क्या पेड न्यूज़ के खिलाफ मुहिम बेकार गई (अंतिम)

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मुकेश कुमारअब सवाल ये उठता है कि बिहार विधानसभा चुनाव में पेड न्यूज़ का कारोबार जमकर हुआ है तो क्या ये मान लिया जाए कि पेड न्यूज़ का विरोध करना बेकार है? एक बार फिर ये साबित हो गया है कि चौतरफा विरोध का मीडिया संस्थानों पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। वे पहले की तरह ही अपनी टारगेट तय कर रहे हैं और उसे पूरा भी। इसके लिए बेशक उन्हें नए रास्ते खोजने पड़ रहे हैं मगर वे अपना रास्ता बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें मुनाफ़ा चाहिए और किसी भी कीमत पर चाहिए, इसके लिए पत्रकारिता की ऐसी-तैसी होती हो तो हो। यानी वे बदलने वाले नहीं हैं चाहे लोग उन्हें कोसते रहें और हाहाकार मचाते रहें।

लेकिन ये एक बहुत नकारात्मक रवैया  होगा। बिहार में जब हम बहुत से पत्रकारों ने पेड न्यूज़ के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने की ठानी थी, तब भी हम लोग जानते थे कि इसकी वजह से पेड न्यूज़ रुकने वाली प्रवृत्ति नहीं है। फिर जब हमने इसके ख़िलाफ़ कार्यक्रम किए तो पत्रकारों की भागीदारी और उन कार्यक्रम को मिले कवरेज ने भी साबित कर दिया कि मीडिया संस्थानों का इरादा कुछ और है और उन्हें ये सब रुचिकर नहीं लग रहा। सर्वदलीय प्रेस कांफ्रेंस के प्रति मीडिया का रुख़ तो और भी बड़ा प्रमाण था। इसके बावजूद हम लोग लगे रहे तो ये सोचकर कि कुछ करना चाहिए और कुछ करेंगे तो कुछ न कुछ असर ज़रूर होगा। इसे हमने मुहिम की शुरूआत के तौर पर देखा था और ये भी सोचा था कि अगर पटना से शुरू होकर अगर देश के दूसरे हिस्सों में भी इस तरह का संगठित विरोध होगा तो आज नहीं तो कल ये मुहिम रंग लाएगी।

बिहार में पत्रकारों द्वारा चलाई गई मुहिम भी कोई बहुत अच्छे  ढंग से नहीं चल पाई। हम बहुत ज़्यादा लोग उससे नहीं जोड़ पाए और न ही इसमें  धार ला पाए। ये सभा- सेमिनारों  तक ही सीमित होकर रह गई।  अगर ये थोड़ा और नीचे तक यानी ज़िला स्तर तक पहुँच पाती और इसमें हम निगरानी  व्यवस्था का इंतज़ाम कर पाते तो शायद इसका प्रभाव ज़्यादा  दिखता। लेकिन इसके बावजूद इस पहल को लोगों ने पसंद किया। इसकी सबसे बड़ी वजह तो ये थी कि पहली बार पत्रकार  बिरादरी खुलकर पेड न्यूज़ के ख़िलाफ़ मैदान में  उतरी और उसने समाज के विभिन्न  तबकों को भी इसमें जोड़ने की कोशिश की। इसी मुहिम के तहत पहली मर्तबा राजनीतिक वर्ग भी एकजुट होकर सामने  आया और उसने अपना मुखर विरोध  भी दर्ज़ कराया।

खुद राजनीतिक दलों और नेता स्वीकार करते हैं कि इस बार पिछले चुनाव  जैसी गंदगी नहीं देखने  को मिली और ये पेड न्यूज़ के ख़िलाफ चलाई गई मुहिम के कारण ही संभव हो सका। ऐसा मानने वालों में सत्तारूढ़  गठबंधन के नेता भी शामिल हैं। हाँ, ये बात भी सही है कि इस मुहिम से सबसे ज़्यादा विपक्ष था क्योंकि सरकारी पेड न्यूज़ ने उसे मीडिया से बाहर कर रखा था और ख़ास तौर पर क्षेत्रीय पार्टियाँ इस मामले में उसका मुक़ाबला कर पाने में सक्षम नहीं थी। बहुत सी छोटी-छोटी पार्टियाँ जैसे वामपंथी दल जिनकी आर्थिक हैसियत जगज़ाहिर है वे भी इसे आशा की नज़रों से देख रही थीं। इसके अलावा एक अच्छी बात ये रही कि आम लोगों में पेड न्यूज़ के कारोबार को लेकर जागरूकता बढ़ी, उन्हें मालूम हुआ कि मीडिया में किस तरह से ख़बरें खरीदी-बेची जा रही हैं और उन्हें जो परोसा जा रहा है वह कितना सच्चा या झूठा है।

कहने का मतलब ये है कि पेड न्यूज़ के ख़िलाफ़ मुहिम बिहार  की प्रयोगशाला में एक शुरूआती  प्रयोग भर थी और उसका कमोबेश असर भी हुआ है और लाभ भी।  मगर अब ज़रूरत इस बात की है कि देश के अन्य भागों  में भी पत्रकार एकजुट  होकर पेड न्यूज़ की मुखाल्फत करें तो आज नहीं तो कल उसका असर होगा ही। और अगर पेड न्यूज़ का कारोबार नहीं रूक सका तो इतना तो होगा ही कि हर पाठक और दर्शक ख़बरों की दुनिया के इस वीभत्स सच को जान जाएगा और तब वह खुद हिसाब लेना शुरू कर देगा।

लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों व न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. हाल-फिलहाल मौर्य टीवी को लांच कराकर नंबर वन बनाने का श्रेय इन्हीं को जाता है. पटना में मौर्य टीवी के अपने कार्यकाल के दौरान मुकेश कुमार ने पेड न्यूज के खिलाफ साहसिक पहल की. पत्रकारों को एक मंच पर ले आए और नेताओं को भी ये कहने को मजबूर किया कि वे पेड न्यूज के धंधे में शामिल न होंगे. मुकेश फिलहाल एक नए राष्ट्रीय न्यूज चैनल की लांचिंग में जुटे हुए हैं. इस व्यस्तता से वक्त निकालकर उन्होंने पेड न्यूज पर तीन पार्ट में लिखा है, जिसका पहला और दूसरा पार्ट आप लोग पढ़ चुके हैं. ये तीसरा और अंतिम पार्ट है. मुकेश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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