बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ...

E-mail Print PDF

दिनेश चौधरीभारत रत्न लता मंगेशकर ने सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग की है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। सचिन को भारत-रत्न से नवाजने की मुहिम मीडिया ने लंबे अरसे से चला रखी है। नैनो की लॉचिंग के बाद कुछ लोगों ने रतन टाटा को भी भारत रत्न देने की बात कही थी और प्रमोद महाजन के एक वक्तव्य को बाकायदा कोट किया गया था कि गाने-बजाने वालों को भारत रत्न बहुत मिल चुका 'अब देश की सेवा करने करने वालों' को यह सम्मान मिलना चाहिये। उन भले आदमियों की बात उस समय मान ली गयी होती तो अब 'भारत रत्न' रतन का नीरा से संवाद सुनने में कितना रस मिलता?

लता मंगेशकर को भारत-रत्न का सम्मान बिसमिल्लाह खां साहब के साथ दिया गया था। खां साहब को मैं सचमुच का रत्न मानता आया हूं। कायदे से उन्हें पंडित रविशंकर से भी पहले यह सम्मान मिल जाना चाहिये था। लेकिन उन्हें भारत रत्न का सम्मान नहीं भी दिया जाता तो उनका कुछ बनता-बिगड़ता नहीं था। उनकी कद-काठी इस सम्मान से बहुत ऊपर जा चुकी थी, वैसे ही जैसे गांधी की नोबेल से। लेकिन लता मंगेशकर के चाहने वाले मुझे माफ करे -यह मेरी व्यक्तिगत राय है कि - लता जी को भारत रत्न का सम्मान कम से कम खां साहब के साथ नहीं दिया जाना था। मुझे न तो उनकी महानता पर संदेह है न उनकी प्रतिभा पर। सच पूछिये तो अपनी इतनी औकात ही नही है कि उनकी महानता या प्रतिभा पर कोई राय व्यक्त करें। लेकिन भारतीय संगीत को उनका अवदान जैसा मिल सकता था, अपनी प्रचंड प्रतिभा के बावजूद वे ऐसा नहीं कर सकीं। अपने बचपन में ही पूरे परिवार का बोझ उन पर आ जाने के कारण हो सकता है कि वे एक किस्म के कांप्लेक्स से घिरी रही हों। वरना क्या कारण है कि दौलत -शोहरत सब कुछ हासिल कर लेने के बाद भी वे ''मम्मी ने मेरी तुझे चाय पे बुलाया है'' जैसे गाने गाती रहीं। बहरहाल, असल मुद्‌दा उनके रत्न होने या न होना का नहीं है। बात सचिन की है।

प्रभाष जी के प्रति पूरा सम्मान व्यक्त करते हुए भी मैं यह नम्र निवेदन करना चाहता हूं कि इस देशा में बाजारवादी संस्कृति का संवाहक बनने में मीडिया के साथ इस क्रिकेट नामक तमाशे की सबसे बड़ी भूमिका रही है। इस अफीम के विरोध में आवाज उठाने का साहस किसी में नहीं है। कथित रूप से देश का स्वाभिमान जगाने वाले बाबा रामदेव भी इस खेल में हारने पर खिलाडि़यों को अपनी सेवायें देने की पेशकश करते हैं और सर्वहारा की प्रतिनिधि कही जाने वाली पार्टियां भी सौरभ गांगुली को टीम से बाहर से कर दिये जाने पर संसद में आवाज उठाती हैं। राजेंद्र यादव भी हर सड़ी हुई व्यवस्था पर बहुत गहराई से चोट करते हैं, पर मुझे याद नहीं कि इस तमाशे के विरूद्ध उन्होंने कभी कोई संपादकीय लिखा हो। या यह विषय शायद उनकी कार्यसूची में नहीं आता। देश का कोई भी लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी, बाबा इस तमाशे के विरूद्ध कोई मुहिम नहीं छेड़ना चाहता। कम से कम कोई इतना तो कहे कि 'चलों मान लेते हैं कि यह खेल देश के लिये जरूरी है, पर इसकी मात्रा तो कुछ तय होनी चाहिये।' इंटरनेट व मोबाइल की भांति अब यह भी अनलिमिटेड हो गया है। पहले भद्रजनों का यह खेल केवल ठंड में खेला जाता था। अब तो मैंने देखा है कि बेचारे पैसे को लोभी ये भद्रजन 44 डिग्री तापमान में भी दिनभर गेंद के पीछे भागते रहते हैं। उनके पीछे भागते हैं हमारे चैनल-बहादुर। मीडिया पर शोध करने वाला कोई छात्र ही बता सकता है कि हमारे समाचार चैनलों में इस तमाशे के पीछे कुल कितना समय जाया किया जाता है।

अब हमारे मीडिया-बहादुर सचिन को भारत-रत्न बनाने पर तुले हैं। वैसे भारत रत्न तभी दिया जाता है जब वह रत्न कब्र में पांव लटकाने की अवस्था में पहुंच जाये। इसलिए कम से कम इतना तो इंतजार कर लीजिये की अपने राजदुलारे क्रिकेट से सन्यास ले लें। वैसे वे इतनी जल्दी लेंगे नहीं। इतनी दौलत और शोहरत आज के जमाने में कोई संन्यासी भी नहीं त्यागते, सचिन तो फिर भी घोड़ों की तरह आईपीएल में बिकने वाले खिलाड़ी हैं। वे ईमानदार भी हैं। उनकी देश निष्ठा पर किसी को कोई संदेह नहीं है। पर कल के रोज कोईं फिक्सिंग-विक्सिंग का कीचड़ किसी ने उन पर उछाल दिया तो रत्नों की क्या इज्जत रह जायेगी? सचिन बेदाग हैं, पर यह खेल तो बेदाग नहीं है। इतना पैसा कमाने पर भी इनकी पैसे की हवस मिटती नहीं है? कहते हैं कि एक बार संदेश भेजने की गड़बड़ी की वजह से दोनों टीमों को यह फरमान मिला कि उन्हें हारना है। अब आप इस बात की सिर्फ कल्पना कीजिये और आनंद लीजिये कि जब दोनों टीमें हारने के लिये खेल रहीं हों तो वह मैच कितना दिलचस्प रहा होगा? हालांकि व्यक्तिगत रूप से सचिन की छवि एक अच्छे इंसान की है। वे फालतू के विवादों नहीं रहते। क्रिकेट खेलते हैं, विज्ञापन करते हैं और पैसे कमाते हैं। भारत की क्रिकेट टीम की हार-जीत (''भारत की हार जीत'' मैं जानबूझकर नहीं लिख रहा हूं, क्रिकेट से 'भारत' का कोई लेना देना नहीं है) का उनके प्रदर्शन से कोईं संबंध अक्सर नहीं होता है। वे देश से ज्यादा अपने व्यक्तिगत प्रदर्शन की चिंता करते हैं, इसलिये व्यक्तिगत गुणों के लिये उन्हें भारत-रत्न तो मिलना ही चाहिये!

''बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ, कुछ न समझे खुदा करे कोई।' मैं “I hate Cricket” नामक एक वेबसाइट बनाकर उसमें अपने जैंसे लोगों को जोड़ने की मुहिम चलाना चाहता हूं। मैं क्रिकेट से नफरत करता हूं और इसी नफरत के आवेश में उल्टा-सीधा बक रहा हूं। इसलिए हे पाठको मुझे क्षमा करें जो मैंने इतने महान लोगों के बारे में कुछ उल्टा-सीधा कहा। लता दीदी से भी मैं दिल से मुआफी चाहता हूं। सचिन को भारत -रत्न दिलानें की आपकी तमन्ना पूरी हो। पर उन्हीं के साथ एक गरीब खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद को भी लगे हाथ यह सम्मान मिल जाये तो कैसा हो?

लेखक दिनेश चौधरी जर्नलिस्ट, एक्टिविस्ट रहे हैं. सरकारी नौकरी भी की. रिटायरमेंट के बाद फिर से कई तरह के प्रयोगों में सक्रिय हैं. इन दिनों इनका पता ठिकाना भिलाई में है. उनसे This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए संपर्क किया जा सकता है.


AddThis