पूंछ बन कर सूंड़ होने का भ्रम

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पुण्‍य ठीक दस बरस पहले ‘आजतक’ समाचार चैनल शुरू हुआ, तो ‘इंडिया टुडे’ के प्रधान संपादक अरुण पुरी ने बैठक बुला कर सिर्फ इतना कहा कि अब यह चैनल आपके हाथ में है, आप खुद इसकी दिशा तय कीजिए। उसके बाद हर पत्रकार ने अपनी-अपनी दिशा तय की। कोई भाजपा पर नजर रखने लगा, तो कोई संघ पर। कोई कांग्रेस के नेपथ्य में झांक रहा था तो कोई आतंकवाद की आहट सुनने में लग गया। इसका असर यह हुआ कि खबरें तो सबसे पहले आजतक के परदे पर रेंगने ही लगीं। रिपोर्टर की विश्वसनीयता भी इतनी थी कि खबरें चलाने के लिए राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं की प्रतिक्रियाओं का इंतजार कभी आजतक में नहीं हुआ।

कोई रिपोर्टर इस तौर पर नहीं लगा कि उसके ताल्लुकात किसी राजनीतिक दल या किसी मंत्री के साथ हैं। हर रिपोर्टर की अपनी ठसक थी, अपनी विश्वसनीयता। दरअसल, इस हिम्मत के पीछे भी अरुण पुरी की पत्रकारीय समझ और ताकत थी, जिन्होंने चैनल शुरू करने से पहले बैठक में एक रिपोर्टर के सवाल पर यह कह कर चौंकाया था कि खबर कभी रोकनी नहीं चाहिए और बिना किसी बाइट के अगर कोई रिपोर्टर खबर बताने की ताकत रखता है, तो वही उसकी विश्वसनीयता होती है।

इस खुलेपन और ईमानदार माहौल के बीच आजतक की शुरुआत का हर पन्ना दस्तावेज है। लेकिन दस बरस बाद समाचार चैनलों में खुलेपन या ईमानदार पहल के बीच पत्रकार की विश्वसनीयता खोजने की बात होगी तो जाहिर है आंखों के सामने खबरों से इतर रोचक या डराती तस्वीर आएगी। अब त्रासदी को भी लुभावने अंदाज में परोसा जाता है। या फिर सूचना-दर-सूचना, सरकार के प्रवक्ता के तौर पर पेश की जाने वाली जानकारी को ही खबर और सच मानने के अलावा और कुछ आएगा ही नहीं।

इस सिलसिले में अगर पत्रकार की विश्वसनीयता का सवाल उठेगा तो सत्ता से सबसे करीब का पत्रकार ही सबसे ऊंचे कद का, खबरों को जानने-समझने वाला माना जाएगा। यानी दस बरस का सबसे बड़ा ‘यू-टर्न’ पत्रकार की विश्वसनीयता से इतर, सत्ताधारियों की गलबहियों के सहारे खुद में सत्ता की ताकत देखने-दिखाने का खेल है। इसी घेरे में ‘खबर के बदले पैसा’ (पेड न्यूज) भी है और नीरा राडिया के टेप भी हैं। सत्ता का मतलब अब सरकार नहीं बल्कि वह पूंजी है, जिसके सहारे सरकार अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है। और सरकार की मौजूदगी, मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक, जब विकास दर की चकाचौंध के साथ हो तब समझना यह भी होगा कि सुशासन का मतलब या तो सरकारी नीतियों के जरिये पूंजी की उगाही के रास्ते बनाना हो गया है या फिर पूंजी के लिए मुनाफे का तंत्र। और फिर इसी सब को विकास का नाम दे दिया जाता है।

पत्रकार की पहली मुश्किल यहीं से खड़ी हुई। पहले पत्रकार मीडियाकर्मी में बदला और फिर अखबार या चैनल का दफ्तर मीडिया हाउस में। जाहिर है, इसी दस बरस में मीडिया हाउस की पहचान बदली तो नयी पहचान को बनाये रखने की जद्दोजहद में पत्रकार का भी रूपांतरण हुआ। खबरों पर विज्ञापन मिलने का दौर इस कदर शुरू हुआ कि विज्ञापन के सहारे खबरें लिखने और चलाने का सिलसिला चल पड़ा। यानी दस बरस पहले जो पत्रकारीय विश्वसनीयता जनता में प्रभाव जमाती थी और उसी जनता को अपना माल बेचने के लिए विज्ञापन के जरिये पैसा मीडिया तक पहुंचता था, उसे नयी आर्थिक व्यवस्था ने उलट दिया। इसी के समांतर खबरों को जनता तक पहुंचाने की पटरी भी उसी राजनीति के भरोसे पर आ टिकी, जो खुद कॉरपोरेट पूंजी के जरिये अपने होने या न होने का आकलन करने लगी थी। खबर बिना विज्ञापन मंजूर नहीं। और समाचार चैनल जिन केबल के जरिये लोगों के घरों तक पहुंचे उस पर उसी राजनीति ने कब्जा कर लिया, जो पहले खुद को मुनाफे की पूंजी के हाथों नीलाम कर चुकी है।

रिपोर्टर से लेकर संपादक तक की समूची ऊर्जा जब मीडिया हाउस का मुनाफा बनाने में लगेगी तो इसका असर क्या होगा, यह दस बरस बाद अब की परिस्थितियों को देखने से साफ हो जाता है। जहां ‘पेड न्यूज’ का एक मतलब पैसा लेकर खबर छापना है, वहीं इसका दूसरा मतलब उन लोगों से पैसा लेना है, जो चुनाव लड़ कर या जीत कर पैसा ही बनाएंगे। तो उनसे पैसा मांगने में परेशानी क्या है? जहां सरकार कॉरपोरेट के जरिये अपनी उपलब्धियां बताये या कॉरपोरेट के लिए इस विश्वास से काम करे कि देश की व्यवस्था के एक हिस्से की लूट से एक नया कॉरपोरेट समाज बनाया जा सकता है, तो फिर इस कॉरपोरेट समाज का हिस्सा बनने पर कोई सवाल क्यों उठाएगा? उसी कॉरपोरेट समाज का कोई हिस्सा (संपादक) अगर खबर या खबर की सौदेबाजी के जरिये अपने मीडिया हाउस को लाभ पहुंचाता है तो फिर इसमें परेशानी क्या है? बल्कि कोई संपादक अगर अपने आप में कॉरपोरेट हो जाए तो किसी भी मीडिया हाउस के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है?

यानी पत्रकारीय समझ के दायरे में जब पूंजी या मुनाफा ही महत्त्वपूर्ण हो तो फिर यहीं से आता है स्ट्रिंगर से लेकर रिपोर्टर तक पेड न्यूज का खेल, या फिर कॉरपोरेट संपादक के जरिये सत्ता के पूंजी-बंटवारे में सेंध लगाने की हैसियत तले राडिया-टेप सरीखे सवाल। पंद्रह बरस पहले जब आजतक खबरिया चैनल के तौर पर नहीं था और महज बीस मिनट में देश भर की खबरों को समेटने का माद्दा एसपी सिंह रखते थे, तब सुखराम के घर से बोरियों से निकले नोटों को कैमरों पर देख कर उन्होंने आजतक की पत्रकारीय टीम की बैठक में कहा था कि अगर इन नोटों को आपने भूसा नहीं माना तो फिर मीडिया भ्रष्टाचार पर नकेल नहीं कस पाएगा। और उसके बाद आजतक के कार्यक्रम में जब्त करोड़ों के नोट दिखा कर एसपी सिंह ने भ्रष्ट मंत्री का कच्चा चिट्ठा पेश किया। लेकिन आज हाल यह है कि साढ़े चार हजार करोड़ के मुकेश अंबानी के मकान का ग्लैमर तमाम समाचार चैनलों ने यह कह कर परोसा कि दुनिया का सबसे रईस शख्स हमारे पास है… और इसके लिए देखिए नायाब वाइट हाउस।

दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए चौदह बरस पहले जब उद्योगों को हटाने का एलान हुआ, तो एसपी सिंह ऐसी खबर बनाने में जुटे, जिसमें प्रदूषण का मारा मजदूर हो और उस मजदूर के घर का चूल्हा भी उसी उद्योग के सहारे जलता हो। और उस वक्त लुटियन की दिल्ली पर एसपी सिंह ने सीधा हमला किया था। वहीं दस बरस पहले जब सैनिक फार्म पर एमसीडी का बुलडोजर चल रहा था, तब आजतक के ही संपादक उदय शंकर इस बात पर तैयार हो गये थे कि छतरपुर के फार्म हाउसों के भीतर की दुनिया से देश को परिचित कराया जाए। जहां आज नीरा राडिया का भी फार्म हाउस (आकाशगंगा) है और जिस पर सीबीआई ने छापा मारा। पहले फार्म हाउस संपादक को समाज की बदहाली में मलमल का पैबंद नजर आते थे। दस बरस बाद संपादकों को नीरा राडिया के फार्म हाउस में ग्लैमर और देश के विकास की चकाचौंध नजर आती है।

किस तेजी से मीडिया का चरित्र बदला, इसका अंदाजा अब खबरों को पकड़ने और दिखाने से भी लगाया जा सकता है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में तीस फीसद लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। वहां अधिकतर बुनकर भुखमरी के कगार पर हैं। कपास और गन्ना उगाने वाले खुदकुशी कर रहे हैं। लेकिन इसी दौर में औरंगाबाद में सबसे ज्यादा मर्सिडीज गाड़ियां हैं, इस पर राष्ट्रीय समाचार चैनलों ने विशेष कार्यक्रम बनाये। डीएलएफ के मालिक के पास दो सौ करोड़ की कारों का काफिला है, इस पर विशेष रिपोर्ट कई चैनलों पर आयी। दस बरस में मीडिया हाउस का मतलब कॉरपोरेट जगत का स्तंभ बनना हो चुका है और पत्रकार का मतलब भी ब्रांड बनना। यानी कीमत अब ब्रांड की है। समाचार चैनल ब्रांड है, और कोई पत्रकार अगर ब्रांड बन गया तो उसके लिए भी पत्रकारिता मायने नहीं रखती, बल्कि वह मानने लगता है कि उसके जरिये ही पत्रकारिता चल सकती है। जबकि दस बरस पहले ब्रांड का मतलब था खबरों को लेकर विश्वसनीयता, पत्रकारीय मूल्य।

दस बरस पहले पत्रकारीय समझ जहां आम आदमी के हक में वी द पीपुल, फॉर द पीपुल का सवाल खड़ा करती थी, वहीं अब लोकतंत्र को भी पूंजी-मुनाफे का गुलाम मानने से नहीं हिचकती। मीडिया का यह चेहरा अब खुल कर मान चुका है कि देश संसद या संविधान से नहीं बल्कि कॉरपोरेट समाज के जरिये चलता है। दस बरस पहले मीडिया विकल्प के सवालों में देश की व्यवस्था को भी परखता था। लेकिन आज बदली हुई व्यवस्था और कॉरपोरेट समाज के लिए पत्रकारिता को ही विकल्प मान लिया गया है। यानी जिससे लड़ना था, जिस पर नजर रखनी थी, उसी की पूंछ बन कर सूंड़ होने का भ्रम नया पत्रकारीय मिशन हो गया है।

लेखक पुण्‍य प्रसून वाजपेयी वरिष्‍ठ पत्रकार तथा जी न्‍यूज के संपादक हैं. उनका यह लेख जनसत्‍ता में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया गया है.


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