रमन सिंह ने कसी मीडिया की नकेल

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बिनायकछत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने मीडिया की नकेल कस दी है और निरंकुशता के मामले में वे अब अजित जोगी से आगे जा रहे हैं। यह बात हाल ही में बिनायक सेन की कवरेज को लेकर मीडिया की भूमिका से सामने आई है। रमन सिंह सरकार भी खबर से डरने लगी है और जब सरकार खबर से डरने लग जाए तो उसकी साख भी ख़त्म होने लगती है। सार्वजनिक रूप से रमन सिंह बहुत ही सौम्य, शालीन और विनम्र माने जाते हैं, पर जिस अंदाज में उनकी सरकार काम कर रही है उससे उनकी यह छवि खंडित होती नजर आती है।

बिनायक सेन को लेकर मीडिया पर जिस तरह का अघोषित दबाव रमन सिंह सरकार ने बनाया है, उसका खामियाजा भाजपा को भुगतना तय है। कुछ उदहारण सामने आए हैं जिनकी जानकारी छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकारों ने दी, इनमें वे भी हैं जो विनायक सेन को खलनायक मानते है पर अभिव्यक्ति की आजादी के पक्षधर हैं। वे भी हैं जो सरकार के हिसाब से अपनी विचारधारा बदल लेते हैं क्योकि अखबार जिस मालिक का है सरकार बदलते ही उसकी विचारधारा भी बदल जाती है। अब मुद्दे पर आ जाएं, देश के वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर ने बिनायक सेन को सजा सुनाए जाने के बाद एक लेख देश के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार में लिखा और वह उनके वेब संस्करण में अभी भी लगा है, पर रायपुर से निकलने वाले संस्करण से यह लेख गायब है।

रायपुर के एक पत्रकार के मुताबिक सरकार को ऐसे लेख से किसी तरह का दुःख न पहुंचे इस वजह से वह लेख हटा दिया गया। पर इसी अखबार में वेद प्रताप वैदिक का छाती पिटता लेख छापा गया है, जो वामपंथियों को पानी पी पी कर गरियाते है। वैदिक न्यायालय जैसी पवित्र गाय की रक्षा में जुटे हैं। पर कोई उनसे पूछे कि जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को ठेंगा दिखाते हुए 1975 में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई तो उनके मुंह से कोई आह क्यों नहीं निकली। वह भी न्यायलय ही है जिसके भ्रष्ट जजों पर पीएफ घोटाले का आरोप है और जिस पर सुप्रीम कोर्ट तीखी टिपण्णी कर चुका है। रिटायर होने के बाद अखबार के ज्ञान वाले पन्ने पर ज्ञान बाँटना ठीक है, पर जब मौका सड़क पर निकल कर विरोध करने का था तो आप भी नहीं निकले।

दूसरा उदहारण 'सबकी खबर दे -सबकी खबर ले' का नारा देने वाले अपने अखबार जनसत्ता के रायपुर संस्करण का है, जिसे करीब आठ साल पहले मैंने ही शुरू किया था। यह फ्रेंचायजी संस्करण है और मेरे हटने के बाद इंडियन एक्सप्रेस समूह का कोई भी पत्रकार अब वहां नही है। उत्तर प्रदेश में बिनायक सेन को लेकर आन्दोलन चल रहा है तो उसकी कवरेज मैंने की और दो दिन लगातार ख़बरें सभी जगह छपी, पर जिस छतीसगढ़ संस्करण में छपनी चाहिए थी वहां के फ्रेंचायजी के कर्मचारी/संपादक ने खबर हटवा दी। जबकि प्रबंधन के साथ हुए अनुबंध के मुताबिक किसी भी पेज में छेड़छाड़ की इजाजत नहीं है और वहां के लिए चार-पांच पेज जनसंपर्क पत्रकारिता के पहले से छोड़े गए हैं। मेरे रहते जो अखबार कभी सत्ता के खिलाफ आग उगलता था और उसके चलते हम लोगों पर रायपुर में हमला हुआ, वह अखबार अब डीजीपी को छींक आने की खबर भी पहले पन्ने पर छाप सकता है। इसके आगे कोई टिपण्णी करना मेरे लिए उचित नही है।
दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के एक अखबार ने जो छापा है वह जस का तस यहाँ दिया जा रहा है, देखें-

झारखंड में डॉ. सेन के खिलाफ राइफल लूट की फाइल खुली

रायपुर 29 दिसंबर (टेलीग्राफ)। छत्तीसगढ़ की निचली अदालत द्वारा नक्सलियों के साथ मिलकर देश के खिलाफ काम करने के दोषी पाए गए सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन के खिलाफ झारखंड पुलिस ने भी पुरानी फाइल खोल ली है। बिनायक पर झारखंड के गिरीडीह इलाके में अपने 27 साथियों के साथ मिलकर 11 नवंबर 2005 में राइफलें लूटने का आरोप भी है।

सेन के खिलाफ मामलों की जांच कर रही रायपुर की पुलिस ने गिरीडीह का दौरा कर हथियारों की लूट की जांच की थी। गिरीडीह के इंस्पेक्‍टर परमेश्वर शुक्ला को इस केस में गवाह के रूप में पेश किया गया था। गिरीडीह पुलिस के सूत्रों ने बताया कि रायपुर में बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने रिमांड के लिए आवेदन किया था, लेकिन बाद में किसी ने इस केस पर ध्यान ही नहीं दिया। हथियारों की लूट के मामले में सेन आरोपियों की पहली सूची में शामिल नहीं थे। जांच में उनका नाम सामने आने के बाद आरोपियों में उनका नाम भी जोड़ लिया गया। छत्तीसगढ़ की अदालत में फैसले की जानकारी मिलते ही पुलिस ने पांच साल पुराने इस मामले की फाइल को दोबारा खोल लिया है।

गिरीडीह के एसपी अमोल होमकर ने केस से जुड़ी फाइल को बुलवा लिया है, ताकि इस प्रक्रिया को तेजी से पूरा किया जा सके। हथियार बंद नक्सलियों ने पांच साल पहले गिरीडीह से लगे मोहनपुर इलाके में स्थित होमगार्ड ट्रेनिंग सेंटर में हमला कर नगदी, 300 राइफलें, दो हजार गोलियां लूट ली थीं। आधे घंटे के अंदर नक्सली वारदात को अंजाम देकर भाग खड़े हुए। हमले में सात जवानों की मौत हो गई थी और दर्जनभर लोग घायल हो गए थे। मारे गए ज्यादातर लोग होमगार्ड की ट्रेनिंग ले रहे लोग या कैडेट थे। इस वारदात के तीन दिन बाद ही 13 नवंबर को नक्सलियों ने जहानाबाद जेल पर हमला कर 130 नक्सलियों को छुड़ा लिया था। सात घंटे तक पूरी जेल नक्सलियों के कब्जे में थी। सान्याल को इंटेलिजेंस ब्रांच ने 25 दिसंबर 2005 में गिरफ्तार कर लिया था। गिरीडीह के एसपी ने बताया कि वह राइफल लूट मामले में जांच अधिकारी को रायपुर भेजेंगे, ताकि इस मामले की जांच जल्द से जल्द पूरी हो सके। एसपी ने बताया कि होमगार्ड के ट्रेनिंग सेंटर पर हमला करने वाले 27 में से 10 लोगों ने समर्पण कर दिया था। ये सभी इस समय जेल में हैं।

मामला यहीं तक सीमित नही है, पिछले एक महीने में दो बड़े अख़बारों को उनकी हैसियत का बोध रमन सरकार का जनसंपर्क विभाग दिला चुका है और फिर वे ठीक रास्ते पर हैं। एक पत्रकार ने कहा - भैय्या, कौन सरकार से पंगा ले आप तो सब जानते हैं एक इशारे पर छुट्टी हो जाएगी। इसलिए हम सब भी राजा का बाजा बने हुए हैं। इसमें वहां के पत्रकारों को कोई दोष देना उचित नहीं होगा जिनकी नौकरी पर हमेशा तलवार लटकती रहती है। अख़बारों से प्लांट यूनियन कभी की गायब हो चुकी है और वेज बोर्ड वाले इक्का दुक्का पत्रकार होंगे। अजित जोगी के समय तो मीडिया की नकेल कसने की कोशिशों के खिलाफ लोग सड़क पर भी उतर चुके हैं पर वह सब अब गुजरे ज़माने की बात है।

हाँ एक जानकारी और, उत्तर प्रदेश में भाजपा मानवाधिकार हनन का सवाल लगातार उठा रही है क्योकि कई भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की ठुकाई करने के बाद उन्हें फर्जी मामलों में जेल भेजा जा चुका है। पर यहाँ अभी छत्तीसगढ़ जैसा कोई कर्रा कानून नही बना है इसलिए भाजपा के लोग निश्चिन्त भी हैं।

लेखक अंबरीश कुमार प्रसिद्ध हिंदी दैनिक जनसत्ता के उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ हैं. उनका यह लेख विरोध ब्‍लाग से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.


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