आलोक, यशवंत, अमिताभ- इतिहास गवाह है

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अमिताभ मैं यहाँ तीन ऐसे लोगों के बारे में छिद्रान्वेषण करूँगा जो हैं तो तीन अलग-अलग स्थानों के, अवस्था और वय में भी थोड़े आगे-पीछे हैं और शकल-सूरत से तो शायद बिलकुल नहीं मिलते. यानी बाहरी तौर पर इन तीनों में ज्यादा समानता नज़र नहीं आएगी. पर आंतरिक तौर पर इन तीनों में कुछ ऐसा ऐंठपन, जिद्दीपन और झक्कीपना है कि कभी-कभी मुझे लगता है कि कहीं ये तीनों पिछले जनम के भाई तो नहीं हैं.

कहावत है कि “बर्ड्स ऑफ द सेम फेथर फ्लोक टुगेदर” अर्थात एक तरह के लोग आपस में इकट्ठा हो जाते हैं. यह जरूर सही होगा क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो भिंड-मुरैना के अलोक तोमर, गाजीपुर-इलाहाबाद के यशवंत सिंह और बोकारो-लखनऊ के अमिताभ ठाकुर कैसे धीरे-धीरे एक गोल बन जाते.

सबसे पहले बात करूँगा अलोक तोमर जी की, जो इन तीनों में सबसे वरिष्ठ हैं. गोल चेहरा, सांवला रंग, सामन्य शक्ल-सूरत पर आँखों से झांकती एक तीखी ज्योति जो उनकी लेखनी से कम तेज नहीं है. फेसबुक पर इनकी जो तस्वीर लगी है उसमें विशेष तौर पर उनकी कलम प्रमुखता से दिखाई देती है और यह ठीक भी है, क्योंकि इस व्यक्ति की ताकत यही कलम है जो उसके दिलो-दिमाग से उभर कर आते विचारों और गुबारों को शब्दों में ढाल कर पाठकों तक इस रूप में पहुंचाता है कि पढ़ने वाला अर्ध-सम्मोहन की अवस्था में चला जाता है. यह सच है कि अलोक जी को देख कर बाहरी तौर पर कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि यह सीधा-शरीफ सा दिखने वाला आदमी इतना खोजी, खुराफाती और गहरे घाव करने वाला होगा कि उसका एक-एक शब्द लावे की तरह सीधे अंदर घुसता ही चला जाए. फिर उस आदमी की हिम्मत भी ऐसी कि किसी अखबार का मालिक नहीं है, वो कोई करोड़पति आदमी नहीं है पर कोई बात गलत लग जाने पर किसी से भी मल्ल-युद्ध करने को तैयार. इसी के साथ यारों के यार, दोस्तों के दोस्त- अंदर तक मानवीय अनुभूतियों से सराबोर.

कोई मुझसे पूछेगा कि यह बात मैं कैसे कह सकता हूँ जब मैं उन्हें ठीक से जानता तक नहीं, उनसे मिला तक नहीं और उनसे मेरा परिचय आज भी मात्र फोन तक ही सीमित है, तो मैं यही कहूँगा कि कुछ बातों को समझने के लिए मिलने-जुलने और मेल-मिलाप की जरूरत नहीं होती. इंसानियत, अपनापन और इंसान का व्यक्तित्व बहुधा दिल से समझ में आता है, मात्र आमने-सामने बैठ कर बात-चीत करने से नहीं. अब देखिये उस आदमी की महानता. मैंने उनसे जुड़ा एक लेख लिखा – ''आलोक तोमर और अच्छे-बुरे आदमी.'' मैंने इस लेख में अपनी तथाकथित निष्पक्षता दिखने के लिए अपने मन के सद्भावों के अतिरिक्त वह भी लिख दिया जो उनके प्रति स्पष्टतया हानिपरक और अनुचित था. मैंने इंटरनेट पर उनसे सम्बंधित एक-दो लोगों के विचार देखे और उन्हें जस का तस प्रस्तुत कर दिया. उन पंक्तियों में अलोक तोमर जी के बारे में अत्यंत कड़ी और निन्दापरक भाषा में कुछ विचार लिखे गए थे और मैंने उन्हें हुबहू उतार दिया.

आप सोचिये उस आदमी की महानता, उसका बड़प्पन, उसकी मानवीय अनुभूति का स्तर और उसकी सोच कि मेरे लेख के कुछ घंटों बाद ही खुद अलोक जी का फोन आया. मेरा हाल-चाल पूछने के बाद उन्होंने मुझे अपने विचार रखने के लिए धन्यवाद दिया. साथ ही एक और बात कही-“अमिताभ जी, आपने कुछ अन्य बातें भी मेरे बारे में लिखीं थीं. मैं नहीं कहता कि मैंने जीवन में कोई गलती नहीं की होगी पर मेरी आत्मा को इस बात का पूरा सुकून है कि मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया जिसके कारण मैं अपने-आप से मुंह छुपाने को मजबूर होऊं.” लगभग यही बात उन्होंने इस लेख से जुड़ी अपनी टिप्पणी में भी लिखी- ''धन्यवाद अमिताभ कि तुमने मुझे सार्वजनिक विवेचन के लिए प्रस्तुत किया. ठीक है, मेरा भी एक इतिहास है, लेकिन ऐसा नहीं है जिसके लिए मुझे शर्मिंदा होना पड़े. मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया है जो मेरी आत्मा पर बोझ बना हो.”

जब मेरी आलोक जी से बात हुई और जब मैंने उनकी यह बात देखी तो मुझे इस पर यकीन करने के लिए किसी तीसरे आदमी से किसी भी प्रमाण की जरूरत नहीं हुई, क्योंकि आदमी भले झूठ बोल ले पर उसकी आवाज और उसके शब्द झूठ नहीं बोल पाते. फिर इसलिए भी कि लगभग ऐसा ही कुछ दिनों पहले भी मेरे साथ हो चुका था, जब इस कहानी के एक दूसरे किरदार के साथ लगभग इसी प्रकार की मेरी वार्ता हुई थी. यह आदमी हैं भड़ास के संस्थापक और एक नयी विधा को अपनी पूरी ताकत के साथ सामने लाने वाले यशवंत सिंह, जो दाढ़ी-मूछ कटा लेने के बाद लगभग उतने ही शरीफ दिखते हैं जितने अलोक जी, पर जब लिखने लगते हैं तो ऐसा कि किसके अंदर कहाँ तक घुस जाएँ, इसकी कोई सीमा नहीं है.

हुआ यह था कि उस समय यशवंत भाई से मेरा संपर्क तो हो चुका था, पर अभी दोस्ती को परवान चढ़ने में देर थी. हमारी संस्था ने उन्हें एसपी सिंह पत्रकारिता पुरस्कार दिया था और इस अवधि में हमारी लंबी मुलाकातें भी हुई थीं. उसी दौरान उनके दिल्ली वापस जाने के बाद मुझे दो-तीन मित्रों ने अपनी ओर से फोन करके कहा कि आपने यह क्या किया, आप यशवंत को नहीं जानते, वह बहुत ऊँची चीज़ है. लोगों को डरा-धमका कर पैसे बनाता है, ब्लैकमेलर है और ना जाने क्या-क्या. फिर एक आदमी ने लगभग यही बात ई-मेल से कही. चूँकि पिछले कुछ दिनों में यशवंत भाई से इस कदर अपनापन हो गया था कि मैं ये बातें सुन कर काफी व्यथित हो गया. मुझे कत्तई अच्छा नहीं लगा था कि यशवंत भी वैसा ही निकले जैसे तमाम और लोग हैं. मैंने उस मेल के पढ़ते ही यशवंत भाई को एक ई-मेल भेजा जिसमे उन पर बताए जा रहे आरोप को बताते हुए उनसे मात्र यही जानना चाहा कि वे चाहें तो मुझे हकीकत बताएं और चाहें तो इस मेल को भूल जाएँ.

मैंने यह मेल सुबह लिखी थी और मुझे लग रहा था कि शाम तक जवाब आएगा क्योंकि यशवंत बाबू देर से सोते होंगे और देर से जागते होंगे. मुझे घोर आश्चर्य हुआ जब उनका मेल लगभग पलक झपकते ही मिल गया. उन्होंने भी लगभग वही बात लिखी थी जो आलोक जी ने फोन या अपनी टिप्पणी में कही थी. साफ़ लिखा कि वे भगवान नहीं हैं, यह भी नहीं है कि वे मोरालिटी के अंतिम प्रतिनिधि हैं. पर इतना जरूर है कि उनकी अपनी लक्ष्मण रेखाएं हैं, जिन्हें वे किसी भी दशा में नहीं लांघ सकते. फिर उन्होंने इस कथा के तीसरे पात्र यानी अमिताभ ठाकुर के बारे में कुछ बातें कहीं जो लगभग उन्हीं आरोप से मिलते-जुलते थे, जो अमिताभ ने बारी-बारी से इन दोनों पर लगाए थे. कहा कि जब मैं अवार्ड कार्यक्रम में लखनऊ में था तो एक से अधिक लोगों ने मुझे ऐसी बातें आपके बारे में कहीं जो किसी भी प्रकार से प्रशंसनीय नहीं कही जा सकतीं. कुछ लोगों ने तो स्पष्ट और क्रूर शब्दों में आपकी कटु आलोचना की थी, पर मैंने आपसे इस बारे में कुछ नहीं कहा क्योंकि हर व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के बारे में खुद निर्णय करना पड़ता है कि वह उसकी निगाह में कैसा है, यह भी कहा- “यदि मैं चाहता तो आपके सारे आरोपों को एक लाइन में यह कह कर खत्म कर देता कि इनमें कोई सच्चाई नहीं है. पर चूँकि आपकी बातों में अपनापन दिखा इसीलिए मैं अपने आप को विस्तार से उत्तर देने से रोक नहीं सका.”

यही सच है. दुनिया में कोई भी आदमी ऐसा नहीं होता जो दूध की तरह झिलमिलाता हुआ हो और इतना धवल हो कि उस के दामन में ढूंढने पर भी दाग नहीं मिलें. अधिकतर मामलों में इंसान का स्वरुप अच्छे और बुरे के एक मिश्रण से मिला हुआ ही होता है. पर मेरी निगाह में हर वह आदमी दूसरों से अच्छा है जो कम से कम अपने साये से झूठ नहीं बोलता, अपने आप को धोखा नहीं देता और यथासंभव अपने-आप को अपने अतीत से सीख लेते हुए आने वाले कल के लिए बेहतर बनाने के प्रयास में लगा रहता है. सच मानें, आप दुनिया को धोखा दे सकते हैं, अपने आप को नहीं. इस रूप में अपनी-अपनी हकीकत और अपनी-अपनी असलियत से रू-ब-रू होते हुए इन तीन लोगों की कहानी कहने के पीछे मेरा एक उद्देश्य यदि इन तीनों को समरूप परिदृश्य में प्रस्तुत करना है, तो असल व्यापक उद्देश्य यह है कि अपने अस्तित्व से संघर्षरत इन तीनों की इनकी अदम्य इच्छा-शक्ति, कुछ अच्छा कर सकने की मंशा और सतत बेहतरी के ध्येय को अन्य लोगों के लिए भी उदाहरण के रूप सामने रख सकूँ.

यदि इस कार्य में कुछ गलत स्व-प्रशंसा हो गयी है या इन दोनों साथियों की ऐसी तारीफ़ हुई है, जिससे आपमें कोई इत्तेफाक नहीं रखते तो इसके लिए क्षमाप्रार्थी नहीं हूँ क्योंकि मैंने वही बात कही है जो मुझे सही लगी है.

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ में अध्ययनरत हैं.


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Comments (10)Add Comment
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written by sudhir.gautam, January 03, 2011
Dear Amitabh, the whole article is okay (keeping in mind, that you are sharing your mind with bhadas regarding similarities in three of you )but can you explain what was in your mind when you were writing "...पर मेरी निगाह में हर वह आदमी दूसरों से अच्छा है जो कम से कम अपने साये से झूठ नहीं बोलता, अपने आप को धोखा नहीं देता और यथासंभव अपने-आप को अपने अतीत से सीख लेते हुए आने वाले कल के लिए बेहतर बनाने के प्रयास में लगा रहता है. " Everyone in this world Kalmaadi, Raja, Radia, Veer Sanghvi, Barkha Dutt, Prabhu chawla or for that matter think of anyone you know of such defamed profile they all dont lie to themselves, but to others, and learn from there mistakes, emerge smarter after every "catch" in the past, and आने वाले कल के लिए बेहतर बनाने के प्रयास में लगा रहता है, kuch bhi mat likho pabhu, and yashwant bhai please kuch bhi mat chapo bandhu. The article is good, objective is good as stated व्यापक उद्देश्य यह है कि अपने अस्तित्व से संघर्षरत इन तीनों की इनकी अदम्य इच्छा-शक्ति, कुछ अच्छा कर सकने की मंशा और सतत बेहतरी के ध्येय को अन्य लोगों के लिए भी उदाहरण के रूप सामने रख सकूँ, but that does not means kcuh bhi likh do bhai, aap teeno ke padhne waale hain bandhu. Anarth na karo!!! And amitabh bhai whenever have time see me in delhi I will make sure your myth can be easily broken that...दुनिया में कोई भी आदमी ऐसा नहीं होता जो दूध की तरह झिलमिलाता हुआ हो और इतना धवल हो कि उस के दामन में ढूंढने पर भी दाग नहीं मिलें. अधिकतर मामलों में इंसान का स्वरुप अच्छे और बुरे के एक मिश्रण से मिला हुआ ही होता है.I Always Read with due attention whatever you guys write, be it Alok ji, Yashwant Bhai or You and would love to criticize wherever needed, you must have heard... "निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाये,
सार सार को गहि रहै, थोथा देत उडाये !!!" As sponge does, Anyways goodluck, god bless you all !!!
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written by dhirendra pratap singh, December 26, 2010
kaptan sahab vakai aap teeno hi bemishal h aur mera manana h ki jitani jaroorat aaj ki patrakarita ko sri toamar aur yashvant ji ki h usase kahi jyada apki jaroorat hamare pokice department ko h.kyo ki hamare police department ko aap jaise samvedansheel insaan ki aaj sakht jaroorat h.bura mat manana ye meri feelings h..aap ka hi dhirendra pratap singh hindusthan samachar dehradun----9410367071
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written by SANJAY BHATI Editor SUPREME NEWS mo. 9811291332, December 26, 2010
amitab je sach likhane walo par bhut se arop lagate rahate hai or unahe badnam or partadit bhi kiya jata hai lakin pathak bhi sab kuch pachan late hai . hamare alok jee or yeswant bahi kabhi kisi ko makhan nahi lagate par aap to unhi ko makhan laga rahe hai or aap alok jee or yeswant bhai ki khayati (lokpryata) me daka dalne ka pryas kar rahe hai or isme aap dhere dhere safal bhe ho rahe hai .aapne AIOK jee or YASWANT bhai k bare me jo likha eak dam thik hai .aapne ise likha or bhi acha laga . thank you
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written by Alok Tomar, December 26, 2010
चन्दन श्रीवास्तव जी, आप भी कहाँ से जात ले कर आगये? अमिताभ ठाकुर अगर श्रीवास्तव भी होंगे तो चलेंगे. वैसे मेरी सुन्दर धर्म पत्नी सुप्रिया रॉय आपके ही कायस्थ कुल गोत्र की हैं और ऊपर से बंगाली हैं. जात न पूछो लेखक की जब तक वो विभूति नारायण राय न हो.
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written by prashant kumaar, December 26, 2010
Sir, u forgot to mention one more name in the First Among Equal List. His name is DNP. Dayanand Pandey of Apne-Apne Yudh. He has the same thasak, same arrogance, same honesty and the same might to defeat anybody. He is also the real macho journalist and author of many books.You all are not three but four. Yeh mera apna nazariya hai.
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written by chandan srivastava, December 26, 2010
“बर्ड्स ऑफ द सेम फेथर फ्लोक टुगेदर”.....sahi hai teeno RAJPUT bhi hain....shayad mahaj sanyog hoga.
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written by shishu sharma, December 26, 2010
thanks,amitabh ji,
hum aap teno ko keval blogs par padkar jantey hein.vastav mein aapkae andar bhi ek achaa aadmi shesh hae.
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written by भारतीय़ नागरिक, December 25, 2010
दोनों के ही लेख पढ़े थे और अब तीसरे के भी पढ़ रहा हूं... अच्छा लिखते हैं...
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written by Alok Tomar, December 25, 2010
कप्तान साब, जयहिंद.आप कहाँ से पुलिस में फँस गए? सलूट-सलामी तो ठीक है मगर हिन्दी ने क्या बिगड़ा है जो आपके नियमित लेखन से वंचित है?

मेरी इतनी तारीफ़ की कि मुझसे मिलने वाले आपको अतिशयोक्ति अलंकार का विद्वान् कहेंगे. आभार.मेरी तरफ से हांकने वाला एक दोस्त तो मिला. मैं अकेले ही अपना बंद बजाते बजाते दुखी हो गया था. वैसे इन दिनों मैं ऐसे शुभचिंतकों से दुखी हूँ जो मेरे केंसर की खबर से दुखी हो कर मेरे लगभग अंतिम दर्शन करने आते हैं और मेरी आँखों में म्रत्यु की आभा न पा कर हताश हो जाते हैं. मैं उनका दुःख समझता हूँ, लेकिन वे विश्वास क्यों नहीं करते कि दबिश की रवानगी डालने वाले सब शहीद नहीं हो जाते. आप दिल्ली आने वाले थे? ओवर एंड आउट, सर
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written by ashok das, December 25, 2010
आपने बिल्कुल ठीक लिखा है अमिताभ जी. तीसरे नाम से तो मैं वाकिफ नहीं हूं. लेकिन यशवंत भैया (उनसे मेरा जो रिश्ता है, उसमें उनके नाम के बाद भैया खुद ब खुद जुड़ जाता है) और आलोक तोमर सर से मैं मिल चुका हूं. यशवंत भैया के साथ बहुत अधिक तो थोड़ा वक्त तोमर सर के साथ भी गुजारा है.
आज के वक्त में बहुत कम लोग हैं, जो किसी के भी सामने सच्ची बात कहने की हिम्मत रखते हैं. ये दोनों ऐसे ही शख्स है. अगर आपको इनकी जरूरत है तो ये आंधी रात को भी मौजूद रहते हैं. फिर आपकी मदद कर उसे भूल जाते हैं. जाहिर सी बात है सच्ची बातें कहने वाले लोग दुनियादारी में लिपटे लोगों को भाते नहीं है. इसलिए लोग इन्हें समझ नहीं पातें.

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