मीडिया के भ्रष्‍ट लोगों ने खबरों का जायका बदला

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कीर्ति मीडिया जिसे हम चौथा खंभा कहते ही नहीं मानते भी हैं। सच्चाई के हर पहलू से रू-ब-रू करवाना, निष्पक्ष संदेश लोगों तक पहुंचाना और हर कमजोर की आवाज बनना, हर कमजोर की आवाज जनमानस से होते हुए सरकार तक पहुंचाना, मीडिया की पहचान है। अंग्रेजों के जमाने में शुरू हुई पत्रकारिता आज लोगों के दिलो-दिमाग में इस कदर बैठ गई है कि इससे एक क्षण भी दूर नहीं रहा जा सकता।

कितनी भी व्यस्त जिंदगी हो, दिन की शुरुआत चाय की प्याली के साथ अखबार से ही होती है और रात खाने के समय चैनलों की फटाफट खबरों के साथ ही पूरी होती है। जब तक मीडिया में मसाला है तभी तक लोगों की नजर उस पर होती है। हर व्यक्ति अपने आप में पत्रकार होता है, क्योंकि उसे सिर्फ न्यूज चैनल, अखबार या रेडियो से मिल रही खबरों तक ही जरूरत नहीं होती, बल्कि उससे ज्यादा जानने की जरूरत होती है। जैसे उसके आसपास क्या घटित हो रहा है। सरकार ने जो कदम उठाये हैं, उसे किस तरह जमीनी स्तर पर उतारा जा रहा है। राज्य-राजधानी में क्या घटनाएं घट रही हैं, कौन-कौन से अहम फैसलें सरकारी व गैरसरकारी स्तर पर जनहित में लिये जा रहे हैं। प्रशासन व्यवस्था ने क्या कदम उठाये हैं। रोजगार की क्या संभावनाएं हैं आदि-आदि। ऐसे कई सवाल हैं जो हर आम आदमी के दिलो दिमाग पर आता है। उसके हर सवालों का जवाब कौन देगा और जनता को कैसे मालूम होगा, जवाब के लिए जनता मीडिया के माध्यमों को चुनती है। अब सवाल उठता है कि क्या मीडिया इस दायित्व को निभाने के लिये तैयार है?

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया ने बहुत नाम कमाया है। कभी सही रास्ते, तो कभी गलत। एक सिक्के के दो पहलू की तरह मीडिया के भी दो पहलू हैं, जिस मकसद से मीडिया की शुरुआत हुई थी, उसमें समय के अनुसार तब्दीली आ चुकी है। खबरों को लोगों तक निष्पक्षता के साथ पहुंचाना मीडिया का धर्म है और कमजोर लाचार, जनता की आवाज बनकर खरा होना भी मीडिया का उत्तरदायित्व है, लेकिन आज मीडिया खुद बेबस नजर आ रहा है। जैसे देश को चलाने के लिये लोकतंत्र में सरकार की जरूरत होती है, वैसे ही घर को चलाने के लिये पैसे की जरूरत होती है। और फिर मीडिया को भी चलाने के लिये पैसे की जरूरत पड़ती है। आज ज्यादातर मीडिया हाउस पूंजीपतियों की वजह से चल रहे हैं। टीवी चैनल की शुरुआत के लिये करोड़ों रूपये खर्च होते हैं। मंहगे सेट, कैमरे और उपकरण की जरूरत पड़ती है। उपर से बड़ी संख्या में पत्रकारों, तकनीशियनों की जरूरत पड़ती है। उन्हें एक अच्छी खासी तनख्वाह देनी पड़ती है। इसके अलावा और भी खर्चे हैं। सवाल उठता है कि मीडिया को चलाने के लिये पैसे कहां से आते हैं। क्या कोई मार्केटिंग टीम इतना पैसा जमा कर सकती हैं। जवाब है नहीं। इसे भी मजबूत सहारे की जरूरत पड़ती है और उसे पूरा करने के लिये पूंजीपति, उद्योगपति ही आगे आते हैं। आर्थिक मदद का तरीका कुछ भी हो सकता है। आर्थिक मदद के एवज में मीडिया से उनकी अपेक्षाएं होती है। जिसे मीडिया गाहे-बगाहे पूरा करता है।

अब बात मुद्दे की करते हैं। मीडिया के दो पहलू हैं। एक सच और दूसरा आधा-अधूरा सच। पहले आते हैं सच पर। जो खबरें मीडिया में आती हैं क्या इतनी आसानी से खबरें मिल जाती हैं। नहीं, हर खबर के पीछे कई लोगों की मेहनत, बल्कि एक पूरी टीम काम करती है। तब जाकर पाठकों, दशर्कों और श्रोताओं तक घटना खबर की शक्ल में पहुंच पाती हैं। जिसे देख सुनकर एक-दो दिन याद रखते हैं फिर भूल जाते हैं। प्रिंट मीडिया की स्थिति दिनोंदिन बदतर होती जा रही है। आज अखबार में खबरों से ज्यादा विज्ञापन प्रकाशित होते हैं। यह सच है कि विज्ञापन के जरिये पैसे उगाही का काम किया जाता है। लेकिन यह पैसा एक अखबार को चलाने के लिये पूरा नहीं पड़ता। समाचार पत्र निकालने वालों के बीच एक बात प्रचलित है कि अखबार यों ही नहीं निकलता। इसे निकालने के लिये इतनी धन की जरूरत पड़ती है कि एक दिन की पूरी प्रति भी नहीं बिके तो अगले दिन बिना नुकसान के अखबार का प्रकाशन सुनिश्चित हो सके। इलेक्ट्रोनिक हो या प्रिंट मीडिया। इन सभी को राजनीतिक पार्टियों का भी सहारा मिलता है, बल्कि कई राजनीतिक पार्टियां पर्दे के पीछे से इसे निकालती भी हैं। इसके कारण वे अपना राजनीतिक फायदा उठाने से नहीं चूकते। ऐसे में खबरों का सच कितना लोगों तक पहुंचता है, यह हकीकत मीडिया को मालूम है। क्योंकि खबरों का सच, सिर्फ इतना नहीं होता है, बल्कि उसके कई गुणा मीडिया के पास होता है। मीडिया तमाम खबरों को लोगों तक नहीं पहुंचाता। कोई भी खबर मीडिया पूरी तरह नहीं दिखाती, क्योंकि हर खबर के पीछे कड़वी सच्चाई होती है या फिर खबर को रोक दिया जाता है। खबर का प्रकाशन होने से कई सफेदफोशो के चेहरे से नकाब उठाने का डर होता है।

मीडिया का इस्तेमाल लोगों ने भी खूब किया है। पेड और ननपेड खबरों का प्रचलन ने खूब टीआरटी बटोरी। अच्छी खबरों के साथ समझौता कर बेवजह की खबर चलायी जाती रही है, सिर्फ खानापूर्ति करने के लिये। आज मीडिया में भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरों के आने से हंगामा मचा हुआ है। जैसे 2जी स्पेक्ट्रम, जमाखोरी, कालाबाजारी सहित कई घोटाले हैं। विकीलीक्‍स का खुलासा जाने ऐसी कई खबरें मीडिया में सनसनीखेज खुलासे की तरह आ रही हैं। हर बार नये घोटाले के सामने आने से कहीं न कहीं से मीडिया भी लपेटे में है। क्योंकि देश में जिस तरह से भ्रष्टाचार फैल रहा है। भला इससे मीडिया कैसे अछूता रह सकेगा?

मीडिया जो अपने आप में विशाल महासागर की तरह है। जिसे अपना लक्ष्य मालूम है, वह भ्रष्टाचार के दलदल में क्यों लिप्त है। क्या है इसकी मजबूरी, क्यों इसके हाथ-पांव बंधे हुये हैं? खबरें जो आप देखते हैं उसकी पीछे की कड़वी सच्चाई क्यों नहीं दिखाई जाती है? सत्तारूढ़ सरकार जनता के सामने अपने कार्यों का विवरण देती है। मीडिया उस सरकार के नकारात्मता को सामने लाने से परहेज करता है। वही उस सरकार के हटने के बाद जब दूसरी सरकार जब बनती है तो पहले की सरकार का नकारात्मता पहलू मीडिया के सामने आ जाता है। जाहिर है पहले मीडिया के उपर दबाव हो? बात साफ है, मीडिया में भी कई ऐसे भ्रष्ट लोग उंचे पदों पर आ चुके हैं, जिससे न केवल खबरों का अर्थ ही बदला जा रहा है बल्कि महिलाओं और मीडिया को मिशन की तहत लेने वाले लोगों के समक्ष परेशानी खड़ी हो रही है। बदलते परिवेश में इसे भी बदलना शुरू कर दिया है। अब मीडिया उंचे पदों पर बैठे अधिकारियों, राजनेताओं, उद्योगपतियों के हाथ की कठपुतली बनती जा रही है। सवाल वहीं है क्या पत्रकारिता आंरभ करने का यही उदेश्य था?

लेखिका कीर्ति सिंह पटना में मीडियामोरचा की सहायक संपादक हैं.


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Comments (3)Add Comment
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written by raju, December 29, 2010
तीन पैरा के बाद मुद्दे की बात शुरू करती हैं। अगले दो पैरा में दिमाग चाटती हैं। अंतिम पैरे में चार प्रश्‍न चिन्‍ह के साथ प्रश्‍न छोड़ जाती हैं। मैडम मोरचा ही संभालिए तो अच्‍छा।
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written by rajkumar sahu, janjgir, chhattisgarh, December 29, 2010
abhi to media mein brhasht logon ke aane ki shuruaat hai. aane vaale dinoon mein halaat aur bigdange.
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written by p pandey, December 29, 2010
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