सच से डर लगता है

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गिरीश: श्याबाओ हों या विकिलीक्स- कहानी एक है : 'चीन तब तक दुनिया का नेता नहीं बन सकता, जब तक कि वो मानवाधिकार हनन नहीं रोकता. हालांकि लू श्याबाओ की कहानी एक अरब से ज्यादा लोगों में से एक व्यक्ति की कहानी है, लेकिन ये व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के प्रति चीन की सरकार की असहिष्णुता का प्रतीक है.' आर्चबिशप डेसमंड टूटू और वेस्लाव हावेल (दोनों नोबेल शांति पुरस्कार के पूर्व विजेता). ’चीन ने जो किया वो दुखद है...बहुत दुखद. एक मनुष्य होने के नाते मैं श्याबाओ की ओर अपना हाथ बढाना चाहती हूं.' आंग सान सू ची (नोबेल शांति पुरस्कार की पूर्व विजेता). ’इस साल 2010 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता श्याबाओ का काम तुलनात्मक रूप से मुझसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है... मैं अपील करता हूं कि चीन सरकार उन्हें तुरंत रिहा करे.' बराक ओबामा (2009 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता).

दरअसल ये कुछ बानगी हैं जो चीन में 11 साल की कैद की सजा काट रहे उस लू श्याबाओ के समर्थन में दुनियाभर में उठती आवाजों का प्रतिनिधित्व करती हैं. वैसे श्याबाओ ऐसे पहले व्यक्ति नहीं हैं जो जेल में होने के कारण नोबेल शांति पुरस्कार लेने के लिए ओस्लो नहीं जा पाए हैं. उनके पहले भी ऐसे कई लोग हो चुके हैं. बर्मा में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन की नेता आंग सान सू ची उनमें से एक हैं. लेकिन श्याबाओ 1936 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कार्ल वॉन ओसिट्जकी के बाद पहले जरूर हैं, जो जेल की सजा के कारण न तो ओस्लो खुद जा सके और न ही उनका कोई परिजन या प्रतिनिधि ही वहां पहुंच सका. नतीजतन 75 साल के बाद पुरस्कार समारोह में शांति पुरस्कार विजेता की कुर्सी खाली रही. श्याबाओ की पत्नी लू च्याई को भी उनके ही घर में न केवल नजरबंद रखा गया है, वहां पर टेलीफोन तक काट दिए गए हैं, बल्कि उनके घर के बाहर से भी तस्वीरें लेने पर पत्रकारों पर रोक है.

कुछ ऐसी ही स्थिति 1936 में नाजी विरोधी जर्मन पत्रकार ओसिट्जकी की भी थी. हिटलर ने न केवल ओसिट्जकी को या उसके किसी परिजन या प्रतिनिधि को ओस्लो जाने से रोका था, बल्कि नोबेल विजेता होने के बावजूद ओसिट्जकी को बाद में भी कभी जेल से रिहा नहीं होने दिया. प्रताडना-अत्याचार के चलते ओसिट्जकी की जेल में ही मौत भी हो गई. षडयंत्र यहीं नहीं थमा, हिटलर ने उसके वकील को भी कड़ी सजा दिलाई. तो लोकतंत्र, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी की मांग नागवार गुजरने पर सत्ता तंत्र कितना निष्ठुर, क्रूर और अमानवीय हो जाता है, उसकी मिसाल सामंतीराजतंत्र ही नहीं, इस आधुनिक होती लोकतांत्रिक दुनिया में भी भरी पडी है. कौन नहीं जानता कि बर्मा की आंग सान सू ची के साथ दशकों से सैनिक सरकार क्या सलूक कर रही है. पूर्व सोवियत संघ के भौतिक विज्ञानी आंद्रेई सखारोव और ’गुलाग आर्किपिलेगो' जैसी मशहूर कृति के रचयिता एलेक्जेंडर सोल्झोनित्सिन के साथ क्या हुआ? सात साल पहले ईरान की शिरीन इबादी तो नोबेल से पुरस्कृत होने के बाद भी प्रताडि़त रहीं. फिर वो ही क्यों, बर्बर ईरानी पुलिस ने उनकी बहन, पति और भाई से भी मारपीट की, उनका पुरस्कार तक छीन लिया. इसी तरह लोकतंत्र और आजादी की मांग करने वाले नेल्सन मंडेला को 1964 से 1990 तक जेल की यातनाएं भुगतनी पडी थीं. तो ये है सभ्य होते आधुनिक विश्व का असली चेहरा जो खुद को जनतांत्रिक, संवैधानिक-मानवीय व्यवस्था में यकीन करने वाला और तानाशाही से दूर उदारवाद का पोषक बताते नहीं थकता.

लू  श्याबाओ 1989 में चीन में लोकतंत्र समर्थक छात्र आंदोलन के नेता रहे हैं. तब थ्यान-आनमन चौक पर चली सुरक्षाकर्मियों की गोली और छात्रों को रौंदते टैंकों से तो वो बच गए लेकिन उन्हें 20 महीने की कैद हुई. उसके बाद से उनका जेल के अंदर-बाहर आना-जाना लगा ही रहा. लेकिन तभी चेकोस्लोवाकिया के चार्टर 1977 की तर्ज पर उन्होंने चीन में भी लोकतंत्र, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर चार्टर 2008 तैयार किया. जिसे अंतर्राष्टीय मानवाधिकार दिवस 10 दिसंबर 2008 को जारी किया जाना था, लेकिन उसके दो दिनों पूर्व उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, और फिर उन्हें 2009 में 11 साल की सजा हुई. दिलचस्प है कि 10 दिसंबर 2008 जहां श्याबाओ के जीवन में एक निर्णायक घड़ी थी, ठीक उसी तरह 10 दिसंबर 2010 भी रही, जब सारी दुनिया ने ओस्लो के मंच पर इस शांति विजेता की कुर्सी को अचंभित और क्षुब्ध मन से खाली देखा. फिर श्याबाओ की पत्नी लू च्याई को भी महीनों से जिस तरह से नजरबंद रखा गया है और अब उनके घर को भी चारों ओर से ऊंची दीवारों से घेरा जा रहा है, वो याद दिलाता है शिरीन के परिजनों की प्रताड़ना का, सू ची के बेटों को मां से मिलने के लिए बर्मा आने के लिए वीजा न मिलने देना और फिर बीमार पति की विदेश में मौत हो जाना और उनसे मिल तक न पाना. तो बात सिर्फ फासीवाद या नाजीवाद के शिकार ओसिट्जकी की ही नहीं है, आज भी कथित रूप से 'बेहतर' होती दुनिया का सत्ता तंत्र अपने क्रूर  निर्दयी चरित्र में नहीं बदला है.

थोडा इतिहास में लौटें. कौन नहीं जानता कि सत्ता शिखर की कुर्सी के लिए परेशानी का सबब बनने पर सूफी-फकीर जैसे भाई दारा का सिर काट कर थाल में बादशाह औरंगजेब के सामने पेश किया जाता है तो शताब्दियों की जम्हूरी विरासत से गौरवान्वित ब्रिटेन भारत के मुगलिया वंश के अंतिम बादशाह बहादुरशाह जफर को देश से बाहर रंगून की जेल में 'जिंदा मौत' बर्दाश्त करने को विवश करता है और मौत के बाद भी लोकतांत्रिक झंडाबरदारी करने वाला ये देश उनकी मिट्टी तक वतन आने की इजाजत नहीं देता. शायद, इसीलिए तब कोई ताज्जुब नहीं होता जब श्याबाओ के लिए घडि़याली आंसू बहाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अमेरिका विकिलीक्स के संचालक-संपादक जूलियन असांजे की आवाज को दबाने के लिए सारे षडयंत्र ही नहीं रचता, बल्कि उनकी हत्या के मंसूबे से साजिशें भी करता है. फिर स्वीडन में कथित 'बलात्कार' के आरोप में उनकी गिरफ्तारी भी देश के बाहर उस जमीन पर होती है, जो मानवाधिकारों के मील के पत्थर 'मैग्नाकार्टा' और 'बिल ऑफ राइट्स' के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि शताब्दियों पहले लोकतंत्र की रक्तहीन और शानदार क्रांति के लिए भी जानी जाती है.

विचित्र ये है कि समाजवाद से उदारवादी पूंजीवाद की ओर तेजी से भागते चीन का जो रुख श्याबाओ को लेकर पिछली 10 दिसंबर के नोबेल शांति पुरस्कार वाले ओस्लो समारोह के मौके पर दुनिया के सामने प्रमुखता से मुखर होता है, जब वो नोबेल पुरस्कार समिति के सदस्यों को 'जोकर' कहता है और श्याबाओ को फिर से 'देशद्रोही' बता कर विश्व के 16 देशों को ओस्लो समारोह का बहिष्कार करने पर राजी कर लेता है तो दूसरी ओर अमेरिकी अगुवाई में कई पश्चिमी देश असांजे के खिलाफ भी लामबंद होते हैं, दोनों का अपराध क्या है? सिर्फ यही न कि दोनों के खुलासे स्थापित व्यवस्थाओं की पोल खोलते हैं. लोकतांत्रिक पारदर्शिता, आजादी और बेहतरी के लिए बदलाव की चाहत के साथ खुद को अभिव्यक्त करते हैं, लेकिन एक समाजवादी और दूसरी ओर पूंजीवादी व्यवस्था  दोनों की प्रतिक्रिया क्या कमोबेश एक जैसी नहीं है? चीन में अगर श्याबाओ के समर्थकों, परिजनों और चार्टर 2008 तैयार करने में मदद देने वालों को भी रातों-रात पुलिस द्वारा उठा लिया जाता है तो असांजे के खिलाफ भी क्या कुछ नहीं होता? तब खबरों की सुर्खियां क्या ये नहीं बनतीं कि असांजे पर कथित बलात्कार का आरोप लगाने वाली दोनों महिलाएं सीआईए से सम्बद्ध रही हैं? क्या इससे ढाई लाख दस्तावेजों को चौराहे पर उजागर करने वाले असांजे के पास अभी 10 लाख दस्तावेजों के और होने और उनके किसी भी वक्त बम की तरह फूटने का भय उजागर नहीं होता?

स्पष्ट है  व्यवस्था कोई भी हो, पर उस तंत्र का 'डर' एक ही है, वो सच को बर्दाश्त नहीं कर पाता. वैसे यह आज ही हो रहा हो, ऐसा नहीं है ढाई हजार साल पहले तब भी हुआ था जब सुकरात को 'सच' के लिए जहर का प्याला पीना पड़ा था, जीसस को सलीब पर लटकना पड़ा था और फिर इस आधुनिक लोकतांत्रिक दुनिया में गांधी को गोली खानी पडी थी. तो ये 'सच का संषर्घ' अनवरत रहा है. अनेक उतार-चढ़ावों के बाद भी हम आज जिस मुकाम पर हैं, वहां इसके लिए राजनीतिक ही नहीं समग्र सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता जरूरी है. ऐसा नहीं है कि दुनिया बदली नहीं है, लेकिन लाख बदलावों के बाद भी कहीं न कहीं हम वहीं खडे हैं, जहां हजारों साल पहले थे. हमारे आपके सभी स्तरों पर सतत जागरूकता जरूरी है.
और अंत में -

’हमारी मंजिल-ए-हस्ती भी
या रब क्या मुसीबत है
वही देता है धोखा
जिस किसी का साथ करते हैं...'

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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