प्रतिस्पर्धा - सहयोग का खेल

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गिरीशजी: चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की भारत यात्रा : भारत के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग की दो दिवसीय पारी खेल कर चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ पाकिस्तान रवाना हो गए. दिल्ली में दोनों देशों के बीच 16 बिलियन डालर के समझौते पर दस्तखत हुए और द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को 2015 तक सौ बिलियन डालर तक विस्तारित करने का संकल्प भी व्यक्त किया गया. लगा कि इस पहल से रिश्तों में सुधार की प्रक्रिया और मजबूत ही होगी.

2005 में जब वेन जियाबाओ दिल्ली आए थे तो उन्होंने आशा जताई थी कि 2010 तक यह आर्थिक सहयोग 30 बिलियन डालर तक पहुंच सकता है, लेकिन आज यह 60 बिलियन डालर है- यानी कि जितना सोचा गया था, उसका दोगुना. तो इस संदर्भ में नई आशा बेमानी तो नहीं ही है. लेकिन इस आर्थिक सहयोग या व्यापारिक पक्ष के दूसरे पहलू उतने सकारात्मक नहीं हैं. वो चाहे राजनीतिक संदर्भ हों या सामाजिक और सामरिक या फिर एशियाई राजनीति में प्रभाव विस्तार की इच्छा और आपसी लाग-डांट.

मजे की बात है कि वेन जियाबाओ ने भारत की दो दिवसीय यात्रा के बाद पाकिस्तान की तीन दिवसीय यात्रा शुरू की. अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले महीने की दिल्ली यात्रा में संसद के संयुक्त सत्र को अपना ऐतिहासिक संबोधन दिया था तो चीनी प्रधानमंत्री भी पाकिस्तान की संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित कर रहे हैं. ओबामा के भारत आने पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सपत्नीक उनके स्वागत में हवाई अड्डे पर मौजूद थे तो जियाबाओ के स्वागत में भी प्रोटोकाल तोड़कर पाक प्रधानमंत्री गिलानी भी अपनी पूरी कैबिनेट के साथ एयरपोर्ट पर मौजूद थे. तीनों सेनाध्यक्षों ने भी उनका वहां स्वागत किया और उन्हें 20 तोपों की सलामी भी दी गई. ओबामा ने जहां संसद में कहा कि गांधी न होते तो न मैं अमेरिकी राष्‍ट्रपति होता और न ही आज मैं यहां आपको संबोधित कर रहा होता. उन्होंने विवेकानंद, टैगोर और भारत की तारीफ में बहुत कुछ कहा तो जियाबाओ ने पाकिस्तान को शांति और स्थायित्व का दूत ही बता दिया. भारत में जहां ओबामा की यात्रा के दौरान 10 बिलियन डालर की डील पर दस्तखत हुए थे, तो जियाबाओ ने यहां 16 बिलियन डालर के आर्थिक समझौते किए लेकिन चीन ने यही डील पाकिस्तान में 24 बिलियन डालर की की. तो कहने का आशय ये है कि ओबामा की बहुप्रचारित भारत यात्रा का जवाब जियाबाओ ने अपनी पाकिस्तान यात्रा में देने की कोशिश की.

ये भी दिलचस्प रहा कि भारतीय मीडिया में जब खबरों के स्तर पर जियाबाओ को ओबामा जैसी सुर्खियां और वाहवाही नहीं मिली, तो उन्होंने जाते-जाते मीडिया को ये नसीहत भी दे डाली कि 'वो नकारात्मक खबरों को ज्यादा हवा देता है...ठीक है भारत में मीडिया स्वतंत्र है, लेकिन उसे अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए. उसे भारत-चीन के बीच अच्छे पड़ोसी के संबंध निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए.' जियाबाओ ने ये भी कहा कि मीडिया सीमा पर तनाव की खबरों को बढ़ा-चढ़ा कर छापता है. उन्होंने इसी क्रम में ये भी पूछ डाला कि 'क्या सीमा पर कोई एक भी गोली चली है?' स्पष्ट है कि जियाबाओ को ओबामा जैसा स्थान दिल्ली में नहीं मिला और न ही मीडिया ने उन्हें उस तरह से ’ग्लैमराइज' किया - इसकी कुछ खुन्नस तो रही ही होगी. लेकिन इस बात को तो चीन भी पहले से समझता ही था, तभी तो उन्होंने पाकिस्तान जा के उन सभी हसरतों को पूरा करना चाहा.

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इस लाग-डांट में कुछ फायदा नहीं हुआ. फायदा दोनों को हुआ- भारत को भी और चीन को भी. खास कर आर्थिक संदर्भों में. ठीक है कश्मीर, अरुणाचल, सीमा विवाद, स्टेपल वीजा, पाक प्रायोजित आतंकवाद और सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की सीट को लेकर स्थितियों में पेचीदगियां बनी रहीं, लेकिन बर्फ कुछ तो पिघली ही. ठीक है संयुक्त वक्तव्य में कश्मीर, अरुणाचल, स्टेपल वीजा, सुरक्षा परिषद और पाक समर्थित आतंक का कोई जिक्र नहीं हुआ, लेकिन कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा मसले की सुर्खियों पर चीनी प्रधानमंत्री ने अपनी ओर से पहल करके कहा कि इस मुद्दे पर दोनों वार्ता करके शीघ्र हल निकालेंगे. आतंक को लेकर भारत की ओर से पाकिस्तान की ओर उठने वाली उंगली का भले चीन ने समर्थन नहीं किया और 26/11 मुद्दे पर भी खामोशी रखी, लेकिन आतंकवाद से निपटने के लिए संयुक्त राष्‍ट्र के प्रस्तावों का समर्थन किया. ओबामा की तरह सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए भारत की सदस्यता की पहल का खुल कर समर्थन तो चीन ने नहीं किया, लेकिन वार्ता में स्पष्ट संकेत दिया कि संयुक्त राष्‍ट्र में व्यापक सुधारों की प्रक्रिया का वो समर्थन करेगा और भारत की राह में रोडा नहीं बनेगा. और जहां तक सीमा विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की वार्ताओं की बात है तो जियाबाओ ने इसे चल रही बातचीत का हिस्सा बताया.

लेकिन इन सबके बीच खास यह रहा कि भारत ने पहली बार पहले के शिखर सम्मेलनों के विपरीत 'एक अखंड चीन' की अवधारणा से अलग हटने का परिचय दिया. पहले के संयुक्त वक्तव्यों में हमेशा की तरह भारत 'एक चीन' की नीति को ही व्यक्त करता रहा है, साथ ही 'तिब्बत को चीन का स्वायत्त क्षेत्र' मानते हुए भारत से चीन विरोधी गतिविधियों को संचालित न होने देने की बात कहता रहा है. लेकिन इस बार इसकी जगह सिर्फ भारत-चीन आपसी रिश्तों और संवेदनशीलता की बात की गई. यह एक तरह से स्टेपल वीजा, अरुणाचल और पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी गतिविधियों का जवाब था. भारत ने वार्ताओं में चीन को ये भी बताया कि चीन ये न भूले कि यह भारत ही था जो चीन राष्‍ट्र को सबसे पहले मान्यता देने वालों में ही शामिल नहीं था, बल्कि उसे संयुक्त राष्‍ट्र में भी सम्माजनक स्थान दिलाने वालों में भी शरीक था. संभवतः इसी के जवाब में जियाबाओ ने संयुक्त राष्‍ट्र में भारत को अलिखित सहयोग का वचन भी दिया.

लेकिन चिंता की बात ये है कि जियाबाओ ने जिस तरह से दिल्ली से पाकिस्तान जाकर पाकिस्तान को 'शांति और स्थायित्व का दूत' बताया है और पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी गतिविधियों के बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं- उसे दिल्ली बीजिंग रिश्तों के लिए सुखद तो नहीं ही माना जा सकता है. पाकिस्तान चीन को एक बिलियन डालर से ज्यादा के कोहला हाइडने पावर प्रोजेक्ट पर दस्तखत करने के लिए दबाव बना रहा है, जो कि पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में है. इसे चीनी कंपनी को देने का प्रस्ताव है. इस बारे में चीनी प्रतिनिधिमंडल ने अपना प्रतिनिधिमंडल भी मुजफ्फराबाद जांच-पडताल के लिए भेजा था. उसकी मुलाकात वहां पाक अधिकृत कश्मीर के प्रधानमंत्री सरदार अतीक अहमद खान से भी हुई थी. जहां तक भारत की बात है तो उसने इस प्रोजेक्ट को लेकर अपनी आपत्तियों से चीन सरकार को अवगत करा दिया है. वैसे भारत पहले भी पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी इंटरनेशल एंड इलेक्ट्रानिक्स कंपनी द्वारा मंडला डैम बनाने पर भी नाराजगी जता चुका है. इसी तरह सात सौ किलोमीटर के काराकोरम हाइवे के बाढ़ में खराब होने पर मरम्मत के लिए भी चीन दो सौ मिलियन डालर दे रहा है. अब कोहला पर चीन का रुख क्या होगा, देखना है.

वैसे चीन जिस तरह से पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी सैन्य उपस्थिति में व्यापक निर्माण कार्य में संलग्न है, वो बताता है कि बीजिंग पाकिस्तान को दूसरे उत्तर कोरिया के रूप में निर्मित करना चाहता है. उसके विस्तारवाद का ही परिणाम है कि पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक ही उसकी पहुंच नहीं है, वो नेपाल में काठमांडू तक रेलमार्ग भी बना रहा है. हिंद महासागरीय क्षेत्र में पाकिस्तान के अलावा बर्मा, बांग्लादेश, श्रीलंका में भी बंदरगाहों पर उसकी प्रभावी मौजूदगी है. दरअसल, यह भारत को उसके ही पडोसियों के जरिए घेरने की रणनीति है. भारत ने जिस तरह से संयुक्त वक्तव्य में 'एक चीन' जैसे शब्द को हटा कर उसे स्पष्ट संकेत देना चाहा है, उसी तरह आगे भी चीन को यह बताने की आवश्यकता है कि यदि वो कश्मीर पर रुख नहीं बदलता है तो भारत भी ताईवान पर तटस्थ रुख छोड़ सकता है. भारत को पड़ोसियों के जरिए घेरने की नीति यदि वो नहीं छोड़ता है तो भारत भी विएतनाम, दक्षिण कोरिया जैसे राष्‍ट्रों के साथ नए सैन्य रिश्तों से जवाब दे सकता है. आखिर अंतर्राष्‍ट्रीय संबंधों में राष्‍ट्रीय हितों को अनदेखा तो नहीं किया जा सकता.

वैसे चीन के आम लोग भारत के साथ अच्छे रिश्ते रखने के हमेशा से ही आकांक्षी रहे हैं. वे न केवल आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग चाहते हैं बल्कि वे भारत को 'गुरु देश' यानी गौतम बुद्ध की धरती भी मानते रहे हैं और उनकी आम आकांक्षा यही रही है कि दूसरा जन्म हो तो 'गुरु देश भारत' में ही हो इसीलिए जियाबाओ ने भारत यात्रा के दौरान बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय के पुनर्निर्माण के लिए मदद की बात भी कही है. ये वही नालंदा है जहां कभी सैकड़ों साल पहले चीनी यात्री ह्नेनसांग और फाहियान आए थे और शिक्षा लेकर वापस लौटे थे. स्पष्ट है कि इन स्थितियों में एशिया के दोनों बडे देश भारत-चीन के रिश्तों को 'प्रतिस्पर्धा और सहयोग' के खांचे में ही देखा और समझा जा सकता है. लेकिन चूंकि दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है, इसलिए सजगता तो जरूरी है ही.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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