हथियारों की सौदागरी और मीडिया ट्रायल

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नुतनमैंने कुछ दिनों पहले यहीं भड़ास पर लखनऊ से निकलने वाले अखबार निष्पक्ष प्रतिदिन के संस्थापक-संपादक जगदीश नारायण जी का एक इंटरव्यू भेजा था, जिसे यशवंत जी ने प्रकाशित किया था. इस इंटरव्यू को ले कर कई टिप्पणियां आयीं, लेकिन एक ऐसी टिप्पणी थी जो मुझे यकबयक अतीत के झरोखे में ले गयी. यह टिप्पणी थी इंडिया न्यूज़ की विशेष संवाददाता नसीम अंसारी की. अपनी टिप्पणी में नसीम ने मुझे मेरे पति अमिताभ ठाकुर के गोंडा जिले के एसपी के रूप में किये गए तथाकथिक दुष्कृत्य के बारे में याद दिलाया और इसी आधार पर उन्होंने यह भी कह दिया कि उस रिपोर्ट के आधार पर जगदीश नारायण ने मेरे पति से जरूर कोई सौदेबाजी की होगी.

दरअसल यह रिपोर्ट नसीम ने ही लिखी थी. उस समय वह जगदीश नारायण की पत्रिका ‘आखिर कब तक’ में ही काम करती थीं. इस रिपोर्ट में उन्होंने मेरे पति को अपराधियों को शस्त्र लाइसेंस बाँट कर पैसे कमाने की बात कही थी और इससे जोड़ते हुए ही कई अन्य गंभीर आरोप लगाए थे. वैसे यह रिपोर्ट मात्र ‘आखिर कब तक’ में ही नहीं छपी थी बल्कि व्यापक सर्कुलेशन वाले ‘इंडिया टुडे’ और कई बड़े हिंदी और अंग्रेजी अखबारों के लखनऊ संस्करण में भी निकली थी. सभी रिपोर्ट लगभग एक से थे और उनमें मेरे पति को गोंडा जिले के एसपी के रूप में बड़े-बड़े अपराधियों को गलत पते पर और गलत रिपोर्ट के आधार पर आर्म्स लाइसेंस देने और इस तरह से शस्त्र सप्लाई करने का दोषी ठहराया गया था. इन कहानियों में इन शस्त्रों के तार नागालैंड से लेकर कर जम्मू-कश्मीर तक जोड़ दिए गए थे और इस प्रकार यह फ़साना बन गया कि एक आईपीएस अफसर (जो जिले के एसपी जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर तैनात हो) द्वारा इस प्रकार का देशद्रोही और घृणित कृत्य किया जा रहा है. फिर जैसा कभी-कभी मीडिया में दिख जाता है, इस रिपोर्ट के आधार पर एकतरफ़ा मीडिया ट्रायल शुरू हो गया था, जिसके आधार पर मेरे पति को एक खलनायक, घृणित तथा कर्तव्यच्युत व्यक्ति के रूप में प्रदर्शित कर दिया गया था.

आप सोच सकते हैं कि जिस आदमी के बारे में इस तरह ही बातें लगातार अखबारों में आ रही हों, पत्र-पत्रिकाओं में छप रही हों, उसकी दशा कैसी हो जायेगी. वह भी तब, जब वह भली-भांति जानता हो कि इस पूरे मामले में उसकी कोई गलती नहीं है.

हुआ यह था कि मेरे पति जिस समय गोंडा के एसपी थे तो किन्हीं सूत्रों से उनके डीआईजी को यह खबर मिली कि पूर्व में गोंडा जिले से कई अपराधियों को गलत ढंग से शस्त्र लाइसेंस मिले हैं. उन्होंने मेरे पति से यह जांच एडिशनल एसपी से कराने को कहा. जांच शुरू हो गयी. इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि मेरे पति के आधिकारिक सम्बन्ध एक साथ उन डीआईजी और एडिशनल एसपी साहब से खराब हो गए. देखते ही देखते यह मनमुटाव व्यक्तिगत स्तर पर पहुँच गया. फिर एक दिन उन एडिशनल एसपी का गोंडा से ट्रांसफर हो गया और किसी भ्रम में डीआईजी ने समझा कि मेरे पति ने ही अपने राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल कर के ऐसा करा दिया है. उन्होंने एडिशनल एसपी को अपने पास फैजाबाद बुला लिया और उनसे नब्बे पेज की एक बहुत मोटी रिपोर्ट बनवाई जिसमें कई तरह के निष्कर्ष निकाले.

इस रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा एडिशनल एसपी साहब ने मेरे पति के बारे में लिखा- “कुल सात लाइसेंस वर्तमान पुलिस अधीक्षक, गोंडा  श्री अमिताभ ठाकुर की संस्तुति पर स्वीकृत हैं, जो सभी फर्जी पते दे कर प्राप्त किये गए हैं और इनमे से तीन के आपराधिक इतिहास की पुष्टि हुई है. उल्लेखनीय है कि उक्त सातों प्रकरण थाने के पश्चात बिना क्षेत्राधिकारी अथवा अपर पुलिस अधीक्षक की संस्तुति के सीधे पुलिस अधीक्षक अमिताभ ठाकुर द्वारा संस्तुति किये गए हैं.”  उन्होंने इन तथ्यों के आधार पर मेरे पति के विरुद्ध तमाम धाराओं में अभियोग पंजीकृत करने की संस्तुति की.

इस रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा तीन खास बातें थी-

1. इसमें एक कनिष्ठ अधिकारी (एडिशनल एसपी) ने अपने से वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ जांच कर रिपोर्ट दी थी जबकि शासकीय नियमों में इसकी मनाही है.

2. यद्यपि उन्होंने यह रिपोर्ट एसपी को संबोधित किया था पर सौंपा था सीधे डीआईजी को. मेरे पति को इसकी कॉपी तक नहीं दी.

3. इस जांच के दौरान मेरे पति से कोई पूछ-ताछ तक नहीं की गयी.

डीआईजी साहब ने इस रिपोर्ट को लेकर इस पर अपनी कुछ टिप्पणियाँ लिखीं जो और भी खतरनाक थीं. उन्होंने लिखा- “पुलिस अधीक्षक गोंडा श्री अमिताभ ठाकुर की सीधे-सीधे रैकेट में संलिप्तता है.” अपनी रिपोर्ट में उन्होंने भी मेरे पति के खिलाफ मुक़दमा दर्ज करने की संस्तुति की. लेकिन चूँकि मुख्य मकसद एडिशनल एसपी का ट्रांसफर रुकवाना था, इसीलिए यह भी लिखा कि आगे की सही जांच के लिए एडिशनल एसपी साहब का ट्रांसफर रोका जाए और मेरे पति का तुरंत ट्रांसफर हो. इस रिपोर्ट की प्रति उन्होंने कई जगहों पर भेज दी. जो भी स्थितियां हो, एडिशनल एसपी साहब का ट्रांसफर नहीं रुका और मेरे पति गोंडा में ही रहे. इसके बाद शुरू हुआ मेरे पति के खिलाफ भयानक दुष्प्रचार का काम. ताबडतोड़ खबरें और अपमानजनक बातें.

इसके बाद उत्तर प्रदेश शासन द्वारा जांच शुरू हुई. मैं तो इसे अपना और इनका अहो-भाग्य मानती हूँ कि जांच एक ऐसे आईएएस अधिकारी एके बिश्नोई को मिली, जो अवश्य ही न्यायप्रिय रहे होंगे, तभी तो हमें न्याय मिल सका. देखिये बिश्नोई जी ने अपनी जांच के अंत में क्या लिखा- “ इस सम्पूर्ण जांच की छानबीन के बाद यह तथ्य परिलक्षित होता है कि सभी मामलों में पुलिस अधीक्षक की संस्तुति उनके अधीनस्थ कर्मियों की संस्तुति पर आधारित थी और स्वयं अपने स्तर से कोई ऐसी संस्तुति नहीं की गयी थी, जो कि निचले स्तर से प्रस्तुत संस्तुति के विपरीत हो.” साथ ही यह भी लिखा- “ऐसे मामलों में, जिनके आवेदक के आपराधिक इतिहास होने के बावजूद पुलिस द्वारा शस्त्र लाइसेंस स्वीकृत करने हेतु संस्तुति की गयी थी, उनमे भी श्री अमिताभ ठाकुर को दोषी मानना उचित नहीं होगा.” अंत में उन्होंने यह तक लिख दिया- “ श्री (एबीसी) द्वारा अपनी आख्या तथ्यों के आधार पर नहीं दी गयी और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से निष्कर्ष निकाले गए थे.”

पर जैसा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में अक्सर होता है, पहले वाली झूठी खबर तो सुर्खियाँ बनीं पर बाद की सच्चाई कहीं गहरे-खाने दफ़न हो गयी, जिसकी चर्चा तक नहीं हुई. इस तरह मेरे पति तमाम लोगों की निगाहों में हमेशा के लिए शस्त्रों के सौदागर और आर्म्स लाइसेंस रैकेट के सरगना बन के रह गए. मेरे पति उसके बाद से आज तक लगातार अधिकारियों को पत्र लिख कर उन्हें इस तरह फंसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं पर बात वहीं की वहीं हैं.

अब अंत में कुछ खास बातें. एक तो यह कि हमारे खुद के इस अनुभव से हम कह सकते हैं कि मीडिया एक ऐसा यंत्र है जिसकी मार एकतरफा होती है. चूँकि कभी-कभी गलत बात पहले निकल जाती है फिर वही बात हमेशा के लिए चिपक जाती है, जिससे सच हमेशा के लिए ओझल हो जाता है. पर मैं इस मामले में मीडिया को दोषी नहीं मान रही. मैं सोचती हूँ कि यदि उतना मोटा झूठ का पुलिंदा तैयार कर के कोई मेरे पास ही ले आता तो मैं भी इसे सच ही मान बैठती. किसी के बारे में बुरी बात को सही मानना वैसे भी इंसानी फितरत होती है. गलती हमारी भी है कि हम लोगों ने बढ़-चढ कर सही बात हर जगह सबसे सामने नहीं रखी. दूसरी बात यह कि शस्त्र लाइसेंस देने का जो आरोप मेरे पति पर लगा था, असल में लाइसेंस एसपी देता ही नहीं है, यह काम डीएम का होता है. इस तरह मेरे पति उस अपराध के अपराधी हो गए थे, जो उनके अधिकार में ही नहीं था. डीएम यह लाइसेंस पुलिस और राजस्व विभाग दोनों की रिपोर्ट के आधार पर देते हैं. इस तरह डीएम के अधिकार क्षेत्र की बात के लिए, जिस पर जानकारी के लिए उसके पास पुलिस के अलावा अन्य भी स्रोत होते हैं, कुछ चालाक लोगों के षडयंत्र के शिकार मेरे पति हो गए.

और अंतिम बात मेरे पति के लिए और इनके जैसे तमाम लोगों के लिए जो कुछ ज्यादा ही उदार ह्रदय होते हैं. मैं जानती थी कि वह आज नहीं तो कल जरूर फंसेंगे. कारण दो. एक तो किसी पर विश्वास कर लेना और दूसरे अपनी औकात से आगे बढ़ कर किसी की मदद करने की कोशिश करना. इस मामले में भी यही हुआ था. वे ऑफिस में बैठे थे. एक परिचित आ गए. कहा कि शस्त्र रिपोर्ट डीएम साहब के यहाँ जल्दी चली जाती तो वहाँ से हो जाता. आदत से लाचार पतिदेव ने फाइलें मंगवाई और उन पर सीओ और एडिशनल एसपी की रिपोर्ट के बगैर ही अपनी संस्तुति कर के आगे भेज दिया. यह तो मैं ईश्वर की कृपा मानती हूँ कि उस पर लोकल थानाध्यक्ष के अलावा डीसीआरबी, जहां पूरे जिले के अपराध का ब्यौरा होता है, की भी रिपोर्ट लगी थी, नहीं तो पतिदेव का इस षडयंत्र से बच के निकालना मुश्किल था. वे कानूनी तौर पर सही इसीलिए भी साबित हुए कि क्षेत्राधिकारी और एडिशनल एसपी भी लोकल एसओ और डीसीआरबी की रिपोर्ट पर ही अपनी संस्तुति करते हैं और एसपी भी. इस प्रक्रिया से गुजरने में थोडा समय अधिक लग जाता है, लाइसेंस देने पर कुछ अंकुश लगा रहता है और कुछ नीचे के पुलिस के कर्मचारियों की थोड़ी-बहुत कमाई भी हो जाती है.

हाँ, इस घटना से मुझे यह लाभ जरूर हुआ कि इन्हें एक सबक जरूर मिल गया, जिसकी इन्हें सख्त जरूरत थी. लेकिन क्या यह पूरी तरह इन आदतों से अलग हो सके हैं, इस पर मैं आज भी दावे से कुछ नहीं कह पाउंगी.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ


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Comments (5)Add Comment
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written by baljee pandey, December 17, 2010
bhabhi ji
aaj jamana hi yesa hai ki problem ko proity per lekar usey door karney wala office key pardey sey nikal kar bahar baith kar aam logo key dukh dard suneney wale ek nek keeyat key ips oficer key ssath kya gujar rahi hi mujhey sab pata hai agar kisi ko hakikat janani hai to inki tainati wale district mey jakar pata kar ley hakikat sey roobaru ho jayega, bast key munderva mey bku ki jadatiyon sey sara ka sara administration halkan tha aapko pata hai ki goli sey hui maut per kitna tandav hua tha only one of the ips officer amitabh thakur ney apni tainati key dauran unhey ek baar yesa dabya ki phi unki gatbidhiyan lagbhag shant ho gai aaj bhi us samay ki police wale jo waha tainat they inki bhoori bhoori prashansa kartey hai ki jab ki inkey paheley bku waley kuch kartey they to sp first asp. ko bhejta tha asp khud na jakar sheo ko bhejta tha amitabh thakur was the first ips officer bku key bar bar key gatirodh sey tang aakar khud aagey badhey aur kaha ki jinhey saath aana ho oh aayey jinhey jaana ho oh abhi ja sakata hai saamney sey pathar chal rahey they aur police team ka ssath aagey badhey aur ek hi baar mey yesa dabya ki aaj bhi log shanti mahsoos kar rahey hain.

aaj key jamaney mey galat cheejey hava mey yesi sugandh failathi hain ki sahsa ham us per yakeen kar letetey hain per acchi cheej ko ham khud na saamney laye to to kisi ko jankari hi nahi ho paati hai shyad jamana hi yesha hai. phir bhi....,
Jindagi Maut key ssey mey saansh leti hai,
is kadar badal gai phija jamaney ki,
ham ladey hain aur ladeyengey inhi andheron sey
kyonki hamey jid hi sirf roshni failaney ki........
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written by डॉ नूतन ठाकुर , December 17, 2010

टिल्लू जी और बिल्लू जी,

मुझे आप दोनों भाईयों की टिप्पणियां बहुत अच्छी लगीं. बिल्लू जी ने कहा- “आपके पति का राजनैतिक रसूख किस तरह का है। कौन कौन खास हैं। इस रसूख की वजह से ही तो न्यााय नहीं मिल गया।“ इस पर टिल्लू जी की टिप्पणी आई- “आप पत्रकारिता का इस्तेमाल अपने निजी विचारों को सत्यापित कराने और अपनी और घरवाले की छवि चमकाने के लिए ना करें तो बहुत अच्छा होगा.” फिर बिल्लू जी ने मेरे पति को यह भी नसीहत दी कि वे जबरन बिंदास पत्रकार और लेखक का चोला ओढना बंद करें और इमानदारी से पुलिसिया काम करें.

पहले बिल्लू जी का जवाब- देखिये, सच ये है कि एक समय इनके राजनैतिक लोगों से काम लायक सम्बन्ध रहते थे और मैं इन्हें उन लोगों से मिलने-जुलने के लिए हमेशा तैयार देखती थी. मंत्रियों, विधायकों और छोटे-बड़े नेताओं के फोन आया करते थे और ये भी कुछ दिनों पर उन्हें फोन कर लिया करते थे. पर पता नहीं इनकी मति को क्या हुआ कि इन्होने एकदम से उन सारे लोगों से संपर्क ही छोड़ दिया है. रही बात रसूख के कारण न्याय की तो जिस चीज़ की मैं आखों से गवाह नहीं हूँ उसके बारे में कैसे गलत बयानी कर दूँ. हाँ, यदि आप मेरी बातों पर तनिक भी यकीन कर सकते हों तो मैं आपको सारा सन्दर्भ और सारे कागज़ात दिखाने को तैयार हूँ जो आपको भी साफ़ कर देगा कि इस मामले में मेरे पति को किस तरह से गलत फंसाया गया था और फिर आप स्वयं यही बात इसी भड़ास पर लिखेंगे. बिल्लू या उल्लू के नाम से सही, अपने असली नाम से. मेरा संपर्क नंबर 94155-34525 है और इस विषय पर चर्चा करने को आप सतत आमंत्रित हैं.

अब रहे टिल्लू जी तो मुझे टिल्लू जी तो सबसे बड़े शुभचिंतक जान पड़ते हैं, मेरे घर-परिवार के. यदि ऐसा हो जाता कि मेरे पति इस लिखने-पढ़ने और लेखन-पत्रकारिता के रोग से मुक्त हो जाते तो मुझे तमाम प्रकार की आम जीवन सम्बंधित सुविधाएँ वहाँ मिल रही थीं, वह तो तुरंत मिलने लगतीं. जो मेरे पास चार-चार फोलोवेर घर के काम के लिए, जो गाड़ी-घोड़े की सुविधा थी, वह तो मयस्सर हो जाती. मुझे इस तरह से स्कूटर से पूरा लखनऊ तो नहीं घूमना पड़ता. पर जिसे जो रोग लगा हो, उसका क्या इलाज है. और सबसे बड़ी बात यह कि खुद तो जो किया सो किया, मुझे भी जबरदस्ती इस रास्ते पर ले आये. आप शायद नहीं जानते होंगे, शादी के पहले मैं कार के नीचे नहीं चढती थी और दिल्ली, मुंबई हवाई-जहाज से आज से बीस साल पहले चलती थी. लेकिन पतिदेव के चक्कर में मुझे स्कूटर, मोटर-साइकिल से ले कर रिक्शा, ऑटो-रिक्शा सब देखना पड़ गया और इनकी यही आदत रही तो आगे पता नहीं ये मुझे और मेरे परिवार को क्या-क्या दिन दिखाएँ.
उस पर भी तुर्रा यह कि ये इसी में खुश भी रहते हैं और संतुष्ट भी, अब बताईये आप और हम इसमें क्या कर लेंगे. मेरी तो कभी बात नहीं मानी, आप ही अपने असली रूप में आ कर इन्हें सही बात समझा दीजिए. शायद मेरा भला हो जाए.
ईश्वर साक्षी है यदि इसमें एक बात भी गलत बोली हो तो.

डॉ नूतन ठाकुर,
लखनऊ
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written by Tillu, December 17, 2010
Aap dono patrkarita ka istemaal pathakon ke beech apne nijee vicharon ko satyapit karane aur apni aur apne gharwale ki chhavi chamkane ke liye na karen to bahut accha ho .
Ho sake to apne gharwale se bhi khein ki jabran bindaas patrkaar aur lekhak ka chola odhker taaliyaan bajwana kaafi ho gya . Ab ve bhi imaandaree se policia kaam karen jiskee sakh ke bootey ve chain ki roti kamate khate , aur radical vicharon ki safe bikri , dono kar paa rahe hain .
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written by sanjaypathak, December 16, 2010
Good Nutan,
Congratulate for truth.
Sanjay Pathak, Journalist
Dehradun.
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written by बिल्‍लू, December 16, 2010
इसी बीच कुछ ऐसा हुआ कि मेरे पति के आधिकारिक सम्बन्ध एक साथ उन डीआईजी और एडिशनल एसपी साहब से खराब हो गए. देखते ही देखते यह मनमुटाव व्यक्तिगत स्तर पर पहुँच गया. फिर एक दिन उन एडिशनल एसपी का गोंडा से ट्रांसफर हो गया और किसी भ्रम में डीआईजी ने समझा कि मेरे पति ने ही अपने राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल कर के ऐसा करा दिया है.....मैडम जी यह बहुत कुछ कहता है। अधिकारियों से क्‍या कारण था कि संबंध खराब हो गए। मनमुटाव और मतभेद अलग अलग होते हैं। मनमुटाव किसी खास वजह से ही हुआ होगा। दूसरा यानी आपके पति का राजनैतिक रसूख किस तरह का है। कौन कौन खास हैं। इस रसूख की वजह से ही तो न्‍याय नहीं मिल गया। मेरा भारत महान है यहां वह सब होता है जो दुसरे देशों में नहीं होता।

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