सीएम और सीजे की हवाई यात्रा से उठ रहे सवाल

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दीपकदेहरादून। हाईड्रो पॉवर, स्टर्डिया और मेडिकल कॉलेज जैसे जमीन घोटाले हाईकोर्ट की टेबल पर पहुंचने के साथ ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के भविष्य का सफर मानों दांव पर लग गया था। अदालत की चौखट से इनके पहुंचने से उपजे शोर-शराबे के बीच पिछले दिनों सरकारी हेलीकॉप्टर से पहाड़ों की सैर पर निकले हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बारेन घोष पर केंद्रित मुंहजबानी कानाफूसियों ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया।

अदालत और उसके महानुभाव जजों के खिलाफ ‘कोर्ट आफ कंटेम्ट’ जैसे ब्रहामास्त्र के भय से मीडिया और सियासी गलियारों में दबी जुबान हो रही चर्चाएं कई गंभीर सवाल उठाती हैं। दिल्ली से प्रकाशित मेल टुडे ने इस अप्रत्याशित हवाई दौरों को खबर का रूप देकर इस बहस को कुछ आगे बढ़ाया है। इस बीच स्टर्डिया भूमि घोटाले पर हाईकोर्ट अपना फैसला भी सुना चुका है। फैसले से निशंक सरकार को राहत मिलती दिख रही है। हाईकोर्ट के 28 दिसम्बर को आए इस फैसले में गड़बड़ी करने वाली राज्य सरकार को ही मामले की जांच के निर्देश दिए हैं।

घोटालों में घिरे मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के खिलाफ पिछले कुछ माह में ही एक के बाद एक तीन जनहित याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की गई। पहला मामला अरबों रुपयों के 56 हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट का नियम विरुद्ध आवंटन कर घपलाबाजी करने का था। इस संबंध में जब जनहित याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई तो मुख्यमंत्री ने एकाएक पलटी खाते हुए पॉवर प्रोजेक्ट का आवंटन निरस्त कर अपनी जान बचा ली।

हालांकि इसके साथ ही उनकी मुश्किलें कम नहीं हुई। यह मामला अभी चल ही रहा था, तभी 2000 करोड़ का स्टर्डिया भूमि घोटाले को लेकर एक और याचिका दाखिल कर दी गई। इस मामले में याचिकाकर्ता ने सीबीआई जांच की मांग की। मुख्य न्यायधीश बारेन घोष की अदालत में जब इस मामले की सुनवाई शुरू हुई तो फिर पुराना वाला दांव खेलते हुए मुख्यमंत्री, जिस जमीन का सरकारी न होने का राग अलाप रहे थे, रातोंरात गले की फांस बनता देख इस मामले में भी अपना फैसला पलट दिया। यह मामला हाईकोर्ट में चल ही रहा था कि इस बीच हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बारेन घोष, सपत्नीक राज्य के कई टूरिस्ट हिल स्टेशनों की हवाई सैर पर निकल पड़े। किसी न्यायाधीश के सैर पर निकलना कोई असामान्य घटनाक्रम नहीं होता, लेकिन इस मामले में राज्य सरकार के हेलीकॉप्टर से मुख्य न्यायाधीश का यह हवाई सफर चर्चा के केंद्र में जरूर आ गया।

इस दौरे की चर्चा इसलिए भी हो रही कि राज्य सरकार के मुखिया से ताल्लुक रखने वाली एक के बाद एक याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। आश्चर्य यह है कि राज्य सरकार के पास एक मात्र उडन खटोला है जो उसके मुखिया के हवाई दौरों के काम आता है। तीन दिन इस सरकारी उडन खटोले से हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने राज्य के औली समेत कई हिल स्टेशन का दौरा किया। अब संयोग देखिये कि 19 दिसम्बर के रोज मुख्य न्यायाधीश बारेन घोष, औली के लिए उडान भरते हैं और इसी दिन पीछे-पीछे राज्य के मुख्यमंत्री भी सैफ विंटर गेम्स का जायजा लेने के लिए औली पहुंच गए।

खैर, जब निशंक के खिलाफ जनहित याचिकाओं पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है तब इन दो प्रमुख महानुभावों का औली दौरा चर्चा के केंद्र में आना अप्रत्याशित भी नहीं है। पर दबी जुबान में मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक सवाल उछाला जा रहा है कि भले ही हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के सरकारी हेलीकॉप्टर से यात्रा करने में कुछ भी अवैधानिक न हो, पर इस यात्रा की टाइमिंग से न्यायपालिका के सामने नैतिक सवाल जरूर खड़े होते हैं। इस पूरी बहस का कुल जमा लब्बोलुआब सरकार के मुखिया पर केंद्रित याचिकाओं पर आने वाले फैसलों की निष्पक्षता पर जाकर टिकता है। इस तरह की शंकाएं और सवाल इसलिए भी मायने रखते हैं कि पिछले दिनों देश की सर्वोच्च अदालत हाईकोर्टों के कतिपय जजों के आचार-व्यवहार पर तल्ख टिप्पणी कर चुकी है।

सीजे

लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.


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