जिन्‍हें शर्म आनी चाहिए, उन्‍हें नहीं आ रही है

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: काजल की कोठरी मीडिया : काजल की कोठरी में दाग लागे ही लागे। देश का मीडियातंत्र भी अब काजल की कोठरी की तरह हो गया है, जहां पत्रकार की विश्वसनीयता पर दाग नहीं, तो छींटे जरूर पड़ेंगे। अब जब नीरा राडिया केस ने दाग लगे चरित्रवान पत्रकारों के चेहरों को उजागर कर दिया है, तो पत्रकारिता ऐसे दौर से गुजर रही है जहां कालिख पुते चेहरों को देखकर कई लोग शर्म महसूस कर रहे हैं, मगर जिन्हें शर्म आनी चाहिए, उन्हें नहीं आ रही है। क्योंकि बड़े मीडियामैन बनने के पहले सबकुछ ताक पर रख आए थे, तो जब शर्म उनके पास बची ही नहीं, फिर शर्माने से की गुंजाइश कहां?

कारपोरेट घरानों के लिए दलाली करने वाली देश की सबसे बड़ी दलाल नीरा राडिया के पत्रकारों से बातचीत के टेप ने मीडिया की पोल भी खोल दी है। पर मेरा सोचना यह है कि क्या पूरा मीडिया प्रभु चावला, बरखा दत्त, वीर सांघवी या राजदीप सरदेसाई के दम पर टिका हुआ है? क्या मीडिया में ऐसे लोग रहे ही नहीं, जिन्हें आदर्श माना जाए? न्यूज चैनलों पर चमकते इन चेहरों के पीछे एक और चेहरा है, जो सामने तो चरित्रवान बनने का ढोंग करता है, पर घुप्प अंधेरों के बीच अपनी वहशियत भी पूरी करता है। हमें क्यों शर्म आनी चाहिए कि ऐसे लोग दलाली की बातें करते हुए पकड़े गए, मीडिया के हमाम में लोग नंगे ही नंगे हैं, इसलिए कोई किसी को नंगा नजर ही नही आता था। और उस पर भी गजब यह कि गांव, देहात, कस्बाई स्तर के पत्रकार को चरित्र की सीख देने से बाज नहीं आते ऐसे लोग, जिनकी खुद की बेनामी संपत्तियां जाने किन घपले-घोटालों, झूठ-बेईमानी की नींव पर खड़ी की गई हैं!

आज पूरा देश मीडिया के इन कालिख पुते चेहरों पर गालियां उछाल रहा है, थू-थू कर रहा है। यह मीडिया के पास्चुरीकरण का दौर है, अर्थात नीर-क्षीर के पहचान का समय है। मीडिया की आत्मा में कितनी सफेदी और कितनी कालिख है, इसके खुलासे का वक्त है। बड़े नाम, बड़े घोटाले, छोटे मीडियाकर्मियों की छोटी बेईमानियां। दो दिन पहले ही मेरा पाला भी उसी जनता से पड़ा जो आज मीडियाकर्मियों को ब्लैकमेलर समझने लगी है। हजारों करोड़ की लागत से बन रहे एक पावर प्लांट के खिलाफ जनआंदोलन का कवरेज करने गया तो वहां पहुंचते ही लोग मीडिया के बारे में अनाप-शनाप कहने लगे। लोग प्रतिष्ठित माने-जाने वाले अखबारों और टीवी चैनलों पर इस पावर प्लांट से संबंधित खबरें दबाने का आरोप लगाते हुए अपनी भड़ास निकाल रहे थे। इससे पहले यह बताना भी जरूरी है कि इस पावर प्लांट के खिलाफ हुए आंदोलनों के कवरेज हमने हर बार किए, पूरी शिद्दत से किए, और उद्योगपतियों के पिट्ठू प्रबंधन के कई बार आग्रह के बावजूद हमने साफ तौर पर कह दिया कि जनआंदोलन, दुर्घटना से जुड़ी कोई खबर हम नहीं रोक सकेंगे। लेकिन वही आम लोग, जिनको हर बार हमने कवरेज किए और उस दिन भी बरसते पानी में कवरेज के लिए गए, ऐसे लोग ही मीडिया को कोसते नजर आए।

मीडिया के प्रति यह खीझ अब कितना विकराल रूप धारण करती जा रही है, यह उस दिन पता चला। मीडिया का चेहरा दिन-प्रतिदिन काला क्यों होता जा रहा है, यह सोचने समझने और इससे उबरने के लिए ठोस इलाज करने का भी समय है। देश में जिस तरह पुलिस की छवि बन गई है, उसी तरह कुछ मीडियाकर्मियों की हरकतें होती जा रही है, प्रार्थी से भी वसूली, आरोपी से भी वसूली। दोनों हाथों में लड्डू ही लड्डू। समाज को आईना दिखाने वाले खुद के चेहरों पर उग रहे मुहांसे और कालेपन को आखिर कब देखेंगे? अब ऐसे में आम जनता तो एक दिन जागेगी ही। कालिख पुते चेहरों की चर्चा मीडिया के गलियारों से निकलकर आम आदमी तक पहुंचने लगी है, तो लोग भी मीडिया के दामन पर कीचड़ उछालने से नहीं चूक रहे हैं। सौ में नब्बे बेईमान, फिर भी मेरा मीडिया महान!

लेखक रतन जैसवानी छत्‍तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा में पत्रकार हैं.


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