार्मिक अवधारणाओं के ख़िलाफ वैज्ञानिक सोच विकसित करने पर जेल में डाल दिया गया, जबकि भारतीय समाज ने ईश्वर पर अनास्था व्यक्त करने वाले चारवाक को भी दार्शनिक के रूप में देवत्व का स्थान दिया। दुनिया से एक लंबे अंतराल के बाद घृणित ग़ुलाम परंपरा बंद हुयी, भारत में सती प्रथा का लोप हुआ और शूद्रों के प्रति घृणा भाव काफी हद तक बदला। इन सभी बदलावों के पीछे जहां एक तरफ समाज के सार्थक सोच की भूमिका थी वहीं तत्संबंधित संस्थाएं व क़ानूनों ने भी एक बड़ी भूमिका निभायी।

मशहूर किताब ब्राइब के लेखक नूनन ने अपनी विस्तृत विवेचना के बाद कहा था कि जैसे-जैसे समाज की सोच बेहतर होती जाती है उसी-उसी तरह सामाजिक दोष या अन्य बुराइयां भी खत्म होती जाती हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ समाज के चरित्र को बदलना एक लंबी प्रक्रिया है लिहाज़ा लोकपाल नामक संस्था से तत्काल किसी चमत्कार की उम्मीद भले न हो लेकिन इसे इस आधार पर रोकना एक घातक सोच होगी। “कुछ नहीं होगा” का भाव न केवल आत्मघाती है बल्कि पराजयी भी है। प्रश्न अन्ना या टीम अन्ना का नहीं है बल्कि भ्रष्टाचार का है, जिसकी वजह से एक बड़ा वर्ग अभाव का जीवन जी रहा है।

इसमें दो राय नहीं है कि संस्थाओं की उपादेयता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं क्योंकि इन पर काबिज़ लोगों में वह नैतिक बल नहीं है। उदाहरण के तौर पर राजनीतिक वर्ग, न्यायपालिका, मीडिया, कार्यपालिका सभी जनअपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर रहे हैं लेकिन इसकी वजह से प्रयास नहीं रोके जा सकते। उदाहरण के तौर पर राजनीतिक वर्ग के प्रति जनता का विश्वास नहीं है। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि हम लोकतंत्र में या लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास नहीं रखते। उसी तरह न्यायपालिका में गड़बड़ियां हैं पर इसका नियंत्रण कार्यपालिका को नहीं दिया जा सकता। मीडिया में अतिरेक है, अनैतिकता है इसका मतलब यह नहीं कि इसे सरकारी चंगुल में सौंपा जा सके। यही है भारतीय प्रजातंत्र की खूबी।

संक्रमण काल के परिशोधन में इस तरह की उहापोह की स्थिति आती है लेकिन सार्थक प्रयास वह है जिसमें मूल अवधारणाओं को बगैर छेड़े व्यक्ति की सोच में बदलाव कर दिया जाए और साथ ही संस्थाओं की भी उपादेयता स्थापित हो जाए।  किसी शायर ने कहा है-

जज़्बए दिल की मगर तासीर उलटी है,
कि जितना खींचता हूं और खिंचता जाए है मुझसे।

इस आंदोलन को दबाने की भी कोई भी सरकारी या गैरसरकारी कोशिश इसे और उभारेगी।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.


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