काशी में महावीर प्रसाद द्विवेदी का अपमान क्यों?

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वाराणसी। हिन्दी साहित्य की शीर्षस्थ संस्थाओं में एक नागरीप्रचारिणी सभा व्यावसायिकता की चपेट में आकर आर्थिक रुप से तो काफी समृद्ध हो चुकी है, लेकिन इस प्रयास में पुरोधाओं के प्रति उपेक्षात्मक रुख उसकी लगातार हो रही दुर्दशा की कहानी सुनाने के लिए पर्याप्त है। उदाहरण के तौर पर स्व. पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी (जन्म: नौ मई, 1864 एवं मृत्यु: 21 दिसम्बर, 1938) को ही लीजिए, जिनकी जन्मशती पर कविवर पं. सुमित्रानंदन पंत ने द्विवेदी जी की कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया था। बाबू श्यामसुंदर दास द्वारा 1894 में स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा के मुख्य द्वार के बायीं ओर एक मंदिरनुमा प्लेटफार्म स्थापित है, लेकिन वहां प्रतिमा नहीं है।

इस आधारस्तंभ के आसपास आप कूड़े का ढेर देख सकते हैं और बात यहीं तक सीमित नहीं है वरन प्रतिमास्थल से दो मीटर की दूरी पर एक पेशाब घर बनवा दिया गया है। स्व. द्विवेदीजी की मंगलवार को 72वीं पुण्यतिथि है। पूछताछ करने पर सभा के प्रधानमंत्री पं. पद्माकर पांडेय ने नयी दिल्ली से फोन पर बताया कि सभा जिन महापुरुषों की जयंती या पुण्यतिथि मनाती है, उनमें महावीर प्रसाद द्विवेदी का नाम नहीं है। लेकिन इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं था कि नागरी प्रचारिणी सभा को साहित्यिक समृद्धि प्रदान करने वाले विद्वतजनों में एक स्व. द्विवेदी की इस कदर उपेक्षा क्यों हो रही है।

स्व. द्विवेदी जी की कांस्य प्रतिमा विशालकाय पुस्तकालय में एक आलमारी के पीछे खिड़की पर वर्षों से धूल फांक रही है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि प्रतिमा के अनावरण के कुछ वर्ष बाद द्विवेदी जी का चश्मा गायब हुआ तो काफी हो हल्ला मचा। बाद में आधारस्तंभ पर से प्रतिमा ही हटा दी गयी। इस बाबत पद्माकर पांडेय ने बताया कि सभा की कार्यसमिति का फैसला था। उसका मानना था कि प्रतिमा स्थल पर गंदगी हो जाती है, लिहाजा उसे उखाड़कर अंदर रख दिया जाय। सभा के स्थानीय कर्ताधर्ता यानी अतिरिक्त सहायक मंत्री सभाजीत शुक्ल का जवाब और हास्यास्पद था। उनका कहना था कि सुरक्षा की दृष्टि से प्रतिमा पुस्तकालय में सुरक्षित रखी गयी है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर मुश्ताक अली ने बताया कि चिंतामणि घोष के स्वामित्व वाली इंडियन प्रेस से प्रकाशित मासिक पत्रिका सरस्वती का 17 वर्षों (1903-1920) तक सम्पादन करने वाले द्विवेदीजी ने अवकाश ग्रहण करने के बाद अपने साहित्य का काफी अंश एवं ढेरों पांडुलिपियां नागरीप्रचारिणी सभा को सौंप दी थी। इंडियन प्रेस पर शोध करने वाले प्रो. मुश्ताक ने बताया कि 1934-35 में सभा ने एक अभिनंदन ग्रंथ का भी प्रकाशन किया था। उस ग्रंथ में समकालीन सभी मूर्धन्य लेखकों के लेख थे। सभा ने उस भव्य समारोह में द्विवेदी जी को उक्त अभिनंदन ग्रंथ भेंट किया था।

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि ज्ञानेंद्रपति भी कहते हैं कि नागरी प्रचारिणी सभा की दुर्दशा से अंतराष्ट्रीय हिन्दी विद्वान दुखी हैं। उन्होंने बताया कि कुछ माह पूर्व वाराणसी दौरे पर आयीं एक अमेरिकी विश्वविद्यालय की हिन्दी की प्रोफेसर सुधा डालमिया सभा की दुर्दशा देखकर काफी मर्माहत हुईं। उसके बाद सुधा, चेक गणराज्य के ओदोलन एमेकल एवं आनंदघन के विशेषज्ञ इमरे बंघा सहित कई देसी- विदेशी हिन्दी विद्वानों का हस्ताक्षरयुक्त लेख जनसत्ता में प्रकाशित किया गया। उस लेख में इन विद्वानों ने शोक प्रकट करते हुए लिखा था कि किस कदर नागरीप्रचारिणी सभा अंतिम सांसें गिन रही है। उन्होंने भारत सरकार से इसे सुधारने की अपील भी की थी। लेकिन सरकार ने अब तक कुछ नहीं किया।
यह विडम्बना ही है कि उस मनीषी की, जिनके युग को हिन्दी साहित्य में द्विवेदी युग के नाम से जाना जाता है, पुण्यतिथि मनाने की कौन कहे, नागरी प्रचारिणी सभा ने उनकी प्रतिमा ही संस्था के एक कोने में फेंक दी है। निबंधन कार्यालय व श्रम विभाग में लंबित मामलों में उलझी सभा को उबारने के लिए हिन्दी के विद्वानों के साथ-साथ केंद्र व प्रदेश सरकारों को भी ठोस कदम उठाने होंगे।

लेखक योगेश कुमार गुप्त बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं. काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं. उनका यह लिखा पूर्वांचल दीप डॉट कॉम से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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