एक और दो नंबरी पत्रकारिता में अंतर साफ होगा

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राडिया टेप को लीक करने वाले ने चाहे जिस नीयत से यह खुलासा किया हो, इससे लोकतंत्र का भला होगा। शुरुआत में जाहिर है, सबका ध्यान बड़े नामों और उनके छोटे कामों पर जाएगा, लेकिन इस बहाने कुछ बुनियादी और संस्थागत सवाल उठाने की गुंजाइश बनी है। असली खतरा यह नहीं है कि इससे पत्रकारिता बदनाम हो जाएगी। देश में ईमानदार पत्रकारों की कमी नहीं है। लेकिन पत्रकारिता को जांच के दायरे में लाने से एक और दो नंबरी पत्रकारिता में अंतर साफ होगा। अगर नेताओं और बाबुओं के भ्रष्टाचार को परोसने वाला मीडिया खुद अपने पर उठे सवालों पर कन्नी काटता नजर आएगा, तो उससे हर ईमानदार पत्रकार का कद छोटा होगा। प्रेस परिषद्, एडिटर्स गिल्ड और ऐसी संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती है कि वे राडिया टेप में आए पत्रकारों की जांच करवाएं और आचार संहिता बनाएं।

राडिया टेप से असली खतरा यह है कि या तो हम ‘हर कोई चोर है’ वाली मानसिकता में आ जाएंगे या फिर कुछ दिन चस्का लेकर खेल खत्म चिंता हजम वाली राष्ट्रीय मुद्रा अपना लेंगे। अमर सिंह टेप मामले में भी यही हुआ था। लोगों ने नेताओं और एक वरिष्ठ संपादक के अश्लील संवादों को मजे लेकर सुना, फिर एक स्टे ऑर्डर के बहाने सब कुछ रफा-दफा कर दिया। अगर हम उस कहानी का दोहराव नहीं चाहते, तो पत्रकारिता और लोकतंत्र के रिश्तों के बारे में हमें कुछ कड़वे सच का सामना करना होगा। इसे सिर्फ कुछ पत्रकारों की नैतिकता के सवाल से आगे पूरे मीडिया तंत्र के ढांचे से जोड़ना होगा। इसका मतलब होगा मीडिया और पूंजी, मीडिया और राजनीति तथा मीडिया और समाज के रिश्तों की शिनाख्त करना। राडिया प्रकरण मीडिया और पूंजी के रिश्तों के एक छोटे-से पहलू का परदाफाश करता है। कहना गलत नहीं होगा कि बड़े-बड़े संपादक उद्योगपतियों की हाजिरी बजाते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव और उसके बाद इसके एक संस्थागत पहलू का खुलासा हुआ। अनेक अखबारों ने चुनाव में पार्टियों और उम्मीदवारों के पक्ष में खबरें छापने के दाम वसूले। मीडिया और पूंजी के इस नापाक रिश्ते पर कुछ बंदिशें लगनी जरूरी हैं, ताकि खबरों की खरीद-फरोख्त पर पाबंदी लगे।

मीडिया और राजनीति का रिश्ता परोक्ष से प्रत्यक्ष तक पूरी इबारत से बंधा है। देश के कई इलाकों में राजनेता या उनके परिवार मीडिया के मालिक हैं और उसका इस्तेमाल खुल्लमखुल्ला अपनी राजनीति के लिए करते हैं। एक मायने में यह प्रत्यक्ष नियंत्रण कम खतरनाक है, क्योंकि हर कोई इसे जानता है। इससे ज्यादा खतरनाक है ‘स्वतंत्र’ मीडिया पर पिछले दरवाजे से कब्जा। तमाम राज्य सरकारें अखबारों पर न्यूजप्रिंट, विज्ञापन और प्रलोभन के जरिये दबाव बनाती हैं। हरियाणा में चौटाला सरकार के दौरान इन हथकंडों में दादागीरी भी जुड़ जाती है। बिहार में नीतीश कुमार जैसे नफीस मुख्यमंत्री भी मीडिया को ‘मैनेज’ करने के हथकंडे अपनाते पाए जाते हैं। कश्मीर और पूर्वोत्तर में सुरक्षा बल भी मीडिया पर बंदिश लगाते हैं। मीडिया को इस दबाव से मुक्त करने के लिए चुनाव आयोग को मीडिया और राजनीति के रिश्तों की शिनाख्त करने का अधिकार मिलना चाहिए।

मीडिया और समाज के रिश्ते में दो पक्ष चिंताजनक हैं। पहला तो यह कि हमारा मीडिया और मीडियाकर्मी महानगरों के उपभोक्तावादी वर्ग की चिंताओं से ग्रस्त हैं। देश के आम नागरिक के दुःख-सुख खबरों की दुनिया से कमोबेश गायब हैं। हाल ही में मेरे संस्थान सीएसडीएस के एक शोध ने देश के शीर्ष हिंदी और अंगरेजी अखबारों की खबरों का विश्लेषण कर एक खौफनाक तसवीर पेश की। इसके मुताबिक, शीर्ष छह अखबारों में कुल छपी खबरों में महज दो फीसदी गांव-देहात के बारे में थीं। उन दो फीसद में भी अधिकांश हिंसा और आपदा से जुड़ी थीं। गांव की महज एक चौथाई खबरों का ताल्लुक खेती या गांव के विकास से था।

दूसरा चिंताजनक पक्ष मीडियाकर्मियों की सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है। कोई चार साल पहले कुछ पत्रकारों के साथ मिलकर मैंने दिल्ली के ‘राष्ट्रीय मीडिया’ के शीर्ष पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि का खुलासा किया था। उस वक्त देश की खबरें तय करने वालों में 83 फीसदी पुरुष थे और 86 फीसदी हिंदू, द्विज जातियों से। राष्ट्रीय मीडिया में मुसलमान सिर्फ चार प्रतिशत, पिछड़ी जातियां भी इतनी ही और दलित-आदिवासी शून्य थे। पिछले साल प्रमोद रंजन द्वारा बिहार के हिंदी मीडिया के शोध से पता लगा कि 87 फीसदी पत्रकार सवर्ण हिंदू परिवार से थे। बेशक हर किसी का विचार अपनी जाति-समुदाय से बंधा नहीं होता, लेकिन अगर मीडिया समाज के चरित्र से इतना अलग हो, तो इसका खबरों पर असर पड़ना अवश्यंभावी है। जाहिर है, मीडिया और समाज के रिश्तों पर कोई कानून नहीं बन सकता। लेकिन हमें ऐसी संस्थाओं की जरूरत है, जो इन रिश्तों की लगातार पड़ताल कर मीडिया को आईना दिखा सकें। मीडियाकर्मियों की सामाजिक पृष्ठभूमि के आंकड़े सार्वजनिक करने की जरूरत है।

राडिया टेप की उलझी गांठें सुलझाने के लिए जरूरी है कि हम इन बड़े सवालों पर ध्यान देकर कुछ संस्थागत उपाय सोचें। लोकतंत्र में सिर्फ नेता और बाबू ही नहीं, कोर्ट-कचहरी और मीडिया सहित हर किसी को जवाबदेह होना चाहिए। यह लेख पत्रकार बंधुओं को पर उपदेश जैसा न लगे, इसलिए बता दूं कि मैं कई बार चुनावी सर्वे पर एक आचार संहिता की वकालत कर चुका हूं, चुनाव के दौरान एग्जिट पोल भविष्यवाणियों पर पाबंदी का समर्थन कर चुका हूं। सर्वेक्षणों के लिए अनिवार्य होना चाहिए कि वे अपने पैसे के स्रोत, सैंपलिंग तकनीक और सैंपल की सामाजिक पृष्ठभूमि का खुलासा करें।

भोपाल रिपोर्टर ब्लाग से साभार


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