उत्‍तर प्रदेश छोडऩे को मजबूर हैं ईमानदार अफसर

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बीपी: भ्रष्‍ट और बेलगाम अधिका‍रियों के हाथ सत्‍ता की लगाम : उत्तर प्रदेश में विकास का पहिया जाम हो गया है, साथ ही कानून व्यवस्था के भी हालात असहनीय होते जा रहे हैं, जिसे पटरी पर लाने के लिए मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर स्वयं कमान संभाल ली है। वह शीघ्र ही प्रदेश में दौरे शुरु करने वाली हैं। इस खबर से यह तो साफ हो गया है कि मायावती भी मानने लगी हैं कि प्रदेश के हालात सही नहीं हैं, लेकिन उनके दौरों से अधिक फर्क पडऩे वाला नहीं है, क्योंकि चपरासी से लेकर प्रमुख सचिव तक और सिपाही से लेकर एडीजी कानून-व्यवस्था तक के अधिकतर अधिकारियों-कर्मचारियों में लगभग एक ही जैसी मानसिकता घर कर गयी है। ऐसे में दौरों से कुछ बदलेगा, साफ तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।

वैसे मुख्यमंत्री मायावती के शुरु होने वाले दौरों को लेकर लापरवाहों, भ्रष्टाचारियों और जातिवादियों की नींद उड़ गयी है, जिससे सबके सब जमीनी हकीकत सुधारने की बजाये कागजी आंकड़ेबाजी दुरुस्त करने में जुट गये हैं, पर इतना तय है कि दौरे के दौरान मुख्यमंत्री की एक नजर भी पड़ गयी, तो कार्रवाई से कोई बचा नहीं पायेगा, लेकिन फिर सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री हर चीज स्वयं तो देख-समझ नहीं सकतीं और जिसकी आंखों से वह देखती-समझती हैं, वह वही दिखायेंगे, जिसमें उनका स्वार्थ सिद्ध हो रहा होगा।

खैर, पूर्ण बहुमत की सरकार होने के कारण पिछले लगभग दो सालों से मुख्यमंत्री मायावती ने समीक्षा बैठकें व दौरे कम कर दिये एवं इस बीच चुनावी व्यस्तता भी रही, जिससे सिस्टम पर भ्रष्ट, लापरवाह व जातिवादी कुंडली मार कर बैठ गये, तभी जनता हाहाकार करने लगी। शायद, यह सच किसी शुभचितंक ने मुख्यमंत्री तक पहुंच दिया, इसीलिए उन्होंने सिस्टम दुरुस्त करने का बीड़ा पुन: उठा लिया है। उन्होंने अपने दौरों से सम्बंधित गाइड लाइन जारी कर दी है, जिससे अफसरों के होश उड़े हुए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत सुधारने की बजाय सबके सब कागजी आंकड़ेबाजी दुरुस्त करने में जुट गये हैं। अगर विभिन्न विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर नजर डाली जाये तो शायद ही कोई विभाग या अधिकारी-कर्मचारी ऐसा नजर आयेगा, जो सिर्फ वेतन के लिए काम कर रहा हो या जितना वेतन ले रहा है, उतना काम कर रहा हो।

प्रदेश के विकास विभाग की बात करते ही लोगों के दिमाग में बेहद ही भ्रष्ट विभाग की तस्वीर उभर आती है। इस विभाग के मुखिया प्रदेश स्तर से लेकर जनपद स्तर तक सिर्फ जेबें भरने का ही काम कर रहे हैं। हालात इतने खराब हो चले हैं कि इस विभाग में कमीशन के बगैर अधिकारी-कर्मचारी कुछ भी करने के बारे में सोचते तक नहीं हैं। डीआरडीए की बात की जाये तो इस संस्था को प्रत्येक जनपद में जनपद स्तर पर भ्रष्टाचार की सर्वोच्च ट्राफी देने से अपने को कोई नहीं रोक पायेगा। यह संस्था सिर्फ सरकारी धन हड़पने का माध्यम बन कर रह गयी है, जिसके बारे में सभी जानते भी हैं। विधायक व सांसद निधि के कार्यों को शुरू करने से पहले पीडी व सीडीओ को स्थलीय निरीक्षण करने का शासनादेश जारी हो चुका है एवं कार्य समापन पर भी उक्त दोनों अधिकारियों को मौके पर जाकर और गुणवत्ता देखने, परखने के बाद व संतुष्ट होने पर ही अंतिम किश्त जारी करने के स्पष्ट निर्देश हैं, लेकिन उक्त दोनों अधिकारी मौके पर सिर्फ कागजों में ही जाते हैं, बाकी सब ठेकेदार व बाबू मिल कर ही निपटाते आ रहे हैं। आरईएस और दो कदम आगे बढ़ कर काम कर रहा है। यहां भी सिर्फ कमीशनखोरों का ही राज कायम है। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, नेडा, समाज कल्याण विभाग व सहकारिता विभाग पर तो किसी की नजर ही नहीं जाती है, जिससे धन का बंदरबांट यहां और भी आसानी से कर लिया जाता है। प्रोबेशन कार्यालय ने तो और भी बड़ा रिकार्ड कायम कर रखा है। प्रदेश में शायद ही कोई जनपद होगा, जहां पेंशन को लेकर घोटाला नहीं किया गया होगा। कृषि विभाग की बात की जाये, तो आम लोग कहते हैं कि इस विभाग का नाम तो सुना है, पर काम क्या है, वह नहीं जानते। लोक निर्माण विभाग के बारे में जगजाहिर है कि यहां वही होता है, जो ठेकेदार चाहते हैं। पुलिस की जीडी की तरह ही यहां एक बांड रजिस्टर होता है, जो कभी अपडेट नहीं होता, हमेशा वर्तमान से महीनों पीछे रहता है, जिससे बेईमानी का खेल खेलने में आसानी होती है, पर यह सब जानते हुए भी उच्चाधिकारी मौन ही रहते हैं, क्योंकि विभाग से मिलने वाला कमीशन ऊपर तक बंटता है।

वन विभाग की बात करें, तो पिछले एक दशक में इतने पेड़ लगाये गये हैं कि प्रदेश में लोगों को रहने को जगह कम पड़ जाती, पर गनीमत ही कही जायेगी कि विभागीय अधिकारियों ने यह सब कागजों में ही किया, लेकिन इससे भी बड़ी हैरत की बात यह है कि इस सब का हिसाब लेने वाला ही कोई नहीं है। निगमों व पालिकाओं की बात की जाये तो यहां भी कमीशनखोरी का खेल खुलेआम चल रहा है, साथ ही यहां किसी का भी अंकुश काम नहीं आ रहा है। अध्यक्षगणों के मन में जो आ जाये, वही आदेश हो जाता है। प्रदेश में अरबों रुपया कमीशनखोरी की भेंट चढ़ चुका है। कांशीराम आवासीय योजना भी अफसरों व ठेकेदारों के लाभ का ही जरिया बन कर रह गयी है और सत्ताधारियों के चमचे ठेका लेकर पूरा लाभ उठाते देखे जा सकते हैं। इन्दिरा व महामाया आवास योजना का भी यही हाल है। बाढ़ खंड विभाग भी अपने कारनामों को लेकर टॉप टेन में शामिल किया जा सकता है। बांधों की मरम्मत को आने वाला धन सिर्फ कागजों में ही खर्च होता है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अधिकारियों के हाथ कांप जाते हैं। जिलाधिकारियों की बात करें तो कहीं लग ही नहीं रहा है कि जनपदों में आईएएस अधिकारी तैनात है, बस टाइम पास करते नजर आ रहे हैं। हां, इतना जरुर है कि जिलाधिकारी की बजाय अगर बाबू से मिला जाये तो काम हाथों-हाथ हो जाता है, जिससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस गरिमामयी पद का भी उत्तर प्रदेश में क्या हश्र हो गया है?

वैसे तेजतर्रार या ईमानदार आईएएस व आईपीएस अधिकारी सरकार को भी पसंद नहीं हैं, यह बात इसलिए पुख्ता हो रही है कि तेजतर्रार, ईमानदार व चर्चित आईएएस एम.देवराज व आईपीएस तरुण गाबा राज भवन में तैनात हैं। बताना सही रहेगा कि देवराज प्रदेश के दर्जनभर जनपदों में तैनात किये जा चुके हैं और तीन महीने से अधिक का कार्यकाल लगभग कहीं नहीं रहा है, साथ ही उनका तबादला आदेश आते ही जनता महीनों धरना-प्रदर्शन व आंदोलन करती है, इसीतरह गाबा को तैनाती स्थलों पर आज भी आदर के साथ याद किया जाता है। सरकार की मानसिकता अगर आम आदमी को न्याय दिलाने या भयमुक्त वातावरण देने की रही होती, तो ऐसे जनप्रिय अधिकारी किसी न किसी जनपद में ही तैनात होते, जबकि वह दोनों प्रदेश छोडऩे को आतुर नजर आ रहे हैं।

मुख्यमंत्री का स्वास्थ्य सेवाओं पर भी विशेष ध्यान रहता है, पर विभाग आम आदमी से बहुत दूर जा चुका है। यहां पैसे के बगैर कोई गरीब तबके के मरीजों से बात तक करना पसंद नहीं करता। जिला पंचायत की बात की जाये तो यहां शासनादेशों को कोई अहमियत नहीं दी जाती। यहां सिर्फ अपना कानून चलता है। विकास कार्यों पर खर्च होने वाले धन में से चालीस प्रतिशत से भी अधिक धन हजम कर लिया जाता है, पर जानते हुए भी कोई कुछ नहीं कर पाता। इसी तरह शिक्षा विभाग की योजनायें अधिकारियों की जेबें भरने का माध्यम बन कर रह गयी हैं। राशन व्यवस्था की बात की जाये तो सफेदपोश, माफियाओं और अधिकारियों के गठजोड़ ने व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त ही कर रखा है। इसके अलावा प्रदेश या केन्द्र सरकार की अधिकतर योजनायें सिर्फ कागजों में ही चल रही हैं। कानून व्यवस्था की दृष्टि से देखा जाये तो अधिकतर जनपदों में थानों के प्रभारी पद का ठेका दिया जा रहा है, ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि रुपये देकर थाना प्रभारी बनने वाले इंस्पेक्टर व सब-इंस्पेक्टर जनसेवा को कितनी अहमियत दे रहे होंगे।

प्रदेश के हालातों को शब्दों में बांध पाना मुश्किल काम है। हालात सिर्फ अहसास किये जा सकते हैं, पर एसी में रहने वाले व लग्जरी गाडिय़ों में चलने वाले महसूस भी नहीं कर सकते। इस सबके बीच एक बात सुकून देने वाली यह है कि प्रदेश में गुंडों, डकैतों या बदमाशों का खौफ नहीं है, पर इन सबसे ज्यादा खौफ अफसरों का है, जिनसे जनता न लड़ सकती है और न शिकायत कर सकती है। ऐसे में मुख्यमंत्री मायावती द्वारा दौरे करने की खबर भी सुकून देती है, लेकिन विरोधियों का कहना है कि दौरों के पीछे भी कुछ और ही मकसद होगा, पर क्या होगा? इसके जवाब के लिए कुछ दिन इंतजार करना सही रहेगा।

लेखक बीपी गौतम मान्‍यता प्राप्‍त स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. जनपक्षधर एवं सूचितापरक पत्रकारिता के हिमायती हैं तथा सभी विषयों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं.


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