यह रहा बिनायक को उम्र कैद देनेवाला ‘बनाना रिपब्लिक’

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: लोकतंत्र, न्याय और मानवाधिकारों का इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है : जैसी कि आशंका थी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और बाल रोग विशेषज्ञ डा. बिनायक सेन को रायपुर की स्थानीय अदालत ने देशद्रोह और राज्य के खिलाफ हिंसक तख्ता पलट के लिए षड्यंत्र करने जैसे आरोपों में उम्र कैद की सजा सुना दी. अरुंधती राय ने सही कहा कि क्या विडम्बना है कि भोपाल गैस कांड में हजारों बेकसूरों के नरसंहार के दोषियों को दो साल की सजा और डा. बिनायक सेन को उम्र कैद? आश्चर्य नहीं कि इस फैसले ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया है. न्याय, लोकतंत्र और मानवाधिकारों में यकीन रखनेवाले लोग सदमे में हैं.

सचमुच, लोकतंत्र, न्याय और मानवाधिकारों के साथ इससे बड़ा मजाक नहीं हो सकता है. आखिर डा. बिनायक सेन का कसूर क्या है? यह कि मेडिकल साइंस की इतनी बड़ी डिग्री लेकर प्रैक्टिस करने और रूपया पीटने के बजाय छत्तीसगढ़ जैसे अत्यंत गरीब राज्य में जाकर सबसे गरीबों की सेवा करना और उन गरीबों की आवाज़ उठाना?

या यह कि एक डाक्टर की तरह चुपचाप अपने काम से काम रखने और अपने आसपास चल रहे अन्याय पर खामोश रहने की बजाय उन्होंने खुलकर पुलिसिया जुल्मों, लूट और अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया है? या फिर यह कि उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार के बजाय भारतीय संविधान पर भरोसा किया जो अभिव्यक्ति की आज़ादी से लेकर लोगों के मानवाधिकारों को किसी भी सरकार और पुलिस से ज्यादा अहमियत देता है?


"और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन मृतात्माएँ इसी नगर की
हर रात जुलूस में चलतीं,
परन्तु दिन में
बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र
विभिन्न दफ्तरों-कार्यालयों, केन्द्रों में, घरों में,
हाय,हाय! मैंने देख लिया उन्हें नंगा,
इसकी मुझे और सजा मिलेगी."

(डा. बिनायक सेन को सजा दिए जाने पर आक्रोश जाहिर करते हुए अपने मित्र और लेखक आशुतोष कुमार ने मुक्तिबोध की ये पंक्तियां फेसबुक पर डाली है. वहीँ से साभार.)


इस सजा से एक बात तय हो गई है. पिछले दिनों सुपर उद्योगपति रतन टाटा ने राडिया टेप्स लीक्स किए जाने और निजता के अधिकार का उल्लंघन किए जाने के सन्दर्भ में देश के ‘बनाना रिपब्लिक’ में तब्दील हो जाने की आशंका व्यक्त की थी. इस सजा ने साबित कर दिया है कि देश ‘बनाना रिपब्लिक’ बन चुका है. यह एक राष्ट्रीय त्रासदी है कि एक बेहतर देश और समाज बनाने की लड़ाई लड़नेवाले जेल में उम्र कैद की सजा भुगतेंगे और क्रोनि कैपिटलिज्म के जरिये देश के कीमती संसाधन लूटनेवाले बाहर मौज करेंगे.

कहना पड़ेगा, जैसे आज सुबह पत्रकार साथी अवधेश ने फेसबुक पर लिखा ....

“आओ देशभक्त जल्लादों
पूँजी के विश्वस्त पियादों
उसको फांसी दे दो!”

लेखक आनंद प्रधान बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रह चुके हैं. वामपंथी आंदोलन से गहरा जुड़ाव और अनुराग. आल इंडिया रेडियो में नौकरी करने के बाद पत्रकारिता शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ गए. इन दिनों इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेश, दिल्ली में बतौर प्रोफेसर कार्यरत हैं.


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Comments (6)Add Comment
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written by raghvendra dixit , December 28, 2010
annad ji awaz uttane ke sadhuvaad.aap ka lekh peeda ko pradarshit karta hai na ki uska hal. aap prof. hai kya lekh aur batcheet se badhkar aage ka rasta bhi kya hum tai kareinge ya phir ye lekh bhi ek anarkali ki awaz bankar rah jai ga? kyo na ek sarthak pahal ki jai.
raghvendra dixit
dixitrdx@gmail.com
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written by manoj, December 28, 2010
aisa kahna bilkul niradhar hai ki manvadhikar hone ke nate dr sen ko rajdroh ki saja sunai gai hai... is tarah aap sidhe adalat ke faisle ki avmanna kar rahe hai mai nahi janta ki aap sabhi kis tarah dr sen se jude hai lekin mai manta hu dr sen ke khilaf aise sabut mile hai isliye unhe umrakaid ki saja hui hai... rahi bat sahi aur galat ki to mai manta hu ki dr sen ho ya dusra koi desh ya rajya ki khilaf maowad ko barhava dene wale ko umrakaid ke bajay fansi ki saja deni chahiye...
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written by madhukar, December 26, 2010
विनायक सेन ने डाक्टरी क्या पढ़ ली सनसार ही जीत लिया . आनंद भाई बहुत लोग है डिग्री लिए हुए और इमानदारी से काम रहे हैं . हाला नहीं मचाते है. भोपाल काण्ड के दोषियों को सजा तो मिलनी ही चाहिए .तुलना ठीक नहीं . यही वामपंथियों की चाल है. बात को इधर उधर करना . वही आप भी कर रही हैं. खूबसूरत घर में रहकर लिखना सबको आता है. सेन ने जो किया होगा उसकी सजा मिलनी ही चाहिए. यदि गलत हुआ है तो आगे अपील करें. सेन की पत्नी इलिना सेन से पूछिए की वह जो एक लाख वेतन उठाती है, कितना कम वि वि के लिए करती है. सीधे प्रोफे पर नियुक्ति गलत तरीके से कराकर मानवाधिकार की बात न करें . न हो तो अपने किसी पत्रकार मित्र से तथ्य का पता कर लें.
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written by rahul, December 26, 2010
अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता और मानवाधिकारों कि आड़ में देश में अघोषित गृह युद्ध छेड़ने वाले मओवादियो कि वकालत कौन सी समाज या देशसेवा है. माओवादियों के हमलों में शहीद हुए लोग आपकी नज़र में शायद मानव नहीं ,या देश के बाकी वंचितों तबके और प्रदेशो के लोगो को भी हथियार उठा लेने चाहिए अपने अधिकारों के लिए.
रही बात बनाना रिपब्लिक की तो यकी जानिए सभी भारत विरोधी तत्वों कि चहेती और खबरों में अपने को बनाये रखने के लिए तडपती अरुंधती समेत उन सब लोगो को माओ के देश चीन भेज देना चाहिए ,जहाँ ऐसी बे-अंदाज़ जुबां को उसकी औकात बताने के लिए ऐसे सख्त कानून है कि उनको अपना लुंज पुंज कानून-व्यवस्था वाला लोकतंत्र सारे जहाँ से अच्छा लगने लगता..
भ्रष्टाचार और अव्यवस्था की मार सभी देशवासी झेलते है,, व्यवस्था को बदलने के सकारात्मक प्रयास करे तो बेहतर होगा...और माओवादियों को मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें पटरी पर लाने का प्रयास कर उनके प्रति देशवासियो में भर रही नफरत को कम करने का प्रयास करे तो ज्यादा रचनात्मक होगा

विनीत
लखनऊ
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written by ्मदन कुमार तिवारी , December 26, 2010
अरुण भाई मैने भी आपकी कविता को भडास पर तथा ओपेनबुक पर आपके नाम से पोस्ट कर दिया है। एक और काम मैं शुरु कर चुमा हूं । वह है प्रधानमंत्री सहित उच्चतम न्यायालय को ईमेल भेजकर अविलंब डाक्टर सेन को रिहा करने की मांग की है। आपको बता देता हू। सरकार चाहे तो यह कर सकती है। छ्तीसगढ सरकार को भी ईमेल भेजने जा रहा हूं।
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written by ARUN SATHI, December 26, 2010
विनायक सेन को समर्पित मेरी कविता (राजद्रोह)

राजद्रोह है
हक की बात करना।


राजद्रोह है
गरीबों की आवाज बनाना।


खामोश रहो अब
चुपचाप
जब कोई मर जाय भूख से
या पुलिस की गोली से
खामोश रहो।


अब दूर किसी झोपड़ी में
किसी के रोने की आवाज मत सूनना
चुप रहो अब।


बर्दास्त नहीं होता
तो
मार दो जमीर को
कानों में डाल लो पिघला कर शीशा।


मत बोलो
राजा ने कैसे करोड़ों मुंह का निवाला कैसे छीना,
क्या किया कलमाड़ी ने।


मत बोला,
कैसे भूख से मरता है आदमी
और कैसे
गोदामों में सड़ती है अनाज।


मत बोलो,
अफजल और कसाब के बारे में।
और यह भी की
किसने मारा आजाद को।


वरना


विनायक सेन
और
सान्याल की तरह
तुम भी साबित हो जाओगे
राजद्रोही


राजद्रोही।




पर एक बात है।
अब हम
आन शान सू
और लूयी जियाबाओ
को लेकर दूसरों की तरफ
उंगली नहीं उठा सकेगें।

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