तब अखबार के दफ्तर में लॉबिस्टों के लिए कोई जगह नहीं होती थी

E-mail Print PDF

: विश्वसनीयता का बड़ा सवाल : पिछले दिनों मीडिया पर केंद्रित एक टीवी कार्यक्रम में प्रसिद्ध पत्रकार दिलीप पडगांवकर कुछ पुरानी यादों में खो गए। उन्होंने बताया कि पुराने दिनों में किसी अखबार के दफ्तर में लॉबिस्ट के लिए कोई जगह नहीं थी। यह आजकल के मीडिया के व्यवहार के बिल्कुल विपरीत था, जब नीरा राडिया फोन मिलाकर मीडिया के दिग्गजों से इसलिए दोस्ताना बात करती है ताकि वे कांग्रेस तक द्रमुक के विचार पहुंचा सकें। उनकी हताशा से यही लगता है कि आज संसार कितना गिर चुका है। भारतीय मीडिया का सुनहरा युग, जब संपादकों का एकछत्र राज था, जब बहुत कम पैसे में ही संपादक मिशन के तौर पर काम करते थे और जब प्रबंधन संपादकीय विभाग में दखल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था, बड़ा मनोहारी विचार है। यह आनंददायक और आत्म-तुष्टि का मिथक भी था।

1986 में, मुंबई से प्रकाशित एक छोटे साप्ताहिक पत्र ने रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि भारत में दूसरे सबसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति ने एक बड़ी कंपनी के तीन हजार अपरिवर्तनीय डिबेंचरों को खरीदने के लिए निजी बैंक से ऋण लिया और कंपनी को लाभ पहुंचाया। इससे मामला और उलझ गया कि एक प्रमुख समाचार पत्र ने तब तीखा संपादकीय लिखा था, जिसमें इन अपरिवर्तनीय डिबेंचरों के शेयरों में परिवर्तन पर लगाए गए प्रतिबंधों की आलोचना की गई थी। आज पत्रकार, खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बड़े रिपोर्टर विख्यात हो चुके है। साथ ही उनमें वे अवगुण भी प्रवेश कर गए है जो प्रसिद्धि के साथ जुड़े हुए है। भारत इंग्लैंड के स्ट्रीट ऑफ शेम कॉलम की बराबरी तो नहीं कर सकता, जहां सत्ता के गलियारे के तमाम महत्वपूर्ण व्यक्तियों के आचरण पर बेबाक निर्दयतापूर्वक टिप्पणियां और पड़ताल की जाती है, किंतु राडिया टेप प्रकरण से यह भरोसा तो खत्म होना ही चाहिए कि मीडिया जांच-पड़ताल से ऊपर है।

1986 में एक संपादक अलिखित आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी पाए जाने पर व्यक्तिगत शर्मिदगी से अधिक कुछ हासिल नहीं कर सकता था। बिगड़ैल क्रिकेटरों की तरह विख्यात पत्रकार यह नहीं कह सकते कि मैच फिक्सिंग एक छोटी-सी चूक है। पत्रकार जितना नामीगिरामी होगा उसका वजन उतना ही अधिक होगा, उससे अपेक्षाएं भी उतनी अधिक रखी जाएंगी और उसका पतन भी उतना ही अधिक होगा। तमाम बुराइयों को दूर करने का ठेका रखने और तमाम मूल्यों के पोषक होने का दंभ भरने वाला और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया अगर खुद गलती पर होगा तो उसे मध्यम वर्ग के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ेगा, जो आम तौर पर धोखेबाज राजनेताओं के लिए आरक्षित रहता है।

राडिया टेप से मीडिया को अपूरणीय क्षति हुई है। अनेक पत्रकारों के साथ राडिया की हुई बहुत सी बातचीत नुकसानदायक नहीं है। मसलन, कुछ सूचनाओं का आदान-प्रदान और मीडिया की उठापटक पर कुछ टिप्पणियां, किंतु तीन वार्ताओं ने ध्यान खींचा है। पहली, पत्रकारों से यह गुजारिश की वे उनका संदेश ऊपर तक पहुंचाएं और महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों को प्रभावित कराएं। इसके अलावा एक विख्यात उद्योगपति से पहले से तैयार इंटरव्यू के बारे में चर्चा और तीसरी बातचीत एक संपादक से होती है, जिसमें वह अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एक उद्योगपति के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को प्रभावित करने का प्रयास करने को कहता है। इस पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि शुरू में मीडिया ने इस मुद्दे की पूरी तरह से अवहेलना की। इसका रुख था जैसे कुछ हुआ ही न हो। यही नहीं, तीनों पत्रकारों ने वेब पर बयान जारी किया कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। मीडिया के दोहरे मानकों पर जनता ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए इसकी जवाबदेही तय करने की मांग की। राडिया से जुड़े टेपों पर हुए हंगामे ने निश्चित तौर पर मीडिया को हिलाकर रख दिया है और हाशिये पर पड़े नैतिक और व्यावसायिक मुद्दों को मुखर कर दिया है।

सबसे पहला सवाल उद्योगपतियों द्वारा मीडिया के संबंधों से लाभ उठाने का है, जो अनेक छद्म रूपों जैसे लॉबिइस्ट, जन संपर्क कंपनियों, ब्रांड प्रमोशन और सलाहकार समूहों के रूप में सामने आता है। यह मानना कि मीडिया इनका तिरस्कार कर देगा, जैसाकि पडगांवकर सुझाव देते है, निरर्थक है। जनमानस को प्रभावित करना औद्योगिक आवश्यकता बन गई है और बहुत से मीडिया घरानों ने जनसंपर्क एजेंसियों को यह काम सौंप रखा है। भारत में पूंजीवाद की गति बहुत तेज है और मीडिया के इससे व्यावसायिक हित जुड़े है। यह मानना बिल्कुल बेतुका है कि औद्योगिक हितों से संधि मात्र गलत है।

पत्रकारों को लॉबिस्टों के साथ काम करना चाहिए और परस्पर भरोसे के संबंध भी विकसित करने चाहिए, किंतु साथ ही यह भी समझना चाहिए कि कब ‘न’ कहना होगा। दूसरे, यह सुझाव कि स्रोत की पहचान सुनिश्चित होनी चाहिए, अव्यवहारिक है। सार्थक राजनीतिक पत्रकारिता में संबंध गोपनीय ढंग से विकसित होते है। एक अच्छे श्चोत को विकसित होने में बरसों लगते है। बरखा दत्ता का गैरपेशेवर रुख द्रमुक में विभाजन की खबर न चलाना और साथ ही राडिया के लिए कुरियर के तौर पर काम करना है। राडिया टेप में मीडिया का अनैतिक पक्ष ही प्रत्यक्ष होता है। मीडिया ने अपने अंदर मौजूद घोटालेबाजों, फिक्सरों और आम अपराधियों की बढ़ती संख्या पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है। इनमें से अधिकांश छोटे शहरों में है। यही असल कैंसर है, जिसका इलाज होना चाहिए।

स्वप्न दासगुप्ता लिखित यह आलेख दैनिक जागरण में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.


AddThis
Comments (0)Add Comment

Write comment

busy