काबा हो तो क्या, बुतखाना हो तो क्या!

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गिरीश: 6 दिसंबर 1992 की बरसी पर : बाबरी मस्जिद की शहादत की आज 18वीं बरसी है. कुछ लोग इसे विवादित इमारत या ढांचा भी कहते थे. उत्‍तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल में मस्जिद की रक्षा के लिए चली गोली में 28 लोगों की जान गई थी, तो कल्याण सिंह सरकार के जमाने में 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने ढांचे को ध्वस्त कर दिया था, और सरकारी तंत्र वहां खड़ा तमाशबीन ही नहीं था, बल्कि उसने कारसेवकों की अप्रत्यक्ष रूप से मदद ही की थी. फिर इसे लेकर देश में ही नहीं, विदेशों में भी भड़के दंगों में अनेक निरपराध लोगों की जान गई थी.

तब से लेकर हर साल बरसी के मौके पर सुरक्षा बढ़ा दी जाती है और तंत्र चौकन्ना हो जाता है. पिछले महीनों में हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के बाद इस मसले पर थोड़ी गरमाहट जरूर आई, लेकिन मामला अब भी कोर्ट में है और सभी कुछ शांत है. हिंदुस्तानियत में यकीन रखने वाले हर खास-ओ-आम की अब यही दिली चाहत है कि अयोध्या के नाम पर फिर से कोई जिन्न कहीं दंगे-फसाद न कराए. मस्जिद कैसे ध्वस्त हुई और कौन लोग इस नियोजित षडयंत्र के पीछे थे? इस बारे में हम सभी काफी-कुछ जानते हैं और फिर लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट तथा भाजपा के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी की निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) अंजू गुप्ता ने भी पिछले महीनों में खुलासा किया है, इसलिए उस विस्तार में जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस पर विचार किया जाए कि सैकड़ों साल से ये मस्जिद जिस अयोध्या में खड़ी थी, उसके मूल्य और संस्कार क्या हैं? आखिर कैसे जिस अयोध्या के नाम पर देश-दुनिया में अनेक जगहों पर खून बहता है - वो अयोध्या खुद न केवल ऐसे फसादों से दूर रहती है, बल्कि वहां विभिन्न तबकों का आपसी प्यार-मोहब्बत भी बदस्तूर जारी रहता है?

अयुद्ध से अयोध्या और अवध

ध्यान देने की बात ये है कि अयोध्या का नाम अयुद्ध (अ$युद्ध) से पड़ा है और हजारों वर्षों का यहां का इतिहास गंगा-जमुनी तहजीब की अद्भुत मिसाल है. जिस अयोध्या के नाम पर दुनिया भर में कट्टरपंथी बावले होते रहे हैं, वहां आज भी सैकड़ों मंदिर हैं, तो 26 मस्जिदें हैं. इनमें से आधा दर्जन से ज्यादा ऐसी मस्जिदें हैं, जहां पूजा और नमाज साथ-साथ होती है. पुराकथाओं में जिक्र है कि अयोध्या के हनुमान गढ़ी मंदिर में कभी हनुमानजी रहे थे -  लेकिन कम लोग जानते हैं कि इस भव्य मंदिर का जीर्णोद्धार काफी पहले नवाब मंसूर अली ने कराया था. उन्होंने इसके लिए पैसा भी दिया था और जमीन भी. अयोध्या का एक और प्रमुख मंदिर है कनक भवन. इस मंदिर का मैनेजर भी मुस्लिम रहा है. इसके अलावा अयोध्या के मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले पूजा के फूल और दूसरी सामग्रियां भी मुसलमान पुश्तों से पैदा करते रहे हैं. भगवान के गले में पड़ने वाली मालाएं भी मुस्लिम हाथ ही पिरोते रहे हैं. तो ये है वो आपसी सद्भाव जो सैकड़ों साल से कायम है, जिसे हम फख्र से तहजीब कहते हैं, जो हिंदुस्तानियत को आध्यात्मिक रूप से अभिव्यक्त करता रहा है.

अयोध्या भारतीय अस्मिता के प्रतीक ‘राम’ से संबद्ध है - ये सच है. लेकिन सिर्फ यही सच नहीं है. सच ये भी है कि अयोध्या जितनी हिंदुओं की है, उतनी ही बौद्धों, मुसलमानों, जैनियों, सिखों, कबीरपंथियों की भी है. गौतम बुद्ध यहां अनेक वर्ष रहे तो जैन धर्म के अनेक तीर्थंकर अयोध्या से संबद्ध रहे. गुरुनानक भी यहां से जुड़े रहे. कबीरपंथियों, शैवों और वैष्णवों की भी ये पवित्र भूमि रही. हिंदू पुराकथाओं के अनुसार मनु, ब्रह्मा, भगीरथ से भी अयोध्या संबद्ध रही. तब अयोध्या बहुत बड़ा राज्य हुआ करता था. संभवत इसी अयोध्या से अवध नाम भी निकला. दिलचस्प ये है कि आज अयोध्या इसी अवध का ही एक भाग है. दोनों में साम्यता ये भी है कि दोनों नाम से ही हिंसा का निषेध करते हैं. सिर्फ अयोध्या में ही नहीं, अयोध्या के मूल्य-संस्कार पूरे अवध में भी दिखते हैं, तभी तो अयोध्या के पास लखनऊ में कभी खान साहेब का शिवालय बना तो पाठकजी की मस्जिद भी. यही नहीं, शहर का सबसे पुराना हनुमान मंदिर भी मुस्लिम जागीरदार के दान और मदद से ही खड़ा हुआ. मजे की बात ये है कि अयोध्या में भगवान की मालाएं बनाने वाले जहां पुश्तैनी मुसलमान हैं,  वहीं अवध में मोहर्रम में उठने वाले ताजिया के पुश्तैनी कारीगर ज्यादातर हिंदू हैं. मोहर्रम के मौके पर अवध के हिंदू शायर ने फरमाया था कि -

‘सुतवते तौहीद से गर
मुसलमां हट जाएंगे,
हिंदू होके मैं उठाऊंगा
अलम अब्बास का.’

तो ये वही अवध है, जो नवाब वाजिद अली शाह, बेगम हजरतमहल, नवाब आसिफुद्दौला के नाम से भी याद किया जाता है, जिनमें अयोध्या की आत्मा है तो अवध की महक है. तभी तो पंजवक्ता नमाजी होने के बावजूद वाजिद अली शाह लिखते हैं -

‘हम इश्क के बंदे हैं
मजहब से नहीं वाकिफ
गर काबा हो तो क्या
बुतखाना हो तो क्या.’

गौरतलब ये है कि अयोध्या के मूल्य वाजिद अली शाह की इन पंक्तियों में दिखते हैं तो सैकड़ों साल पहले मर्यादा पुरुषोत्‍तम राम को आराध्य मान ‘रामचरित मानस’ की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास भी अयोध्या जाते हैं और लिखते हैं -

‘....मांग के खइबे
मसीद में सोइबे....’

तात्पर्य ये था कि ‘मेरा क्या, दिन भर राम के गुण गाऊंगा और रात में मस्जिद की सीढ़ियों पर सो जाऊंगा...’ आशय ये है कि अयोध्या और अवध के संस्कार सभी को सद्भाव से दिल खोल कर समेटते हैं, कोई दुराव या भेद नहीं करते. तभी तो 1857 के पहले स्वातंत्र्य संग्राम में चाहे मौलवी अहमदउल्ला हों या फिर बेगम हजरतमहल - वे नानासाहब, झांसी की रानी और तात्या टोपे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन फिरंगियों के खिलाफ एक हो जाते हैं, जो हिंदुस्तानियत पर हमला करते हैं, हमारी आत्मा पर चोट करते हैं. आशय यह है कि हिंदुस्तानियत के मूल्यों में अयोध्या की उस आध्यात्मिक ध्वनि को भी सुना जाए - जो सिर्फ सर्वधर्म समभाव में ही यकीन नहीं करती, उसमें सम्राट अशोक की बुद्धं शरणं गच्छामि के संस्कार हैं तो बादशाह अकबर के सुलह-ए-कुल के भी, जिसमें अवध के किसान आंदोलन की सुगंध भी है, जिसकी अगुवाई कभी बाबा रामचंदर, जवाहरलाल नेहरू और आचार्य नरेंद्र देव ने की थी.

समन्वय की चाहत

जहां तक राम की बात है तो कहने की जरूरत नहीं कि राम भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के साथ सद्भाव और भाईचारे के भी प्रतीक हैं. वो भारतीयता के पर्याय हैं, लेकिन समझा जाना चाहिए कि तुलसी और वाल्मीकि के राम जहां अपनी विराटता के चलते सभी के आराध्य हैं, तो कबीर और गांधी के राम भी उतने ही विराट और स्तुत्य हैं - जो सभी को बंधुत्व और स्नेह की डोर से जोड़ते ही नहीं, अपना भी बनाते हैं. इसीलिए बापू ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम कहते हुए सभी को ‘सन्मति’ देने का आग्रह भी करते हैं. 2010 और आने वाला वक्त आधुनिकता के साथ इन सभी का समन्वय चाहता है. याद रखने की बात ये है कि इसीलिए अयोध्या न तो 1992 में, न उसके पहले और न ही उसके बाद कभी आक्रामक हुई है और न ही अमर्यादित. और हो भी कैसे, आखिर समृद्ध मूल्य-संस्कारों के साथ ही वो मर्यादा पुरुषोत्‍तम से जो संबद्ध है. लेकिन उन सभी लोगों को अयोध्या से प्यार-मोहब्बत और सहिष्णुता सीखने की जरूरत है, जो उसके नाम पर बार-बार सीमा लांघते रहे हैं. उन्हें समझना चाहिए कि चाहे खून किसी का भी बहे, उसका रंग एक होता है और उसके बहने पर रोती मानवता ही है. विध्वंस चाहे अयोध्या में हो या अफगानिस्तान के बामियान में - उस पर विकास और भाईचारे की इबारत तो नहीं लिखी जा सकती.

और अंत में

‘ये मस्जिद है वो बुतखाना
चाहे ये मानो या वो मानो
तुम्हें है एक ही राह जाना
चाहे ये मानो या वो मानो.’

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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