बस कहें, क्षमा करें

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ऑस्कर वाइल्ड ने कहा था कि पत्रकार आपके खिलाफ सार्वजनिक तौर पर जो कुछ लिखते हैं, उसके लिए निजी तौर पर माफी मांग लेते हैं। मगर राडिया टेप मामला सामने आने के बाद आप ठीक इसके उलट यह बात कह सकते हैं कि कुछ पत्रकारों पर यह दबाव डाला जा रहा है कि उन्होंने निजी तौर पर जो कुछ किया या कहा, उसके बारे में वे सार्वजनिक तौर पर स्पष्टीकरण दें। वाइल्ड उन पत्रकारों की बात कर रहे थे जो ताकतवर लोगों के खिलाफ लिखते तो थे, मगर उनके साथ बेहतर संबंध बनाने की कोशिशों में जुटे रहते थे। मगर आज कुछ ऐसे बड़े पत्रकार देखने को मिल रहे हैं जो ताकतवर लोगों की तरफ से लिख रहे हैं या उनके लिए काम कर रहे हैं।

हर पेशे की अपनी-अपनी बुराइयां हैं और पत्रकारिता कोई अपवाद नहीं है। मगर किसी भी दूसरे पेशेवर की तरह ही ए राजा और अशोक चव्हाण के लिए यह नियम लागू होना चाहिए कि अगर आप पकड़े जाते हैं तो आपको इसकी कीमत चुकानी होगी, या फिर कम से कम पश्चाताप तो करना ही होगा। किसी भी प्रणाली या पेशे के प्रति अविश्वास तब पैदा होता है जब ऐसा नहीं होता है। भारतीय पत्रकारिता अब ऐसे ही खतरे में नजर आ रही है।

टेप में जिन लोगों के नाम हैं उन्होंने अपनी सफाई दे दी है। पर समझदार लोगों को यह सफाई नाकाफी लग रही होगी। यहां हमारे सामने राजनीतिक नेताओं को प्रभावित करने वाली एक महिला हैं, जो उसी ए राजा को संचार मंत्रालय में लाना चाहती थीं जो भारत के सबसे बड़े घोटाले के दोषी आरोपित किए जा रहे हैं, जबकि वह टाटा जैसे प्रतिष्ठित क्लाइंट का प्रतिनिधित्व कर रही हैं और हमारे पास ऐसे दिग्गज पत्रकार भी हैं जो उन महिला से निर्देश लेकर राजनेताओं तक संदेश पहुंचा रहे थे।

यहां निजी वार्तालाप के प्रकाशन के बचाव की कोशिश नहीं की जा रही है। उदाहरण के लिए बरखा दत्त ने यह शिकायत की है कि ओपन पत्रिका ने राडिया के साथ उनकी बातचीत को प्रकाशित करने से पहले उनसे कोई बात नहीं की और दत्त की यह शिकायत पूरी तरह वाजिब भी है। वहीं वीर सांघवी की ओर से भी ऐसी शिकायत उचित होगी। जिन दूसरे लोगों के नाम इस टेप में हैं और जिनका 2जी घोटाले से संबद्ध आउटलुक की आवरण कथा में जिक्र किया गया है, उनका इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं है और उनकी शिकायतें भी वाजिब हैं। लगभग सभी पत्रकार अनौपचारिक बातचीत में कुछ न कुछ कह देते हैं और यही कारण है कि जिनका नाम इस टेप में नहीं है, वे इसके लिए भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे होंगे।

साथ ही सांघवी और दत्त के खिलाफ मामले को भी बढ़ा चढ़ाकर पेश नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन पर रिश्वत का कोई आरोप नहीं लगाया गया है। लगता है कि वे ऐसे जाल में फंस गए हैं जिसमें बड़े और नामी गिरामी पत्रकार खुद को पाठकों या दर्शकों की ओर से प्रेक्षक मानने के बजाय अक्सर अपने आप को बड़ा खिलाड़ी मान लेते हैं। यहां यह याद रखना भी महत्त्वपूर्ण है कि किसी ने भी दत्त पर यह आरोप नहीं लगाया है कि उन्होंने राडिया को फायदा पहुंचाने के लिए टेलीविजन प्रसारण का इस्तेमाल किया और दत्त खुद भी इस बात की घोषणा कर चुकी हैं। सांघवी अपनी पीढ़ी के सबसे प्रतिभावान पत्रकारों में से हैं। हालांकि इस मामले में वह कुछ उलझे नजर आते हैं क्योंकि उन्होंने टेप की गई बातचीत में जो करने का वादा किया है उससे उनकी लेखनी भी मेल खाती है। हालांकि अब वह यह कह रहे हैं कि ये उनके अपने विचार हैं। अगर ये दोनों खुद यह मान लें कि उन्होंने सीमा लांघी हैं और इसके लिए माफी मांग लें और यह कहें कि आगे ऐसा नहीं होगा तो पूरा पत्रकार समुदाय राहत की सांस ले सकेगा और अपना सर थोड़ा ऊपर उठा सकेगा। साथ ही युवा पत्रकार छात्रों की पीढ़ी और इस पेशे में अभी-अभी कदम रखने वाले पत्रकार जो दत्त और दूसरे पत्रकारों को अपना आदर्श मानते आए हैं, उन्हें भी इस बात से राहत मिलेगी। सांघवी और दत्त दोनों ही अपने पेशे के आदर्श हैं और ऐसे समय में जबकि ढेरों प्रकाशक मीडिया की साख नष्ट करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं तो इनसे इनके पेशे और सहकर्मियों को यही उम्मीद है।

टीएन नैनन का यह कालम बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित हुआ है, वहीं से साभार लेकर हम इसे यहां प्रकाशित कर रहे हैं.


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