एनजीओ की पुराण कथा

E-mail Print PDF

एनजीओ आज सम्भवतः भारत के घृणिततम शब्दों में से एक है। पिछ्ले कुछ वर्षों से नौकरशाह और राजनेता जिस पुरजोर अन्दाज़ में एनजीओ की मुखालफ़त करते रहे हैं, उसी का नतीजा है कि आज आम जनता भी इन्हें सन्देह की दृष्टि से देखती है। इस वर्ष केंद्रीय मंत्रियों द्वारा सामाजिक संगठनों पर रणनीतिक तौर पर हमले किये गये हैं। जहां गृह मंत्री इन संगठनों को नक्सलियों का हितैषी बताते हैं, वहीं वित्त मंत्री सांख्यिकीय-साक्ष्यों के आधार पर इनके विदेशी आर्थिक सहयोग और व्याप्त भ्रष्टाचार पर विस्तृत बयान दे चुके हैं। इन आंकड़ों में बताया गया है किस प्रकार एनजीओ के घातक रोगाणु-विषाणु करोड़ों की संख्या में देश भर में फ़ैल चुके हैं और उसका खून चूस रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठतम नौकरशाह ने लेखक को चाय की चुस्कियों के बीच यह समझाया है कि 'ये एनजीओ लुटेरों से भी बदतर हैं; वो कम से कम बंदूक चलाने की हिम्मत तो दिखाते हैं, ये एनजीओ तो कागज दिखाकर लूट रहे हैं।’ दूसरी ओर पत्रकारों, वकीलों और चुनिंदा लेखकों का एक समूह भी व्यवस्था के दुष्प्रचार से लोहा लेने सामने आ गया है। इस संघर्ष ने इतिहास में पहली बार एक प्रगतिशील, अराजनैतिक, अधार्मिक लेखकीय स्वर को अखिल भारतीय स्तर पर ऊभरते हुए देखा है। यह लड़ाई इतनी बड़ी हो चुकी है कि आम जनता की समझ से परे इस विषय पर एक ओर 'आउटलुक’ राष्ट्रीय पत्रिका ने एक मुखपृष्ट कथा लिखी है, वहीं टाईम्स समूह के न्यूज़ चैनल ने कोलकाता जाकर सरकार के समांतर सुर में एनजीओ को गरियाते हुए, राष्ट्रवाद-प्रेरित, संगोष्ठी कर डाली है। एनजीओ पर आज महत्ता के दृष्टिकोण से चर्चा अथवा स्वस्थ आलोचना की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये संगठन आज भारत के वृहत्‍तम्‍ा रोजगार प्रदाता हैं और राष्ट्रीय बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा इनके माध्यम से खर्च होता है। चिंता की बात यह है कि भारतीय लोकतंत्र के इस कठिनतम समय में जबकि स्वयं व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता भी आस्था के संकट से जूझ रहे हैं, वैसे में सामाजिक संगठनों के प्रति ऐसा दुष्प्रचार लोकहित के लिये बहुत नुकसानदेह है।

मज़े की बात यह है कि एनजीओ के मुद्दे पर मचे इतने शोर-ओ-गुल में यह सच्चाई खो सी गयी है कि यह शब्द-पद कितना भ्रामक है। एनजीओ अर्थात गैर सरकारी संगठन एक व्यापक परिभाषा है और व्यावसायिक उद्यम, न्यायपालिका, सरकारी मंत्रालय, विभाग, बोर्ड, आयोग, प्राधिकरण एवं प्रत्यक्ष चुनाव से बने समूहों को छोड़कर प्रत्येक सामाजिक संगठन इसके अंतर्गत आ जाता है। तकनीकी तौर पर सारी सहकारी संस्थायें, न्यास, कर्मचारी/पेशेवर संघ, यहां तक कि राजनैतिक पार्टियां भी इस परिभाषा की सीमा में आ जाती हैं। लेकिन एनजीओ से आमतौर पर आशय होता है सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के तहत संगठित संस्थायें। यहां पर एक अनाधिकारिक वर्गीकरण ध्यान देने के योग्य है। पहली श्रेणी तथाकथित ’असली’ एनजीओ की है, जो इस उद्देश्य से शुरु की गयी थी कि जननीति और जनसेवा की रिक्‍तियों को पूरा कर सकें, और इस अर्थ में यह संस्थायें सरकार-संपूरक हैं।

दूसरी श्रेणी उन नयी एनजीओ की है, जो कल्याणकारी योजनाओं के निष्पादन की सरकारी जिम्मेदारी निचले स्तरों पर उठाती हैं। जिन करोड़ों एनजीओ के आंकड़े पिछले दिनों सरकारी प्रचार तन्त्र द्वारा जारी किये गये हैं, उनमें से अधिकतर इसी दूसरी श्रेणी से हैं। यह अनाधिकारिक वर्गीकरण बहुत स्पष्ट नही है, क्योंकि व्यावहारिक कारणों से प्रथम श्रेणी के अधिकतर संगठन निष्पादन कार्यों में भी संलग्न हैं, लेकिन मूल प्रेरणा के आधार पर इनको समझना इसलिये बहुत आवश्यक है क्योंकि जनकल्याण का असली राज़ यहीं छुपा हुआ है। जनता अपने इर्द-गिर्द जिन एनजीओ को सबसे ज्यादा देखती है, वह दूसरी श्रेणी के हैं, कुकुरमुत्ते की तरह उगते हुये ऐसे ही एनजीओ कुछ दशकों से यूपी-बिहार में दहेज में दिये जा रहे हैं। सरकारी दुष्प्रचार का इशारा इन्ही एनजीओ की तरफ़ होता है क्योंकि इनके क्षुद्र आर्थिक संव्यवहार के प्रति भावनायें भड़काना सरल है, लेकिन असली निशाना पहली श्रेणी के संगठनों पर लगा हुआ है।

हालिया हंगामे को समझना इतना मुश्किल नही है, क्योंकि यह बहुत हद तक किशोर मनोविज्ञान पर आधारित है। 1966 में इंदिरा गांधी ने सत्ता संभालने के तत्काल बाद कांग्रेस के अंदरूनी दक्षिणपंथी गुट को साधने के लिये वाम पक्ष से छ्द्म सहयोग की जो परंपरा प्रारंभ की थी वह आखिर 2009 में एटमी डील के मुद्दे पर भंग हो गयी। पिछले लोक सभा चुनावों में वाम पक्ष की दुर्दशा के बाद बाह्य सहयोग की मजबूरी भी समाप्त हो गयी लेकिन दक्षिणपंथी, अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को एनएसी के रूप में वामपंथी अभिभावकत्व की छाया अब भी परेशान करती है। इस ’राष्‍ट्रीय सलाहकारिणी सभा’ को न केवल आधिकारिक मान्यता प्राप्त है, बल्कि इस सभा की अध्यक्षा के तौर पर सोनिया गांधी को काबीना मंत्री का दर्जा हासिल है। इस 27 सदस्यीय सभा में सोनिया के पसंदीदा बुद्धिजीवी संप्रग की सुविधा के लिये जननीतियां प्रस्तावित करते हैं। इन सदस्यों में से कोई भी वामपंथी पार्टियों का सदस्य नही है, लेकिन भारतीय बुद्धिजीवी होने की तो परिभाषा में ही वाम-प्रेम सम्मिलित है। एक तो वाम पंथ आधुनिक वैज्ञानिक मान्यताओं से विकसित हुयी इकलौती राजनैतिक विचारधारा है, दूसरे, भारत में दक्षिणपंथी बौद्धिकता की कोई परंपरा भी नही है।

मनमोहन, मोंटेक पैदा करने वाले “डेलही स्कूल आफ़ इकोनोमिक्स” की एक पुरानी कहावत है कि भारत में दो ही प्रकार के अर्थशास्त्री होते हैं- या तो वाम-वाम या दक्षिण-वाम। खैर, तो अब प्रधानमंत्री गुट को हर दिन एनएसी के दिग्गजों से झड़प करनी पडती है, जो किसी भी सत्ताधारी के लिये काफ़ी बडा सरदर्द होता है। हर्ष मंदर से लेकर जान ड्रीज़ तक लगभग सारे ही सदस्य मोंटेक सिंह आहलूवालिया और कौशिक बासु जैसे मनमोहन के दुलारे अधिकारियों से दो-दो हाथ करने को तैयार बैठे रह्ते हैं। सरकार की अपेक्षा एनएसी के सदस्य स्वयं को जन संघर्ष कार्यकर्ताओं जैसे मेधा पाटकर और अरुंधति राय के अधिक निकट पाते हैं। निश्चित रूप से किसी भी नवकिशोर की तरह मनमोहन इस वाम अभिभावकत्व की छाया से निकलने को बेचैन हैं। उनकी उलझन यह है कि दुबारा सत्ता सुख दिलाने वाले सारे यशस्वी कार्यक्रम जैसै मनरेगा और सूचना का अधिकार, एनएसी से ही आये हैं इसलिये सरदर्द से मुक्ति मिलना कठिन है। सरकार की यही खीझ अब असुविधाजनक एनजीओ पर निकल रही है।

एतिहासिक पृष्‍ठभूमि की पड़ताल भी एनजीओ विवाद को समझने के लिये ज़रूरी है। भारत में दयालुता दिखाने के लिये राजाओं और जागीरदारों द्वारा जनकल्याण कार्यों में पैसे खर्च करने की पुरानी परंपरा है। लेकिन मध्य युग के लगातार विदेशी हमलों ने भारतीय जनता और उसके बहुसंख्यक राजाओं की आर्थिक स्थिति काफ़ी खराब कर दी थी। कोलकाता में राजधानी स्थापित होने के बाद वहां छोटे राजाओं और जागीरदारों का काफ़ी बड़ा जमावड़ा था। इस बंगाली भद्रलोक में जनकल्याण की बड़ी कुलबुलाहट थी लेकिन व्यक्तिगत आर्थिक संसाधन पर्याप्त न थे। ऎसे में रईसों के साझा सहयोग से सामाजिक कार्य करने की एक नयी परंपरा प्रारंभ हुई। इसी व्यवस्था को निबन्धित करने के लिये 1860 में ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा सोसायटी पंजीकरण अधिनियम बनाया गया। चूंकि तत्कालीन भारत ने कुछेक अपवादों को छोड़कर विक्रमी सत्ताधीशों द्वारा लूट-खसोट से प्रेरित कामचलाऊ प्रशासन ही देखा था, इसलिये सामाजिक विकास के क्षेत्र में कार्य की बड़ी संभावनायें थीं। आगे चलकर सरकार ने भी इन सोसाइटियों की पहल को आदर दिया और इनके द्वारा स्थापित स्कूल कालेज, अनाथालय, अनुसंधान केंद्रों को आर्थिक मदद देना शुरू किया। आज का प्रचलित मुहावरा ’हाई सोसाइटी’ दरअसल इसी सोसायटी पंजीकरण अधिनियम से आया है। यह व्यवस्था लगभग 100 वर्षों तक चलती रही और फ़िर एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया जब अन्तर्राष्ट्रीय बैंकों पर केन्द्रीय सरकारी बजट की निर्भरता तेज़ी से बढ़ी।

पहले इंदिरा और फ़िर राजीव के शासन में वर्ल्ड बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने आर्थिक नीतियों से आगे बढ़कर प्रशासन में प्रयोगधर्मी सुझाव दिये। इन बैंकों ने इस विचार को बहुत झटका दिया कि सरकारी खजाना सिर्फ़ सत्ताधीशों की सनक या समझ के आधार पर खर्च किया जाये, और साथ ही नीति पालन- कार्य निष्पादन में “सिविल सोसायटी” को सहभागी बनाने की शर्त रखी। अपनी मूर्खता या चालाकी में राजीव के सलाहकारों ने इस बिंदु की व्याख्या सोसायटी पंजीकरण अधिनियम वाली सोसायटी के तौर पर की। यदि पश्चिमी देशों को देखें तो यह बात साफ़ हो जाती है कि उनकी ’सिविल सोसायटी’ का निकटतम भारतीय स्वरूप सहकारी संस्थाओं में दिखता है, लेकिन सहकारिता के लिये नेहरू-विनोबा शीत युद्ध ने दशकों पहले तय कर दिया था कि उसे विमाता के प्रेम के सहारे ही जीना होगा। खैर, सोसायटियों को योजना क्रियान्वयन का काम मिलना शुरु हो गया। सरकार चलानेवाले दूरद्रष्टा नौकरशाहों को यह पता था कि अब निचला सरकारी अमला कम होता जायेगा और भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिवेश के मद्देनज़र इसका नतीज़ा क्रियान्वयन में आम जनता की भागीदारी की जगह सेवा-प्रदाय की सस्ती-शोषक आउट्सोर्सिंग के रूप मे होगा।

सत्तासीन सभी नौकरशाहों-मंत्रियों ने अपने बेटे-बहू-भतीजे के नाम बड़े-बड़े एनजीओ खड़े कर लिये। पंचायती राज संस्थाओं के साथ मिला कर देखें तो यह असल में भ्रष्टाचार के विकेन्‍द्रीकरण की शुरुआत थी। रोज़गार के नये अवसर तलाशते नौजवानों और दलाल मनोव्रृत्ति के लोगों के लिये भी एनजीओ का रूख करना स्वाभाविक बात थी। यह एक अलग किस्म की ठेकेदारी थी लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार तकरीबन उसी स्वरूप में चलता रहा। काम पाने के लिए पैसै देना वैसी ही मजबूरी थी जैसी आम सरकारी भर्तियों में होती है। किसी भी सरकार ने इस व्यवस्था की खामियों को दूर करने का कोई ठोस और सार्थक प्रयास नही किया। आज भी सरकार सुधार के बजाय दोषारोपण में लगी हुयी है क्योंकि उद्देश्य आज भी मात्र आत्मरक्षा है, सम्यक विकास नही। फ़िर भी इतना साफ़ है कि दूसरी श्रेणी के एनजीओ ने भी कार्यानुभव और नियमों की जानकारी के बाद अधिकारियों पर दबाव बनाया कि सारा पैसा खा जाने की जगह कुछ हिस्सा ज़मीन पर खर्च भी किया जाए। सैकड़ों छोटे एनजीओ ने ज़मीनी दिक्कतों को देखते हुये प्रणालीगत सुधार प्रस्तावित और क्रियान्वित किये-कराये। एक खास बात जो जान बूझ कर छुपायी गयी है वह यह कि पिछले बीस वर्षों में नागरिक सुविधा प्रदाय व्यवस्था में जो सुधार आया है, विकास की पतली सी जो धार जो छोटे गावों तक पहुंची है, उसका श्रेय तथाकथित उदारवादी नीतियों से कहीं ज्यादा इन बदनाम लेकिन लगनशील और जुझारू एनजीओ को जाता है।


AddThis