क्या भारत 2020 तक चीन से आगे निकल जाएगा?

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गिरीशजी: ड्रैगन बनाम टाइगर :  नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था - 'चीन को अभी सोने दो. यदि वो जाग गया तो भारी उथल-पुथल करेगा.' नेपोलियन ने यह बात लगभग दो शताब्दी पहले कही थी- लेकिन इसका असर अब दिख रहा है. तभी तो दुनिया की सबसे तेज विकसित होती चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर छपी दो रिपोर्टें इस समय खासी चर्चा में हैं. पहली है साप्ताहिक 'द इकानॉमिस्ट' की विशेष रिपोर्ट. इसमें संभावना जताते हुए कहा गया है कि तेजी से बढ़ते चीन के विश्व अधिपति बनने पर कई खतरे पैदा होंगे. इनमें सबसे निर्णायक तो यही होगा कि पश्चिमी दुनिया जिस मात्रा में असरहीन होगी, उतनी ही तेजी से नई विश्व व्यवस्था का निर्माण होगा.

चीन समर्थक विचारक ये भी मानते हैं कि इस नएपन का असर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी दिखेगा. माना तो ये भी जा रहा है कि तब दुनिया की 20 फीसदी आबादी का ही देश चीन नहीं होगा बल्कि वो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के साथ ही सबसे बड़ी सैन्य शक्ति का भी नियंता होगा. जो साम्यवाद की जगह उग्र राष्‍ट्रन्वादी विचारों से प्रभावित होगा. यानी वो चीन पूरी तरह से उस शक्तिशाली 'ड्रैगन' का मूर्तरूप होगा, जिसे पारंपरिक रूप से चीनी मुहावरों में अतुलनीय माना जाता है.

लेकिन 'द इकानॉमिस्ट' की इस रिपोर्ट से उलट विश्व बैंक की रिपोर्ट है जो दूसरी ही बातों का संकेत करती है. विश्व बैंक की ये रिपोर्ट आंकडों का हवाला देते हुए कहती है कि चीन के आर्थिक विकास का ग्राफ 2015 से घटना शुरू हो जाएगा और 2020 तक भारत की विकास दर चीन से आगे निकलने की स्थिति में आ जाएगी. इसका सबसे बड़ा कारण होगा कि चीन में आज जो 'प्लस' है वही उसका 'माइनस' होगा. चीन के विकास में प्रमुख भूमिका निभाने वाली युवा शक्ति का 2020 से कमजोर होना, और जो स्थिति चीन की आज है, उसका भारत के पक्ष में झुकना. 2020 में  भारत में औसत उम्र जहां 29 वर्ष होगी वहीं चीन में यह बढ़कर 37 साल होगी. यानी तब भारत में जहां उत्पादक शक्ति में तेजी से इजाफा होगा वहीं चीन में तुलनात्मक दृष्टि से यह न केवल गिरेगी बल्कि अनुत्पादक जनसंख्या का बड़ा बोझ भी उसे वहन करना होगा.

विश्व बैंक का ये भी कहना है कि 2015 से इसके संकेत स्पष्ट रूप से दिखने लगेंगे, जब भारत की विकास दर चीन से आगे निकलनी शुरू हो जाएगी. इस तरह 10 से 15 वर्षों के बीच भारत चीन से आगे निकल जाएगा. कुछ लोगों को ये बात थोड़ी अविश्वसनीय और अपच लग सकती है कि आए दिन भ्रष्टाचार के खुलासे वाले देश भारत में क्या ऐसी आर्थिक प्रगति संभव हो पाएगी? जहां अभी भी लाखों-करोड़ों लोग बेरोजगारी के शिकार हों, किसान आत्महत्याएं कर रहे हों और बिना रिश्वत के सरकारी दफ्तरों में कोई  काम न होता हो- वहां ये कैसे संभव है? निश्चित रूप से शंकाएं सही हैं, लेकिन ये तस्वीर का एक पहलू है- जो भारत के स्वतंत्र मीडिया, अभिव्यक्ति की आजादी और हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में कभी खबरों की सुर्खियों के रूप में और कभी जनाक्रोश के रूप में सामने आता रहता है. निश्चित रूप से यही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत भी है, जो विभिन्न धर्म-मजहब-विचार-पंथ-संप्रदाय-भाषा-क्षेत्र-बोली-भूषा-अंचल-खानपान के बीच एकता की कड़ी भी है. जो बहुलवाद को एकता के सूत्र में भी पिरोती है. जो किसी भी कुंठा, आक्रोश या नाराजगी को अभिव्यक्ति का पूरा मौका देती है और वो कम-से-कम 'नासूर' नहीं बन पाता.

लेकिन चीन में ऐसा नहीं है. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि चीन में हर साल लगभग नब्बे हजार विद्रोह होते हैं, जो वहां की व्यवस्था के विरोध में आम लोगों के स्तर पर प्राकृतिक रूप से फूटते हैं, लेकिन वहां के सैनिक तंत्र द्वारा उन्हें बर्बर तरीके से दबा दिया जाता है. ज्यादातर तो ये खबरें बाहरी दुनिया को पता भी नहीं लग पातीं. खुद चीन में सरकार नियंत्रित मीडिया इन्हें प्रकाशित-प्रसारित नहीं करता. ऐसे में आशंका यही है कि चीन आर्थिक संदर्भों में जिस पूंजीवादी-उदारवादी धारा में चल रहा है, और जिसमें स्वाभाविक रूप से मुद्रास्फीति और दूसरी आर्थिक परेशानियां आने वाले समय में वहां की जनता और खासकर मध्य वर्ग के लिए बड़ी दिक्कत बनेंगी, तो 'चीनी विकास मॉडल' क्या करेगा? उसके पास तो भारत की तरह न तो कोई स्वतंत्र मंच है और न ही स्वतंत्र मीडिया, जो जनता की कुंठा और नाराजगी को 'प्रेशर कुकर के सेफ्टी वॉल्व' के जरिए बाहर निकाल सके. आखिर लोग 1989 के थ्यान आनमन स्क्वायर का विरोध भूले तो नहीं हैं, जब सैकडों-हजारों प्रदर्शनकारी छात्रों पर बर्बर अत्याचार में टैंक तक चढ़ा दिए गए थे. वैसे ये डर चीनी व्यवस्था के पोषक विचारकों को अभी से सताने भी लगा है. तभी तो हाल में चीन के प्रमुख अंग्रेजी अखबार 'चाइना डेली' में प्रकाशित हुआ कि पश्चिमी दुनिया चीन को भारत-जापान-दक्षिण कोरिया और अन्य देशों की मदद से घेरना चाहती है. चीन को इसका जवाब बौद्ध धर्म से देना चाहिए, वरना ईसाइयत चीन पर हावी हो जाएगी, और पश्चिम का काम आसान हो जाएगा.

दिलचस्प है कि चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ जब भारी-भरकम दल-बल के साथ हाल में भारत आए तो उनके साथ अनेक बौद्ध धर्म के विद्वान भी थे. इनमें पेकिंग यूनिवर्सिटी में भारतीय अध्ययन केंद्र के प्रमुख वांग बांगवेई भी थे. ये वही वांग हैं, जो भारत के प्राचीनतम बौद्ध अध्ययन केंद्र बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्निर्माण समिति के भी सदस्य हैं, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्‍य सेन कर रहे हैं. चीन ने हाल में इन्हीं संदर्भों में लुओमांग के प्राचीनतम बौद्ध मंदिर के पुनर्निर्माण का ही निर्णय नहीं किया है बल्कि वह उसे बौद्ध अध्ययन के अंतर्राष्‍ट्रीय केंद्र के रूप में भी निर्मित कर रहा है. वहां भारत की ओर से सांची की तरह का बौद्ध स्तूप भी निर्मित किए जाने का प्रस्ताव है. मजे की बात है कि ये सब उस चीन में हो रहा है, जो आर्थिक खुलेपन और विकास के बाद अब भी खुद को धर्म को अफीम बताने वाला साम्यवादी ही कहता है.

दरअसल, इसे चीन की अपने ही अंतर्द्वंद्वों से निपटने की सुनियोजित नीति भी माना जा रहा है. गौर करें चीन की पुरानी मान्यता है कि 'बौद्ध धर्म सूर्य के समान है तो ताओवाद चंद्रमा की तरह. और कन्फ्यूशियसवाद आसमान के पांच सर्वाधिक चमकते सितारे.' खुद चीन की साम्यवादी क्रांति के प्रणेता माओ त्से तुंग की मां बौद्ध थीं और उन्होंने चीन में भारत के पहले राजदूत केएम पणिक्कर से कहा था कि यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो वो बुद्ध की धरती भारत यानी 'गुरुदेश' में हो. आज भी ढेरों विकास के बावजूद चीन में बुद्ध और बौद्ध धर्म वैसे ही पूज्य हैं; और भारत को गौतम बुद्ध की धरती के चलते 'गुरुदेश'  ही माना जाता है. ऐसे में चीनी नीतिगत स्तर पर इस भावनात्मक और आध्यात्मिक लगाव का इस्तेमाल अपने हित में करना चाहें तो आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए. इसी तरह चीन ने लू श्याबाओ को 'नोबेल शांति पुरस्कार' का विरोध करते हुए ओस्लो के 10 दिसंबर के नोबेल पुरस्कार समारोह से एक दिन पहले बीजिंग में 9 दिसंबर को ही 'कन्फ्यूशियस शांति पुरस्कार' आनन-फानन में एक समारोह में ताइवान के पूर्व उपराष्‍ट्रपति लिएन चान को दिया. गौर करें- ये वही लिएन चान हैं, जो चीन के अनन्य समर्थक शुरू से ही रहे हैं. नतीजा रहा ढाक के तीन पात. चीन के इस प्रयास की अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर भारी आलोचना ही हुई और ओस्लो के पुरस्कार समारोह को 'मजाक' बताने वाले चीन का खुद का शांति समारोह 'मजाक' और 'तमाशा' बनकर रह गया. तो इस तरह चीन की छटपटाहट को समझा जा सकता है और भारत-जापान-दक्षिण कोरिया जैसे पड़ोसियों के प्रति उसकी आक्रामकता के पीछे छिपी झुंझलाहट को भी.

ऐसे में गौरतलब ये भी है कि भारत के अनेक राज्यों ने विकास के जो प्रतिमान कमियों के बावजूद हाल के वर्षों में स्थापित किए हैं, वो एक सुखद संकेत है. सबसे हाल का उदाहरण तो बिहार का ही है, जहां ढेरों पिछड़ेपन, गरीबी और कमजोरियों के बावजूद जनता के स्तर पर चुनाव में विकास की जो ललक दिखी है, वो बताता है कि व्यवस्था की अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों के बावजूद ये लोकतंत्र ही है, हमारी उदार-सहिष्णु-बहुलवादी धारा ही है, जो हमारी असली ताकत भी है. तो ये भी हमारी ऐसी ही शक्ति है, जिनका चीन के पास अभाव है, और इसे हमने लंबे समय के अपने अनुभवों-संघर्षों से हासिल किया है. इसलिए आज हमारी जरूरत ये है कि हमें उत्साह और जिजीविषा से आगे बढ़ना है और बताना है कि हमारा राष्‍ट्रीय पशु बाघ पूरी तरह सक्षम है अपनी दहाड़ से चीनी ड्रैगन को पीछे धकेलने में.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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