आज की पत्रकारिता की हकीकत हैं बरखा दत्त

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लगभग एक माह से बरखा दत्त को लेकर मीडिया जगत में जंग जारी है। वीर साहब तो अपना कालम लिखना बंद कर संन्यास पर जाने के संकेत दे दिये लेकिन बरखा दत्त को लेकर अभी भी खीचतान जारी है। एनडीटीवी भले ही उसका बचाव करे लेकिन बरखा दत्त अपना सब कुछ लुटा चुकी हैं। सच यही है कि आज अधिकांश पत्रकार किसी न किसी स्तर पर बरखा दत्त की तरह लाबिंग करने में जुटे हुए हैं। यह अलग बात है कि बरखा दत्त और वीर सांघवी इस खेल में एक्सपोज हो गये और आज यह मुद्दा हाटकेक बना हुआ है। लेकिन यह तो आज न कल होना ही था। आखिर बकरा कब तक खैर मनायेगा। सवाल यह है कि पत्रकारिता का धंधा भले ही विश्वास का धंधा है लेकिन इस धंधे को चलाने वालों को मुनाफा चाहिए है और अपने गलत कमाई को इस धंधे के सहारे जारी रखने का जरिया चाहिए।

जब उद्देश्य ही गलत है तो फिर इससे बेहतर परिणाम की बात सोचना ही बेमानी है। आखिर कोई भी मालिक जनता के लिए लाखों की पगार क्यों आप पर खर्च करेगा। कोई भी व्यवसायी सौ करोड़ से अधिक की पूंजी का निवेश जनता के लड़ाई के लिए क्यों करेगा। कई ऐसे सवाल हैं। जिस तरह के लोग पत्रकार बन रहे है उनसे क्या उम्मीद कि जा सकती है। वे तो नौकरी करने आये हैं। जहां बेहतर पगार मिलेगा, वहीं नौकरी करेंगे। साथ ही नौकरी में बने रहें, इसके लिए जो भी डील-डाल करने को कहा जाएगा, वे करते रहेंगे। यह तो अब आप पर निर्भर करता है कि आप इस तरह की डील-डाल में अपना दामन कब तक दागदार होने से बचाते रहते हैं। सवाल यह भी है कि काम कोयले के खादान में करेंगे और फिर कालिख लगने से परहेज करेंगे, यह कैसे सम्भव है।

मित्रों, वक्त आलोचना करने का नही है, बरखा दत्त के हश्र से सीख लेने का है। पूरी मशीनरी चौथे खम्भे को लेकर कही ज्यादा संवेदनशील हो गई है। लोग चाहते हैं कि मेरी मर्जी पर कोई रोक न लगाये, कानून का हाल तो आप देख ही रहे हैं। कोर्ट अपने गिरेबान में झांकने के बजाय दूसरे को नसीहत देने में लगा है। ऐसे में आपकी जवाबदेही कही ज्यादा बढ गयी है। इस मैदान में जमे रहने के लिए इस तरह के कार्य करने की मजबूरी है। इस मजबूरी से बाहर निकलने का कोई मान्य फर्मूला नही है। ऐसे में सब कुछ आपके विवेक औऱ सोच पर निर्भर है। वक्त आ गया है अपने आपके बारे में सोचने का। बरखा दत्त के तेवर को मरने न दें, भले ही एक बरखा सिस्टम की भेंट चढ गयीं लेकिन सौ बरखा के पैदा होने जैसी उर्वर भूमि अभी भी मौजूद है। आलोचना के बजाय बरखा की उन अदाओं का जिन्दा रखने की जरूरत है जो आज भी करोड़ों भारतीयो के दिल पर राज कर रही है।

पटना के पत्रकार संतोष कुमार सिंह के ब्लाग तूती की आवाज से साभार


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Comments (1)Add Comment
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written by ksshailendra, December 09, 2010
bahut sahi kaha aapne aaj media ki yahi sthiti ho gayi hai visheskar electronic media ki.... lekin aap jaise kuch log abhi bhi yahan maujud hain jo tamam tarah ki in nakaratamak chijon ke hone ke babjud is kshetra ki achhai dekhne ki kosis kar rahe hain

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