प्रवासी पंछी हैं प्रभात डबराल

E-mail Print PDF

दीपक आजाददेहरादून। पत्रकार से सूचना आयुक्त बने प्रभात डबराल के उत्तराखंडी प्रेम को लेकर राज्य के मीडिया हलकों में एक तल्ख बहस चल रही है। कहा जा रहा है कि डबराल एक ऐसे प्रवासी पंछी हैं जो अपना बुढ़ापा काटने के लिए उत्तराखंड चले आए हैं। ऐसे में अब प्रभात को ही साबित करना होगा कि उन्होंने महज बुढ़ापा काटने भर के लिए दिल्ली से देहरादून के लिए उड़ान नहीं भरी है। वे ऐसा कर पाते हैं या नहीं, यह समय बताएगा।

देश के कई मीडिया संस्थानों में अहम पदों पर काम कर चुके पत्रकार प्रभात डबराल मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के कोटद्वार शहर के बाशिंदे हैं। प्रभात ने अपने पत्रकारीय जीवन के तीन दशक से ज्यादा का वक्त दिल्ली जैसे महानगरों में गुजारा है। एकाएक राज्य की भाजपाई सरकार के आंखों के तारे बने डबराल को पिछले दिनों राज्य सूचना आयुक्त की कुर्सी थमा दी गई। प्रभात को ऐसा क्या लगा कि उत्तराखंड को उनकी सेवाओं की दरकार है? वाम समर्थक पारिवारिक पृष्ठिभूमि और खुद अपने छात्र जीवन में वामपंथ के नजदीक रहे प्रभात डबराल को निशंक सरकार द्वारा गले लगाए जाने से भी राज्य में कई लोग आश्चर्यलोक में उलझे हुए हैं। हालांकि उन्हें करीब से जानने वाले बताते हैं कि एक पत्रकार के तौर पर उनकी समय-समय पर विभिन्न मुददों पर अलग-अलग राजनीतिक विचारों से मेल-मिलाप रहा है। ऐसे में बहस के कई कोण निर्मित होते हैं।

उत्तराखंड में इन दिनों इस पर कई तरह से बहस चल रही है। वरिष्ठ पत्रकार एस राजेन टोडरिया ने प्रभात डबरालअपने एक आलेख में कहा है,‘ मुख्यमंत्री ने लगे हाथ अपने पसंद के पत्रकार का पुनर्वास कर न्यूज चैनल में रहते हुए उनके द्वारा की गई ‘निशंक भक्ति’ के लिए उन्हें उपकृत कर दिया है।’ टोडरिया आगे कहते हैं,‘ प्रभात डबराल की नियुक्ति पहले से ही तय थी। उनकी कई सेवाओं के लिए उन्हें उपकृत किया जाना था। वह ऐसे प्रवासी पंछी हैं जो अपना बुढ़ापा काटने के लिए उत्तराखंड आए हैं। उत्तराखंड के लिए उनका योगदान शोध का विषय है।’

इसके साथ ही टोडरिया, दलित या किसी ठाकुर के सूचना आयुक्त न बनाए जाने को लेकर भी सवाल उठाते हुए आयोग में एक नए किस्म का वणाश्रमी सिस्टम लागू होने की बात कहते हैं। दलित के सवाल पर उनका यह तर्क समझ में आता है कि सूचनाधिकार के मामले में जागरूकता की सबसे ज्यादा जरूरत शिल्पकार जातियों को ही है। क्योंकि उनसे जुड़ी योजनाओं में ही सर्वाधिक भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़ा है। पर सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक तौर पर भारतीय समाज व्यवस्था में अच्छी खासी दखल रखने वाली ठाकुर जातियों को दलितों के समक्ष रखने का उनका तर्क गले नहीं उतरना। वहीं, वरिष्ठ पत्रकार संजय कोठियाल ने भी अपने एक आलेख में सूचना आयुक्तों के चयन पर असंतोष जाहिर किया है। कोठियाल सवाल करते हैं कि क्या कांग्रेस और भाजपा को इस राज्य में काबिल लोग नजर नहीं आते?

दरअसल, इन सवालों और शंकाओं के पीछे उत्तराखंड गठन के वक्त से एक के बाद एक कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने जिस तरह राज्यसभा में प्रतिनिधि भेजने का मामला रहा हो या फिर हेमा मालिनी जैसे फिल्मी दुनिया के चमकदार चेहरों को ग्लैमर के मारे उनकी खातिरदारी के लिए पलक-पावड़े बिछाने का, वह हैरान करने वाले रहे हैं। सरकारों के ऐसे कुछ फैसले रहे हैं जो उत्तराखंड निर्माण आंदोलन की बुनियादी अवधारणा से मेल नहीं खाते हैं।

लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.


AddThis