किसकी 'छवि' की चिंता करे मीडिया?

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एसएनपढऩे-सुनने में यह कड़वा तो लगेगा, किंतु सच यही है कि इंडिया और भारत नाम के हमारे देश में एक ओर जहां सामर्थ्‍यवानों को हजारों-लाखों करोड़ लुटने की छूट मिली हुई है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी झूठ, फरेब और धूर्तता की विशाल शासकीय चट्टान के नीचे दब छटपटा रहा है। इसकी सुननेवाला, सुध लेनेवाला कोई नहीं। दुखी मन से निकली इस टिप्पणी के लिए क्षमा करेंगे कि न्यायपालिका का आचरण (अपवादस्वरूप ही सही) भी सामर्थ्‍यवानों का पक्षधर दिखने लगा है।

कुख्यात नीरा-राडिया टेप प्रकरण में टाटा उद्योग समूह के अध्यक्ष रतन टाटा की एक याचिका पर सुनवाई करते समय सर्वोच्च न्यायालय मीडिया को नसीहत देता है कि ''वह छवि खराब न करे।'' क्या यह बताने की जरूरत है कि किसकी 'छवि' की चिंता न्यायालय को है? दलाल नीरा राडिया और रतन टाटा के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के टेप सार्वजनिक होने के बाद अब तक बेदाग, चमकदार आभामंडल वाले रतन टाटा की न केवल व्यक्तिगत छवि बल्कि टाटा उद्योग समूह की छवि भी खराब हुई है। रतन टाटा इस दलील के साथ सर्वोच्च न्यायालय में राहत के लिए गए कि बातचीत के प्रकाशन से उनके निजता के अधिकार का हनन हुआ है।

यह ठीक है कि किसी के 'बेडरूम' में झांकने से उसकी निजता भंग होती है। किंतु जब वहां विदेशी खुफिया एजेंसियों के लिए कथित रूप से काम करनेवाली विषकन्या मौजूद हो, भारत सरकार के मंत्रियों, अधिकारियों की चर्चा हो रही हो, लाइसेंस के आबंटन की बातें हो रही हों, देश के नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, तब मामला निजी कैसे हुआ? बल्कि रतन टाटा जैसा कद्दावर व्यक्तित्व अगर छींकता भी है तो उसकी सार्वजनिक चर्चा होती है। अनुकरणीय आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित रतन टाटा न केवल उद्योग जगत बल्कि देश के युवाओं के लिए एक रोल मॉडल हैं। इन्हें तो पूर्णत: पारदर्शी होना चाहिए। निजता के नाम पर वैसे प्रसंग पर परदा नहीं डालना चाहिए जिससे देश की राजनीति, व्यापार ही नहीं बल्कि देश की सुरक्षा का मामला भी जुड़ा हो। मीडिया ने इस मामले को सार्वजनिक कर हर दृष्टि से देश का हित साधा है। इस प्रक्रिया में रतन टाटा या अन्य किसी की छवि धूमिल होती है तो जिम्मेदार वे स्वयं हैं!

अदालत का संरक्षण प्राप्त करने की उनकी कोशिश उन्हें और भी संदिग्ध बना देती है। हजारों-लाखों करोड़ का घपला और विदेशों के लिए जासूसी जैसे मामलों में जो भी नाम आएगा वह बेदाग नहीं रह सकता। चाहे वे रतन टाटा हों, बरखा दत्त हों, वीर सांघवी हों या फिर प्रभु चावला और पूर्व मंत्री ए. राजा ही क्यों न हों। स्वयं को पाक-साफ साबित करने की जिम्मेदारी इनकी ही है। फिलहाल तो यह कटघरे में हैं और तब तक रहेंगे जब तक मामले का निपटारा नहीं हो जाता।

'कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ' का उद्घोष करनेवाली सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी चिंतित हैं तो किसी आम आदमी के लिए नहीं बल्कि बड़े उद्योगपतियों के लिए। एक अत्यंत ही हास्यास्पद टिप्पणी में उन्होंने टेलीफोन टैपिंग को (संदर्भ: नीरा राडिया प्रकरण) राष्ट्रहित में उचित तो ठहराया किंतु जड़ दिया कि इसका दुरुपयोग न हो! भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बिल्कुल ठीक टिप्पणी की है कि हमारे प्रधानमंत्री को यह भी पता नहीं होता है कि उनके मंत्रिमंडल में क्या हो रहा है। राडिया के टेलीफोन की टैपिंग का आदेश उन्हीं के गृहमंत्री ने दिया था, तो क्या गृहमंत्री ने अधिकार का दुरुपयोग किया?

अगर प्रधानमंत्री का इशारा मीडिया द्वारा टेलीफोन वार्तालाप को सार्वजनिक किए जाने पर है, तब हमारी प्रतिक्रिया वही है जो हमने ऊपर सर्वोच्च न्यायालय के संदर्भ में की है। यह पीड़ादायक है कि प्रधानमंत्री ने भी चिंता औद्योगिक घरानों के पक्ष में व्यक्त की है। उद्योग घरानों की इच्‍छा से स्वयं को वाकिफ तो बताया किंतु इस 'महाघोटाले' पर वे मौन रह गए। आम आदमी की जेबों से एकत्रित हजारों करोड़ की राशि राजनेताओं, अधिकारियों व दलालों द्वारा डकार लिए जाने पर वे अनभिज्ञ बने रहे।

प्रधानमंत्री ने चिंता व्यक्त की तो इस पर कि टेलीफोन टैपिंग के वार्तालाप 'लीक' कैसे हुए? संसद में घोटाले की जेपीसी से जांच कराए जाने की पूरी विपक्ष की मांग ठुकराने वाले मनमोहन सिंह ने 'लीक' कांड की जांच का आदेश ताबड़तोब जारी कर दिया! अर्थात् थानेदार इस बात के लिए चिंतित नहीं दिख रहा कि डकैती किसने और कैसे की बल्कि वह चिंतित है तो इसलिए कि डकैती की जानकारी मीडिया और उसके माध्यम से देश को क्यों और कैसे हो गई?

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं. प्रभात खबर अखबार के संस्थापक संपादक रहे हैं. दर्जनों अखबारों-चैनलों में संपादक रहने के बाद इन दिनों खुद का हिंदी विचार दैनिक '1857' का प्रकाशन नागपुर से कर रहे हैं.


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