बरखा, वीर और प्रभु के घर छापे क्यों नहीं पड़े

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यशवंत सिंह: बूढ़ा और रोबोटिक प्रधानमंत्री जनता की भाषा नहीं, लुटेरे उद्योगपतियों की भाषा बोल रहा है : इस बदले समय में असली पारदर्शिता तभी लाई जा सकती है जब जिम्मेदार पदों पर बैठे सभी लोगों के फोन चौबीसों घंटे टेप किए जाएं और उन्हें सार्वजनिक करते रहने का कानून बनाया जाए : अगर टेप लीक न हुए होते तो क्या राडिया के यहां छापे पड़ सकते थे : नक्कीरन के पत्रकार के घर छापा पड़ सकता है तो दिल्ली के स्वनामधन्य पत्रकारों के यहां छापा क्यों नहीं पड़ा जिनकी एक बड़े खेल में संलिप्तता टेपों के जरिए जगजाहिर हो चुकी है :

टेपों की रिकार्डिंग बहुत पहले हुई. सीबीआई के पास टेप भी बहुत पहले पहुंच गए. लेकिन छापे अब पड़ रहे हैं. जब टेप लीक हुए और मीडिया में धीरे धीरे ही सही, छा गए. सरकार की किरकिरी होने लगी. तब सरकार ने अपने सरकारी घोड़े सीबीआई को सक्रिय कर दिया. छापे पड़ने लगे ताकि जनता को लगे कि न्याय जारी है. न्याय का यह दिखावा, न्याय का यह नाटक कांग्रेसी सरकार उर्फ मनमोहिनी सरकार उर्फ माते सोनिया की सरकार के चेहरे से नकाब उतारने लगा है. जिस सीबीआई ने कल 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के हिस्से के रूप में वरिष्ठ तमिल पत्रकार के आवास पर छापा मारा, उस सीबीआई को प्रभु चावला, वीर सांघवी और बरखा दत्त के घरों पर छापे मारने की सुध क्यों नहीं पड़ी. शायद इसलिए सीबीआई की हिम्मत नहीं पड़ी क्योंकि ये तीनों बड़े पत्रकार दिल्ली में रहते हैं और बेहद प्रभावशाली हैं, और इनकी पहुंच दस जनपथ तक है.

हम क्यों न मान लें कि ये तीनों लोग जिस तरह से सरकार के सर्वेसर्वा लोगों तक अपनी पहुंच का बयान-बखान टेपों में नीरा राडिया से करते हैं, वो पूरी तरह, हंड्रेड परसेंट, सौ फीसदी सच है. कल सुबह जब नीरा राडिया के कई ठिकानों पर छापे पड़ने की सूचना देश भर के मीडिया माध्यमों के जरिए देश की जनता के सम्मुख पहुंची तो उसी वक्त यह खबर भी आई कि दिल्ली से एक सीबीआई टीम चेन्नई पहुंची और तमिल मैगजीन 'नक्कीरन' के एसोसिएट एडिटर कामराज के घर पर धावा बोल दिया. टीम ने तलाशी अभियान चलाया. कामराज को डीएमके का काफी नजदीकी माना जाता है. यह छापा ऐसे समय पर मारा गया है जब सीबीआई के अधिकारियों ने एक सप्ताह पहले पूर्व टेलीकाम मंत्री ए. राजा और उनके सहयोगियों के नई दिल्ली और तमिलनाडु स्थित कार्यालयों पर छापा मारा था. राजा के मुख्य सहयोगी सादिक बाशा और एक रिअल स्टेट व्यवसायी को सीबीआई पूछताछ के लिए पकड़ा है. सीबीआई के अधिकारियों ने राजा के भाई और बहन के तिरूचिरापल्ली जिले के श्रीरंगम स्थित आवासों पर भी छापे मारे. उनके आवासों पर भी पिछले सप्ताह छापे मारे गए थे.

लेकिन क्या राजा को मंत्री बनवाने जैसे बड़े खेल में बरखा दत्त, वीर सांघवी और प्रभु चावला जैसे बड़े पत्रकार शामिल नहीं थे? अगर इनकी अप्रत्यक्ष मिलीभगत की सूचना देश की जनता को हो चुकी है तो क्या सीबीआई और सरकार, दोनों बहरी हैं जो इन पत्रकारों के ठिकाने पर छापेमारी नहीं कर रहे. अगर इनके घरों पर छापे मारे जाएं, इनके फार्म हाउसों पर छापे पड़ें, इनके लैपटाप व डाक्युमेंट्स को खंगाला जाए, इनके फोन काल डिटेल निकलवाए जाएं तो पता चल सकेगा कि इनके तार और कहां कहां जुड़े हैं और इनके पास कितनी संपत्ति है. लेकिन इस देश में कभी बड़ी मछलियां शिकंजे में नहीं आतीं. न्याय का नाटक करने के लिए हमेशा छोटों को बलि का बकरा बनाया जाता है. देखिए, सीबीआई के छापेमारी के नाटक से क्या निकलता है लेकिन एक दूसरी कहानी यह भी है कि कांग्रेसी सरकार डीएमकी व राजा को निशाने पर लेकर देश को ये भरोसा दिलाने में लगी है कि हम भ्रष्टाचार से किसी कीमत पर समझौता नहीं करते. चलो, करुणानिधि रूठ जाएंगे तो जयललिता कांग्रेस के पाले में आ जाएंगी.

सो, इस छापेमारी से कांग्रेसी सरकार की राजनीतिक सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, उलटे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने जैसा नाटक कर वह विपक्षी पार्टियों व देश की जनता के प्रश्नवाचक खुले मुंह को बंद कर देना चाहती है. पर हम सभी जानते हैं कि सीबीआई का केंद्रीय कांग्रेसी सरकार ने बेहद शर्मनाक व पक्षपातपूर्ण दुरुपयोग हमेशा किया है. इसी कारण सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट से समय समय पर डांट भी खानी पड़ती है. मायावती को सीबीआई के जरिए डराकर कांग्रेस अपना काम निकालती रही है तो कभी मुलायम को सीबीआई का भय दिखाकर कांग्रेसी सरकार अपना राजनीतिक भविष्य संवारती रही है. जैसे राज्य सरकारें पुलिस का भय दिखाकर नेताओं को अपने पाले में करने का काम करती है उसी तरह केंद्र सरकार सीबीआई का भय दिखाकर बड़े नेताओं को अपने खिलाफ न जाने की हिदायत देती है.

भ्रष्टाचार में लिप्त केंद्र की कांग्रेस सरकार की दिखावेबाजी को सब जानते हैं. ऐसे समय में जब सोनिया गांधी अपने पुत्र राहुल को भावी पीएम के रूप में प्रोजेक्ट कर रही हैं, भ्रष्टाचार के सागर में सीबीआई जैसी छोटी मछली को जांच करने के लिए घुसेड़ कर देश की जनता को कुछ नहीं समझाया जा सकता. जनता को पता चल गया है कि 99 फीसदी नेता चोर हैं. छापे और सीबीआई जैसा नाटक दिखावे को हो रहा है. अगर कहें कि असल भ्रष्टाचारियों के हाथों में ही सीबीआई की लगाम है तो गलत नहीं होगा. अपना रोबोट टाइप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमेशा की तरह आज भी लुटेरे उद्योगपतियों के साथ खड़ा है. वह टेप लीक होने पर चिंता जाहिर करता है और भविष्य में टेप लीक न किए जाने का आश्वासन देता है. पर देश की जनता चाहती है कि इस देश के सभी बड़े नेताओं के टेप हर वक्त टैप हों और उन्हें जनता के सामने प्रकट कर दिया जाए ताकि इस देश की जनता जान सके कि नेता परदे के पीछे क्या-क्या बातें कर रहे थे. इस बदले समय में जरूरी है कि ऐसे कानून बनाए जाएं जिससे पारदर्शिता बढ़े और जिम्मेदार पदों पर बैठे नेताओं और अफसरों की कार्यप्रणाली व जीवनचर्या को जनता जान-समझ सके.

अंत में अपनी बात उस कमेंट को यहां देकर करूंगा जिसे किन्हीं कुमार गौरव नामक साथी ने भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित खबर 'फंस गई राडिया, पड़ गए छापे' के नीचे लिखा है- ''इतने दिनों के बाद क्या इस छापे का कोई औचित्य रह जाता है? राजा के यहां भी छपा तब पड़ा जब शायद सी.बी.आई. को यह सिग्नल दे दिया गया कि अब वहां कुछ मिलेगा नहीं, आराम से छापा मारो. नीरा राडिया को क्या ये अंदेशा नहीं रहा होगा कि सीबीआई रेड पड़ने वाली है? और वह सभी दस्तावेज को सीबीआई के लिए छोड़ दी होगी?''

और, इस रचना को भी पढ़ें. बुद्धा नामक एक हिंदी ब्लाग में 15 दिसंबर को यह रचना प्रकाशित की गई है. देखिए- कितना आक्रोश है लोगों के मन में, सिस्टम के प्रति और मीडिया के प्रति भी...

राडिया की मीडिया, मीडिया की राडिया
राडिया की मीडिया, मीडिया की राडिया
सच्ची कहानी मीडिया, मनोहर कहानी राडिया
राडिया है या मीडिया, ये मीडिया की राडिया
सब हरामखोर एक हैं, मीडिया हो या राडिया
हमको नशा सा हो गया ये मीडिया है मीडिया
मीडिया की राडिया या राडिया की मीडिया
शेर की खाल ओढ़कर, आ गए हैं सियार
लग चुका है दरबार, आ गए सारे सियार
शेर दिख रहा मीडिया, अंदर छुपा है भेड़िया
ये भेड़िया है या मीडिया, या फिर वही राडिया
बच्चे चुराएगा भेड़िया, बड़ों से डरेगा भेड़िया
ये मीडिया के भेड़िए, ये कायरों की मीडिया

लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक हैं.


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