भारतीय राजनीति का घिनौना चेहरा

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एनके सिंह भारतीय राजनीति भ्रष्‍ट है. असंवेदनशील है. जनकल्‍याण से दूर होती जा रही है. अपनी सार्थकता खोती जा रही है. ये सारे आरोप दरकिनार. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के नए रहस्‍योद्घाटन ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि अब यह घिनौनी होती जा रही है.

कांग्रेस यानी देश की सबसे बड़ी पार्टी (11.90 करोड़ मतदाता) के महासचिव का कहना है, 'अपनी मृत्‍यु से दो घंटे पूर्व मुंबई एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे ने उन्‍हें फोन किया था और अपने व अपने परिवार को मिल रही धमकियों के बारे में चिंता व्‍यक्‍त की थी.' अनौपचारिक रूप से कुछ प्रिंट पत्रकारों से यह भी कहा सिंह ने, कि जब करकरे की मुंबई हमले के दौरान मौत हुई तो सिंह रात भर सो नहीं सके. परोक्ष रूप से दिग्विजय सिंह के कहने का तात्‍पर्य यह था, 'हिंदू आतंकवादियों ने धमकी को फलीभूत किया. करकरे मालेगांव आतंकी घटना, जिसमें हिंदू आतंकवादियों का नाम आया है, की जांच कर रहे थे.

भारत का प्रजातंत्र द्वंद्वांत्‍मक प्रजातंत्र (एडवसेरियल डेमोक्रेसी) के सिद्धांत पर आधारित है जिसमें सत्‍ता पक्ष, विपक्ष एक द्वंद्वांत्‍मक भाव में रहते हैं. अंतर्दलीय द्वंद्व चलता रहता है और इस प्रक्रिया से जनमानस को अपनी ओर खींच कर वोट हासिल किया जाता है.

परंतु समूचे विश्‍व में इस तरह के प्रजातांत्रिक देशों में एक अलिखित किंतु दृढ़ परंपरा रही है कि इस संघर्ष को इतना नीचे नहीं ले जाना चाहिए‍ कि राष्‍ट्र सम्‍मान, विश्‍व में हमारी साख या अन्‍य देशों से संबंध पर उसका प्रतिकूल असर पड़े. यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि जनता का विश्‍वास संविधान, संस्‍थाओं व संप्रभुता में खत्‍म न हो.

दिग्विजय सिंह के बयान ने इस सभी मूल्‍यों को एक झटके में तोड़ दिया. पाकिस्‍तान को एक बार फिर से मुंबई हमले में अपना हाथ न होने के भाव आने का पुख्‍ता अवसर दिया. विश्‍व समुदाय को उंगली उठाने का अवसर दिया और देश में वैमनस्‍य को फिर पनपने का एवं मुसलमानों के मन में (अनजाने में ही) एक शक पैदा कर दिया कि यह सरकार जो कांग्रेस की अगुवाई में चल रही है, मुसलमानों को आतंकी बताने का कुचक्र कर रही है. उनको यह शक भी होने लगा है कि कांग्रेस की सरकार जो महाराष्‍ट्र में भी है और केन्‍द्र में भी, क्‍यों नहीं हिंदू आतंकवादियों पर हाथ डाल रही है जबकि उसके सबसे मुखर महासचिव के पास इतना बड़ा तथ्‍य है.

यह मानने का कोई कारण नहीं है कि कांग्रेस हाईकमान के इशारे पर दिग्विजय सिंह ऐसा कह रहे हैं क्‍योंकि दरअसल यह बयान कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा है. मुसलमानों का शक अभी भी पूरी तरह से दूर नहीं हुआ है. बाबरी फैसले पर कांग्रेस की चुप्‍पी इस शक को और मजबूत ही करती है. दो साल बाद इस तरह के बयान जब व्‍यक्तिगत रूप से छींटने की कोशिश होती है तो गैर-कांग्रेसी सेकुलर पार्टियों तथा भारतीय जनता पार्टी को पलटवार करने का मौका मिलता है और वे कहती हैं, 'जब इतना बड़ा तथ्‍य इतने बड़े नेता के पास था, तो जांच की दिशा और शक की सुई कसाब, मुलसमान और पाकिस्‍तान पर क्‍यों टिकाए रखी गई?

कांग्रेस महासचिव को शायद यह मालूम होगा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 39 के अनुसार हर नागरिक का यह कर्तव्‍य है कि संगीन अपराध के मामले में अगर कोई जानकारी अपराध होने के अंदेशे के बारे में या होने के बाद तथ्‍यों को लेकर उनके पास है, तो उसे तत्‍काल पुलिस अधिकारी को बताना होगा. न बताना या छिपाना अपराध है. दिग्विजय सिंह जितनी शिद्दत से केन्‍द्रीय गृह मंत्री चिदंबरम की निंदा करने में लगे रहे हैं, अगर उसके दसवें अंश में भी अपनी कानूनी जिम्‍मेदारी का निर्वहन करते तो कम से कम करकरे की हत्‍या के आरोप से जेल में सड़ रहा 'बेचारा' पाकिस्‍तानी नागरिक कसाब बच सकता था. पाकिस्‍तान को और पूरे विश्‍व को हम तन कर बता सकते थे - देखो, करकरे को मारने पाकिस्‍तान से कोई आतंकवादी नहीं आया था और आतंकवादी हमारे देश का ही हिंदू था. हमने पकड़ लिया. सिंह को यह भी मालूम होगा कि संविधान के अनुच्‍छेद 19(2) में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के अधिकार पर आठ प्रतिबंध हैं और उनमें से एक है - ऐसी कोई अभिव्‍यक्ति जो किसी मित्र देश से वैमनस्‍यता पैदा कराती हो. दिग्विजय की अभिव्‍यक्ति भारत और पाकिस्‍तान के बीच वैमनस्‍य पैदा करेगी, इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए.

एक शक लगातार रहता है कि क्‍या कांग्रेस हाईकमान जानबूझ कर दिग्विजय को यह ढील दे रहा है कि हर तिमाही-छमाही इस तरह के वक्‍तव्‍य देते रहें. बाटला हाउस के आरोपितों के घर आजमगढ़ जाना, राहुल गांधी को शिबली कालेज (आजमगढ़) ले जाना, मुंबई घटना के तत्‍काल बाद महाराष्‍ट्र कांग्रेस के नेता अब्‍दुल रहमान अंतुले से बयान दिलवाना कि मुंबई हमले के पीछे हिंदू आतंकवादी संगठन हो सकते हैं, दिग्विजय सिंह को दो साल से नक्‍सली कार्रवाई में लगे गृहमंत्री चिदंबरम के खिलाफ बयानबाजी करने के बावजूद पार्टी में शीर्ष स्‍थान पर रखना- यह सब संभव है कि कांग्रेस की सोची समझी राजनीति हो. लेकिन शायद 10 जनपथ के रणनीतिकारों को यह न मालूम हो कि ऐसी सांप्रदायिक राजनीति दुधारी तलवार है. भारतीय जनता पार्टी इसी का शिकार बनी है. अगर मंदिर वोट दिलवा सकता है तो मस्जिद वोट छीन भी सकता है.

जिस आधार पर बहुसंख्‍यकों के एक बड़े वर्ग ने भारतीय जनता पार्टी को 1999 के बाद से लगातार रिजेक्‍ट किया, उसी आधार पर कांग्रेस का अत्‍यधिक  और अतार्किक अल्‍पसंख्‍यक हिमायत जनता को इस पार्टी से दूर भी ले जा सकता है. अगर कांग्रेस को 12 करोड़ वोट (28 फीसदी) और भारतीय जनता पार्टी को आठ करोड़ से भी कम वोट (18 फीसदी) 2009 के चुनाव में मिले हैं, तो इसका दूसरा कारण है.

देश की जनता सोनिया के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस में एक सधी, तार्किक, सही रूप से धर्मनिरपेक्ष पार्टी देखना चाहती है. यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के अधिकांश हिंदू व मुसलमान उदारवादी हैं. उत्‍तर प्रदेश की सफलता पार्टी के लिए नीति-निर्धारक नहीं होनी चाहिए.

लेखक एनके सिंह ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव तथा साधना न्‍यूज के कनसल्टिंग एडिटर हैं. उनका यह लिखा लेख दैनिक भास्कर के नेशनल एडिशन में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित कराया गया है.


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