धमाके का खेल और आईबी की सूचना

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नूतनमायावती और केन्द्र सरकार में अभी तकरार चल रही है कि वाराणसी बम धमाके में किसकी गलती मानी जाए. होम मिनिस्टर पी चिदंबरम भी सब जगह नहीं जाते पर वाराणसी तुरंत पहुँच गए क्योंकि वहाँ राजनैतिक खेल जो खेलना था. आते ही यह बयान भी दे दिया कि केन्द्र ने तो राज्य सरकार को चेताया था पर राज्य सरकार ने उस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया. लिहाजा इस बम धमाके के लिए राज्य सरकार की शिथिलता ही प्रमुख कारण है.

मायावती कहाँ पीछे रहने वाली थीं. तुरंत अपने कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह को आदेश दिया कि प्रेस बुलाओ और उन्हें बताओ कि ये सारी गलती केन्द्र सरकार की है. शशांक शेखर ने प्रेस वालों को बुलाया और उनको बताया कि राज्य सरकार नहीं, केन्द्र सरकार इसके लिए जिम्मेदार है. साथ ही यह भी कहा कि जिस प्रकार से केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश की है वह पूरी तरह से गलत और औचित्यहीन है. लेकिन इतना कहने के साथ-साथ उन्होंने 25 फरवरी 2010 तथा 26 नवंबर 2010 के आईबी के दो कथित अलर्ट भी दिखाए. दिखाए अभिलेख के अनुसार 25 फरवरी वाले अलर्ट में दशहरा मेला के समय दशाश्वमेध घाट पर सुरक्षा के बारे में सामान्य किस्म का अलर्ट था और 26 नवंबर  को बाबरी मस्जिद की शहादत से जुड़ा एक अलर्ट था.

यद्यपि मूल अलर्ट मैंने नहीं देखे हैं, अतः निश्चित तौर पर तो नहीं कह पाऊंगी पर पुलिस विभाग के इतना नजदीक रह कर एक चीज़ तो जरूर देखा है कि यहाँ इंटेलिजेंस और अभिसूचना के नाम पर ऐसे ही अति-सामान्य किस्म की सूचनाएं आती-जाती रहती हैं, जिन्हें ये लोग बड़े शान से अलर्ट जैसा सम्मानित नाम देते हैं. मुझे एक पुलिस अधिकारी, जो उत्तर प्रदेश अभिसूचना के लंबे समय तक रहे थे, ने स्वयं एक किस्सा बताया था कि किस तरह के अलर्ट आईबी और रा जैसी नामचीन संस्थाओं से आते रहते हैं. उनका कहना था कि एक बार वे शाम में दफ्तर से उठ ही रहे थे कि एक ‘अलर्ट’ उनके सामने रखा गया. अलर्ट में लिखा था- “दो लोग कल पाकिस्तान से पंजाब सीमा में घुस आये है. दोनों कम उम्र के, औसत कद-काठी के और सामान्य रंग-रूप के हैं. दोनों ने शर्ट-पैंट पहन रखी है और ऐसा लगता है कि वे किसी बड़ी वारदात के चक्कर में भारत आये हैं.”

उनका यह कहना था कि यह अलर्ट देख कर मैंने सर पीट लिया कि अब इस अलर्ट का क्या करूँ. अपने पास भी नहीं रख सकता था कि यदि कोई बात हो गयी और ऐसे ही किन्हीं लोगों ने वारदात कर दिया तो मेरी नौकरी खतरे में. लेकिन भेजूंगा भी तो इसका क्या फायदा होगा, यह मैं खूब समझ रहा था. इस तरह के तो इस देश में करोड़ों लोग होंगे, तो पुलिस फिर कितने सारे कम उम्र के, औसत कद-काठी के और सामान्य रंग-रूप के शर्ट-पैंट पहनने वाले लोगों की तलाश लेती रहेगी. फिर इससे भी हद तब हो गयी कि जब मैंने कुछ इसी तरह का एक समाचार अगले दिन एक टीवी चैनल पर भी देख लिया.

यह कहानी बताने के बाद उन अधिकारी का यही कहना था कि इस प्रकार के अलर्ट केवल दिखावा होते हैं, झूठी कोशिश होती है अपनी अहमियत कायम रखने की और बेकार के प्रयास होते हैं जिसमे केवल कागज काले होते हैं. मुझे लगता है उनकी बात शायद कोई बहुत गलत नहीं थी.

सचमुच इस तरह से अलर्ट भेज कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करना किसी भी प्रकार से उचित नहीं जान पड़ता है. ऐसे में मुझे शशांक शेखर की बात वाजिब ही लगती है जब वे कहते हैं- “ राज्य उन्हीं सूचनाओं पर कार्य कर सकती है जो स्पष्ट हो और जिस पर क्रिया की जा सके.” बाकी बेकार की सूचनाओं का ताना-बाना अब बंद होना चाहिए. इस तरह के खेल इन अभिसूचना ईकाईओं ने शायद बहुत खेल लिया है.

इस सब से यह जरूर जान पड़ता है कि इस बार मायावती सरकार का केन्द्र पर आरोप बिल्‍कुल वाजिब है. यदि ऐसा नहीं होता और इसके विपरीत यदि राज्य सरकार गलतबयानी कर रही होती तो केन्द्र सरकार अभी तक चुप नहीं रही होती और चिदंबरम जरूर सामने आते और बताते कि किस प्रकार की महत्वपूर्ण सूचनाएं दी गयी थी, जिन पर कार्रवाई नहीं हुई.

डॉ नूतन ठाकुर,

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ


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