वो तड़पता रहा, हम तमाशा देखते रहे

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पंकजसीमा पर दुश्मनों के दांत खट्टे करने की कुव्वत रखने वाला जांबाज सड़क पर मौत से जंग लड़ रहा था, लेकिन इस जंग में कोई उसका मददगार न होकर तमाशबीन ही रहा। मेरठ में यह दास्तां इंसानियत की दहलीज पर ‘जवान’ की जिंदगी फना होने की है। मिनी ट्रक उनकी बाइक से टकराई तो ‘धड़ाम’ की आवाज मेरे कानों तक भी पहुंची। अपने एक सहकर्मी के साथ तेज कदमों से दुर्घटनास्थल की ओर भागा।

सेना का 40 वर्षीय जवान पंकज जोशी सड़क पर तड़प रहा था। उसकी आंखें अपनी तरफ आ रही हर राहगीर से मदद की उम्मीद लगाए रही लेकिन अगले ही पल नाउम्मीदी से आंसू उगल दे रही थी। लोग बस ‘आह’ भरते हुए उसके इर्द-गिर्द जुटते रहे मानो कोई तमाशा हो रहा हो। आधे घंटे का वक्त निकल गया। पत्रकार होने के साथ ही मुझे नागरिक कर्त्तव्य याद आया तो 100 नंबर पर डायल कर दिया। काफी जद्दोजहद के बाद जब पुलिस आई, तब तक घायल के बचने की संभावना क्षीण पड़ने लगी। ब्रह्मपुरी थाने की पुलिस दुर्घटनास्थल पर पहुंचती है। इलाके को नापतौल कर बताती है कि मामला टीपीनगर क्षेत्र का है। इतना कहकर पुलिस सड़क पर वाहनों को रोकने का प्रयास करती है। ‘वतन के रखवाले’ की बदकिस्मती कहिए या पूरी मर चुकी मानवीय संवेदनाओं को कोसिए, कोई नहीं रुकता।

बहरहाल मेरा खबरची खून थोड़ा उबाल लेता है और भीड़ के भरोसे पुलिस वालों को धिक्कारता हूं। पता नहीं शर्म से या मेरे पत्रकार होने के डर से पुलिस घायल जवान को जीप में डालकर केएमसी अस्पताल ले जाती है। अपने साथी के साथ हम घर की तरफ चल देते हैं, लेकिन जेहन में वह खौफनाक मंजर जड़वत रहता है, लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते इंसान होने पर शक होने लगता है। मानसिक उथल-पुथल मची रहती है कि घायल जवान के साथ क्या हुआ होगा। इसी उधेड़बुन में रात आंखों ही आंखों में निकल जाती है।

सुबह अखबार आते ही ‘अमर उजाला’ उठाता हूं। पेज तीन पर ‘देर रात सैनिक को ट्रक ने कुचल डाला’ पढ़कर एक इंसान के ‘खबर’ बन जाने पर खुद की शख्सियत पर ही शक करने लगता हूं। जेहन में सवाल उठते हैं। दुर्घटनास्थल पर बीस से ज्यादा लोग तमाशबीन बने थे। मैं भी समाज का जागरूक नागरिक था। फिर इतनी अमानवीय हरकत कैसे कर बैठा? कातिल ट्रक का पता नहीं, लेकिन खुद के उस कत्ल का हिस्सा बन जाने पर शर्मसार हूं। ऐसा ही वाकया शारदा रोड पर महीनों पहले हुआ था। ट्रक से कुचल जाने से युवा सर्राफ के अंग बेतरतीब बिखर गए थे, अस्पताल चंद कदम दूर था। रिक्शा चालकों और राहगीरों से मदद की गुहार लगाते-लगाते व्यापारी ‘शांत’ हो गया था।

लेखक पंकज श्रीवास्तव मेरठ के युवा व प्रतिभाशाली जर्नलिस्ट हैं.


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