देश के शासकों की दोहरी नीतियां

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विजय वर्धन पिछले दिनों चीनी लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता लिउ जियाओबो के पक्ष में जिस प्रकार भारत खड़ा दिखा। उसे देखकर लगा कि विश्व पटल पर भारत के हुक्मरान खुद को मानवाधिकारों के प्रति संजिदा दिखाने के कोशिश कर रहे हैं। हांलाकि ये मामला चीन से जुड़ा होने के कारण कूटनीतिक ज्यादा था। लेकिन इसकी आड़ में भारत ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। जियाओबो के बहाने भारत ने चीनी राजनैतिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने के साथ ही खुद की लोकतांन्त्रिक व्यवस्था को चीन से कहीं बेहतर दिखलाने में कोई कोर-कसर नही छोड़ी। यही नही नोबेल पुरस्कार समारोह में शिरकत न करने की चीन की अपील को भी भारत ने दर-किनार कर डाला।

कुल मिलाकर ये सभी कदम भले ही कूटनीतिक हो, लेकिन भारत सरकार के इन फैसलों से देश और दुनिया में कई लोगों को ये विश्वास होने लगा था कि हिन्दुस्तान मानवाधिकारों के साथ ही लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति काफी संजीदा है। लेकिन भारतीय शासक वर्ग का ये उदार चेहरा इतनी जल्दी बेनकाब हो जायेगा शायद ही किसी ने सोचा हो। डा. बिनायक सेन को उम्र कैद की सजा सुनाये जाने से कथित भारतीय उदार व्यवस्था लगता है ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है। इस फैसले से सबसे अधिक नुकसान भारत की लोकतान्त्रिक छवि को हुआ है। सेन को मिली सजा का जिस प्रकार देश- दुनिया में चौतरफा विरोध हो रहा है उसे देखकर यहीं लग रहा है कि भारत भी वहीं आ खड़ा हुआ है, जहां वो चीन को खड़ा करता आ रहा है।

जियाओबो और सेन के मामलों में कई समानताएं है, तो दोनों में कई अन्तर भी हैं। जियाओबो ने वर्तमान चीनी व्यवस्था के खिलाफ बिगुल छेड़ा है। वो चाहते है कि चीन में लोकतान्त्रिक व्यवस्था कायम हो। ताकि हर आदमी को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता हो। इसी के चलते पिछले 11 सालों से वो देशद्रोह के आरोप में सलाखों के पीछे हैं। उनकी इस लड़ाई में भारत, ब्रिटेन, अमेरिका से लेकर दलाई लामा तक उनके साथ खड़े है। वहीं विनायक सेन ने अपनी अभी तक की जिन्दगी गरीब तबके की बेहतरी के लिए समर्पित की है। वो न तो राजनैतिक कार्यकर्ता हैं और ना ही उनका मकसद इस व्यवस्था को उखाड़ फेकना है।

हां सम्भव है कि भारत के कई नागरिकों की तरह उनकी भी सहानुभूति नक्सलवादियों को ओर हो, लेकिन ना तो वो नक्सलवादी हैं और ना ही उन्होंने हिंसात्मक रास्ता अपनाया है। रमन सिंह सरकार ने भी उन पर इतना मात्र आरोप मात्र लगाया है कि उन्होनें जेल में बंद नक्सलियों की मदद की थी, जबकि अभी तक ये साफ नही हो पाया है कि ये मदद किस स्तर पर की गई थी। बावजूद इसके इस व्यवस्था ने उन्हें भी वही सजा दी जो जियाओबो को मिली है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये पैदा हो रहा है कि जिस व्यवस्था को लाने के लिए जियाओबो लड़ रहे हैं, वो वर्तमान भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था से भी ज्यादा फासिस्ट है तो आखिर उसकी जरूरत ही क्या है।

इस फैसले से भारत की दोहरी नीतियां भी जगजाहिर हो रही हैं। एक ओर भारत सरकार जियाओबो के पक्ष में खड़ी नजर आती है, वहीं दूसरी ओर अपने ही मुल्क के मानवाधिकार कार्यकर्ता के दमन का कोई मौका नहीं छोड़ती है। बिनायक सेन का मामला इन सभी मामलों के काफी हद तक अलग है। सेन देश के उन चुनिंदा लोगों में एक हैं, जिन्होंने अपने सुनहरे करियर के आगे कमजोर और असहायों की मदद को प्राथमिकता दी है और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की जिन्दगी बचाने में खुद को न्यौछावर कर डाला। जरा सोचिये? आज के दौर में जब पूरी दुनिया अर्थ के पीछे पागलों की तरह भाग रही हो। वैसे में कोई व्यक्ति अगर गरीबों की जिन्दगी बचाने के लिए खुद को समर्पित कर रहा हो तो उसका दर्जा क्या होना चाहिए।

मानवाधिकारों के हनन के लिए बदनाम हो चुकी रमन सिंह सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में भी लोगों को मूलभूत जरूरी सुविधाएं तो नहीं दे पा रही है। मगर जो लोग इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं उन्हीं से उसे सबसे अधिक खतरा नजर आ रहा है। जिससे निपटने के लिए कोई किसी भी हद तक जाने को तैयार है। सेन को मिली उम्र कैद की सजा ने भारतीय लोकतंत्र के खोखलेपन को भी जगजाहिर कर डाला। आज जब पूरा मुल्क भ्रष्‍टाचार के दल-दल में समा चुका है। केन्द्र से लेकर कई राज्यों की सरकारें भ्रष्‍टाचार के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर रही हैं, ऐसे में देश के हुक्मरानों को सेन का देशद्रोह तो नजर आ रहा है, लेकिन राजा से लेकर कलमाड़ी और कर्नाटक के सीएम के भष्ट्राचार उनके लिए ज्यादा मायने नही रखते हैं।

इन हुक्मरानों से कोई ये पूछे की गरीबों का मसीहा जब इस मुल्क में देशद्रोही हो सकता है तो देश को बेचने वाले इन राजनेताओं को क्या कहेगें? हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि देश को विदेशी ताकतों के आगे गिरवी रखने वाले, मुल्क की गाढ़ी कमाई को लूटने वाले देश के रहनुमा बने फिरे रहे है। और सेन जैसे समर्पित लोग जेलों की सलाखों के पीछे हैं। असल में, कौन बहार रहेगा, कौन सलाखों के पीछे, ये व्यवस्था तय करती है। जिस व्यवस्था की स्थापना आम आदमी की बेहतरी के लिए होगी वहां सेन जैसे लोगों को सर आखों में बिठाया जायेगा। लेकिन जो व्यवस्था खुद लूट और दलाली पर टिकी है, उस व्यवस्था के लिए सेन किसी खलनायक से कम नहीं होंगे।

जाहिर सी बात है कि कोई भी सिस्टम खुद के लिए खलनायक साबित हो रहे लोगों को जेल की सलाखों के पीछे ही डालेगा। ऐसे में अच्छे सिस्टम के लिए बुरे लोग और बुरे के लिए अच्छे लोग हमेसा ही खलनायक रहेंगे। असल में लूट पर आधारित हमारी व्यवस्था के सर्वेसर्वा सेन जैसे लोगों से आतंकित रहते हैं। उन्हें ये भय हर वक्त सताता है कि न जाने कब बिनायक सेन जैसे सामाजिक कार्यकर्ता मुल्क की जनता की आंखें खोल दें। इस भय को दूर करने का उनके पास एक ही चारा है, ऐसे लोगों को देशद्रोही करार दे कर जेल की सलाखों के पीछे डालना।

जेल, पुलिस और गोलियों के बलबूते तथाकथित लोकतंत्र को जिंदा रखने पर भारतीय शासक आमादा हैं। उसमें ना तो बुद्धिजीवियों के विचार को सहने की ताकत बची है और ना ही इतनी संवेदनशीलता कि लोकतान्त्रिक तरीके से चल रहे आंदोलनों पर विचार कर सके। अरूंधति राय पर कानूनी शिकंजा कसने को लेकर जिस प्रकार का उतावलापन बार-बार देखने को मिलता है। उससे जाहिर है कि शासक वर्ग खुद के खिलाफ एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं है। भले ही वो सौ फीसदी सत्य ही क्यों न हो। अगर राय ने भी हमारे हुक्मरानों के सुर-सुर में मिला लिया होता तो आज वो देश की स्टार बनी होतीं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यही बात हुक्मरानों को बार-बार चुभ रही है। जिसका बदला लेने के लिए वो हर वक्त आतुर नजर आते हैं। सिस्टम की बुराईयों को सामने लाने वालों के खिलाफ जिस संजीदगी से सरकारें लड़ती नजर आईं हैं। काश वो ही संजीगदी कभी लोकतान्त्रिक आंदोलनों के प्रति भी दिखी होती। नार्थ ईस्ट की इरोम शर्मिला इसका उदाहरण हैं, एक दशक से भी ज्यादा समय से वो शांतिपूर्वक तरीके से सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) कानून को हटाने की मांग को लेकर अनशन पर हैं, लेकिन प्रदेश और देश की सरकारों ने कभी भी उनकी मांग पर विचार करना तो दूर, उनका हाल जानना भी जरूरी नहीं समझा है।

ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के खोखलेपन को जग-जाहिर कर रहे हैं और लगातार बढ़ रही सत्ता की क्रूरता को दर्शा रहे हैं। इसी क्रूरता ने बिनायक सेन को सलाखों के पीछे डाला है। नयी आर्थिक नीतियों को आंख बंद करके सरकारें लागू करती जा रही हैं। विदेशी आकाओं और कारपोरेट सेक्टर के हितों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही इन नीतियों ने मुल्क में अमीर और गरीब के बीच एक बड़ी खाई पैदा कर दी है। जिस कारण असंतोष भी पनपने लगा है। जो अलग-अलग रूपों में सामने भी आ रहा है, लेकिन सरकारें असंतोष की वजहों को दूर करने के बजाय फासिस्ट तरीके से आंदोलनकारी ताकतों के साथ उन सभी को आतंकित करना चाह रही हैं जो आम आदमी की बात करते हैं। ताकि में सत्ता और पूंजीपतियों का नापाक गठजोड़ देश को बेखौफ हो कर लूट सके और कोई विरोध करने वाला भी न बच सके। राष्ट्रीय परिदृश्य, शासक वर्ग की आर्थिक नीतियां स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि आने वाले दिनों में ये दमन चक्र और तेज होने वाला है।

लेखक विजय वर्धन उप्रेती टीवी पत्रकार और हिमालयन जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष हैं.


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Comments (7)Add Comment
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written by rahul singh shekhawat, January 04, 2011
brother everything is ok but chaina is very tipical character. it is not loyal to any one
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written by nayan, January 04, 2011
विषय तो आपका सही पर है। पर लगता है, आप भारत के शासक वर्ग के पीछे हाथ धोकर पड़े है।
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written by kamal dev, January 03, 2011
good artical.
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written by priya singh, January 03, 2011
बहुत सही लिखा है। बिनायक सेन जैसों के पक्ष में लिखने वाली वास्तव में कलम के सिपाही है।
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written by ramesh singh, January 02, 2011
अगर हालात यही रहे तो ,तय है,कि इस मुल्क का भला कभी नही हो सकता है। सही मायनों में तो देश के गद्दार बड़े-बड़े नेता , नौकरशाह और पूंजीपती ही है। आपने सही कहा, अच्छी व्यवस्था के लिए बुरे लोग गंदें है, बुरी व्यवस्था के लिए बिनायक सेन जैसे लोग खलनायक है।
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written by sweta tiwari, January 02, 2011
विजय, बहुत बेहतरीन लेख लिखा है। इस लेख में भी तुम्हारे तेवर नजर आ रहे है। वाकई में बहुत गुड आर्टिकल
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written by ashok kumar, January 02, 2011
बहुत सही लिखा है आपने, जिस देश की हर साख पर उल्लु बैठा हो, वहां और हो भी क्या सकता है। इस मुल्क में देश को बेचने वाले खुलेआम धूम रहे है। लेकिन बिनायक सेन जैसे समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता सलाखों के पीछे है।

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