राडिया जी, आपको धन्यवाद

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नीरादेखिये ये सब मिल कर,
बता रहे हैं आपको एक विलेन,
उस राडिया को जो है,
अपनी तरह की एक बहादुर महिला,
पुकार रहे हैं अलग-अलग नामों से,
बता रहे हैं समस्त बुराइओं की जड़,

कह रहे हैं एक-दूसरे से बढ़ कर,
कि जो भी हुआ गलत देश में,
उसके लिए जिम्मेदार हैं आप,
सारी नीतिओं और रीतियों के.
यदि हुए गुनाह किसी प्रकार के,
चाहे स्पेक्ट्रम घोटाला हो या,
अम्बानी बंधुओं के द्वंद्व,
सब के पीछे आपकी लोलुप मौजूदगी,
कारण एकमात्र

हर दूसरा आदमी लिए चला आ रहा
आपका कोई ना कोई नया टेप,
जिसमे आपकी तमाम बात-चीत,
कुछ निजी, कुछ व्यावसायिक,
सारी बातें हो रही हैं आम,
और लोगों के बीच उभर कर आया
एक और नया खलनायक (या खलनायिका)

वे सारी बातें सुन रहे हैं हम,
और नाक-भौं सिकोड़ते,
गंदे चेहरे बना रहे,
नाराजगी है हम में,
अंदर तक गुस्सा आप के प्रति,
इस तरह हमारी देशी-विदेशी नीतिओं से खिलवाड़,
बर्दाश्त नहीं हो रहा हमें,
जहां हम चाहते हैं सुधार,
वही दूषित किया व्यवस्था आपने खुलेआम
हम चाहते हैं एक सुन्दर तंत्र,
हमारी चाहत है एक स्वच्छ शासन,
और आप हैं उसके रास्ते का रोड़ा,
भ्रष्टाचार की आदि-श्रोत,
इस कुव्यवस्था का मूल कारक,
कह रहा हर व्यक्ति यही,
घृणा से आपको देखता,
और अपनी ऊँची नाक से,
आपकी नीचता तो तौलता

मैं सहमत नहीं हो पा रहा,
महसूस सी होती इसमें कुछ कमी,
मुझे दिखता कुछ पक्षपात
सत्यता से परे दिखते वे लोग,
लगता है मानो बना रहे हों आपको,
बलि का वह बकरा,
जिसकी हैं जरूरत उन तमाम सफेदपोशों को,
नंगा करके रख दिया जिन्हें आप ने,
सच्चाई जिनकी दिखा दी,
और ला दिया उनके असली रंग में

लगता है लोगों की बातों से,
जैसे आप के शमन मात्र से,
शमन हो जाएगा हमारी बुराईयों का,
हमारे सारे पाप और दोष,
धुल जायेंगे हमेशा के लिए,
राडिया जी, आप की सजा के साथ
नाश हो जाएगा सभी कमजोरियों का,
और हमेशा के लिए स्वतंत्र हो जायेंगे,
हम अपने समस्त अभिशापों से

ये लोग वास्तव में जाते हैं भूल,
कौन हो इसके लिए जिम्मेदार,
किसका है वास्तविक दोष,
क्यों फोड़ते आपके सर पर ठीकरा,
यदि चाहते हैं करना न्याय,
सामने लाएं उन सारे लोगों को,
जो कर रहे थे आपका काम,
छोड़ के अपनी खुद की जिम्मेदारी

आप का तो काम ही यही था,
धोखा नहीं दे रही थीं आप,
काम के अनुरूप कृत्य,
जरूरत के मुताबिक़ संपर्क,
लक्ष्य थे आपके निर्धारित,
चाहते थे लोग आपसे नतीजे,
उनके लाभ दिलाने का बोझ,
यथासंभव ईमानदारी और कुशलता से,
अपने कार्यों का संपादन,
पूर्ण समर्पण और दृढ संकल्प से,
दिन को दिन नहीं समझा,
न रात को रात जाना,
हर समय तैयार अपने दावित्व की खातिर,
एक अकेली महिला,
व्यक्तिगत कष्टों को समेटे खुद में,
आपकी पीडाओं को भुलाएं,
इस निष्ठुर जमाने के साथ,
कंधे से कंधा मिलाए,
धनिकों, ताकतवर लोगों के साथ,
हँसती, बोलती, मुस्कुराती,
बराबरी के साथ, पूरी प्रतिष्ठा में,
कभी खुद को नीचा नहीं दिखाया,
कभी झुकती नहीं नज़र आयीं,
हाँ झुका दिया उन लोगों को,
जो बनते बड़े और महान

यदि दोषी है कोई,
तो राजस्थान का वह कथित अफसर,
आई ए एस का लगाए बड़ा सा बिल्ला,
घूम रहा आपके आगे-पीछे,
मानो आपका कोई पालतू पिल्ला,
देता आपके दरवाज़े पर दस्तखत,
शायद कुछ थोड़ी सी हड्डियों की तलाश,
शायद मिल जाती हों कुछ बोटियाँ,
सरकार का गुलाम नहीं है वो,
गुलाम बनाया उसे आपने खुद का,
सुबह शाम देता आपको रिपोर्ट,
देश-दुनिया-सरकार का

यदि वास्तव में पाप है किसी का,
तो उन तमाम बड़े-बड़े बोल वाले लोगों का,
बड़ी-बड़ी बातें जिनकी,
बड़ी-बड़ी नीतियां, ऊँचे-ऊँचे आदर्श,
हमेशा देखते दूसरों को उन निगाहों से,
मानों औकात दिखा रहे हों उन्हें,
उनके छोटेपन का, उनकी नीचता का,
और बताते रहते हों अपनी महानता,
शब्दों में और भाव में,
शरीर की लोच में, आँखों के शिकन में,
बताते रहे वो बातें,
पालन नहीं करना था खुद जिनका,
खुद तो अपने स्वार्थ में मत्त,
एक घिनौना पिपासु,
नाम बड़े और दर्शन छोटे,
हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और,
दिया सारे देश को धोखा,
एक बार नहीं बार-बार,
गुर्रा कर, गरिया कर, नीचा दिखा कर,

इन मदमत्त हाथियों को भी
आपने बनाया पालतू कुत्ता,
इशारों पर आपके नाचते,
आपके लिए बोलते, चिल्लाते,
अपने जमीर को कर नीलाम,
दूसरों के ईमान से टकराते,
इन बड़े-बड़े नामों की असलियत दिखाई आपने,
इनका असली काला स्याह चेहरा,
बधाई की पात्र हैं आप,
धन्यवाद देता हूँ आपको,
सामने ला दिया वह कलुष,
कलम के इन ‘बहादुर’ सिपाहियों का,
कॉर्पोरेट जगत के ‘नामचीन’ खिलाड़ियों का,
राजनीती के ‘चतुर’ सारथियों का

सजा दे कानून आपको,
यदि दोष सिद्ध होता है आपका,
कड़ी से कड़ी सजा,
सख्त से सख्त नियमों के तहत,
पर उससे पहले दंड के हैं भागीदार,
ये सफेदपोश हैवान,
चेहरे पर लिए चेहरा,
खेलते जज्बात के साथ,
देश के और समाज के,
और बंद अकेले कमरों में,
मुस्कुराते अपनी घिनौनी चालाकियों पर,
लानत हैं उन पर
और धन्यावाद आपको राडिया जीअमिताभ

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ के शोधार्थी हैं.


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Comments (5)Add Comment
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written by Ajay Tiwari, December 13, 2010
Aap ke vicharo se bahut prabhavit hau aur puri tarah sahmat hun. Aap ne apni kavita ke madhyam se kisi bhe vyadhi ke jar(Root) ka awlokan karaya hai . yah puri tarah se sahi ki radeeya Jee jo bhe kiya hai uska remote un mahan logo dwara operative tha. Yah eik tarah se uplabhdhi hi kaha jay ki inke jariye un mahan logo ka nam ujgar hua. In other words you have gone to root causes of evil ,
Aap ki rachna sarahneey hai.
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written by Rajesh srivastava, Naidunia, December 13, 2010
amitabh ji bahut accha
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written by आशीष शर्मा , December 13, 2010
सर ,आप अपने निर्भीक ,सटीक तथा बेबाक विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए बधाई के पात्र हैं ..अन्यथा अधिकारी वर्ग के व्यक्ति ज्यादातर गूंगे ,बहरे तथा अंधे होते हैं कारण "राजनीतिक दबाव"
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written by D.k.bhagat, December 13, 2010
Nice sir ! very good satire, full of patriotism! but NIRA had never brought any face into limelight, as u have mentioned in ur poem, instead her phone calls were been Taped by our govt. as per my information, n thus it was disclosed. so she has no credit 4 this. she is simply a KATIL ADAON WALI KHUBSURAT DALAL .
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written by premshankar, December 13, 2010
abhitabh ji very nice

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