ऊंचाइयां छूने के बाद भी वह भोला था, बहुतों से उसे धोखा मिला

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: ‘सर,  याद होगा आपको जब हम बरेली कॉलेज में पढ़ते थे, तो आप अकसर हमारी क्लास में कहा करते थे कि मुझे इनमें से एक भी लड़के की आंख में चिनगारी नहीं दिखती, सपने नहीं दिखते, तभी मैंने सोच लिया था कि कुछ करके दिखाऊंगा, आज एक बड़े काम की शुरुआत के गवाह आप भी हैं’ : एक अजब-सी बेचैनी, अजब-सी आशंकाएं मन को घेरे हुए थीं, कई दिनों से। तो क्या वह ऐसी ही मर्मांतक, अनहोनी का संकेत थीं, सोचने को विवश हूं। अतुल नहीं रहा, उसका पार्थिव शरीर भी पंचतत्व में विलीन हो गया। किसी बुरे सपने जैसा इतना डरावना सच। इसका सामना करने का साहस अपने भीतर तलाश रहा हूं।

इसलिए नहीं कि मैंने होनहार शिष्य खोया। करीबी दोस्त खोया। या कि वह शख्स जुदा हुआ, जिसने ताउम्र आदर के सिवा कुछ न दिया। बल्कि इसलिए कि जो गया वह एक बेहतरीन इनसान था। वैसा कोई मुश्किलों से पैदा होता है। और इसलिए भी कि वह बहुतों का सहारा था। किसी का नाविक, तो बहुतों के लिए मार्गदर्शक, किसी लाइट हाउस की तरह। हजारों का जीवन उसकी दिखाई रोशनी में सही राह पकड़ सके। फिर भी कोई अहंकार नहीं। उसका जाना किसी बड़े सपने के दम तोड़ने की तरह है। ऐसा इसलिए कह सकता हूं कि लोग सपने देखते हैं, अतुल उन्हें साकार करना जानता था।

मेरठ में एक रात पता चला कि कैसे सपने बरसों-बरस पलते हैं और फिर साकार होते हैं। मेरठ में अमर उजाला की शुरुआत हुई थी। हम सभी पंडित प्यारेलाल शर्मा रोड पर एक गेस्ट हाउस के बड़े से कमरे में रहते थे। जमीन पर बिछा बिस्तर। वहीं एक रात अतुल ने कहा था, ‘सर, याद होगा आपको जब हम बरेली कॉलेज में पढ़ते थे, तो आप अकसर हमारी क्लास में कहा करते थे कि मुझे इनमें से एक भी लड़के की आंख में चिनगारी नहीं दिखती। सपने नहीं दिखते। तभी मैंने सोच लिया था कि कुछ करके दिखाऊंगा। आज एक बड़े काम की शुरुआत के गवाह आप भी हैं।’

फिर तो पत्रकारिता के तमाम नए प्रतिमान गढ़े गए। वह जोश ही नहीं, जुनून भी था। लेकिन होश हमेशा चौकस रखा उसने। मेरठ के दंगे, हाशिमपुरा कांड, टिकैत के आंदोलन और बाद में राम मंदिर आंदोलन। हर मौके पर मूल्यों की जिस पत्रकारिता का निर्वाह अमर उजाला में हुआ, वह दुर्लभ है। यह सबकुछ अतुल की सोच की बदौलत था। उसकी उस जिम्मेदारी की वजह से था, जो एक पत्रकार के नाते वह देश-समाज के प्रति महसूस किया करता था।

व्यावसायिक ऊंचाइयां छूने के बाद भी वह भीतर से बेहद भोला था। बहुतों से उसे धोखा मिला, लेकिन वह विश्वास करता था, तो टूटकर करता था। उसकी विलक्षण कार्य क्षमताओं से मैं भी चमत्कृत रह जाता था। अखबार से जुड़ी कौन-सी चीज बेहतर है, दुनिया में कहां क्या घटित हो रहा है, उसे सब पता रहता था। निश्चित ही ऐसे बहुत कम लोग होते हैं, जिनमें इतनी खूबियां एक साथ देखने को मिले।

सरलता इतनी कि निजी से निजी मुद्दे पर भी हम बात कर लेते थे। यह सब उतनी ही सहजता से होता था, जब बरेली में अमर उजाला के काम के दिनों में एक ही ‘जावा’ में उसके साथ तीन लोगों का बैठकर प्रेमनगर से प्रेस तक आना या फिर रास्ते में रुककर कहीं भी कुल्फी खा लेना। मैं उससे उम्र में थोड़ा-सा बड़ा था। ग्रेजुएशन के दिनों में उसका टीचर भी था, तो डांट भी लेता था। कभी मेरी कोई बात नहीं मानी, बाद में महीनों बाद भी उसे गलती का पता चलता, तो बेलौस माफी मांग लेता। यह बिलकुल प्लेन कंफेशन की तरह था। कई बार मैं नाराज हुआ। अखबार से अलग हुआ। लेकिन कितने दिन, उसकी माननी ही पड़ती थी। शायद हम अलग-अलग होने के लिए बने ही नहीं थे। मुझे तो यहां तक लगता है कि हम एक ही चीज के दो अंश थे। अब तो एक हिस्सा ही नहीं रहा...।

अपनापन मोह पैदा करता है यह तो जानता था, लेकिन वहमी भी बना देता है, अब समझ में आया। वह अस्पताल में है, जानता था। नोएडा ऑफिस जाकर भी लौट आता, उससे मिलने फोर्टिस अस्पताल न गया। यह वही अस्पताल है, जिसमें कुछ समय पहले मेरे एक अन्य अजीज मित्र की मौत हुई थी, जब मैं उन्हें देखकर लौट आया था। इसे वहम ही कहूंगा, इसलिए मन न होता वहां जाने को। वह ठीक हुआ। घर लौटा। फिर दिक्कत हुई, तो दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया। उसे देखने को मन अटका हुआ था। जाने ही को था कि यह मनहूस खबर आई। अब तो बस, मैं अकेला हो गया हूं। मैं हूं और उसकी यादे हैं।

लेखक वीरेन डंगवाल जाने-माने कवि और पत्रकार हैं. बरेली कालेज में शिक्षण कार्य किया और अतुल माहेश्वरी के शिक्षक रहे. अमर उजाला के साथ कई वर्षों तक संबद्ध रहे. उनका यह लिखा अमर उजाला से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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