चिनगारी उर्फ उनका मरना हमारा रोना...

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: अतुल माहेश्वरी - अंतिम निवास और अंतिम यात्रा : दिल्ली के दंदफंद से दूर शांति की खातिर पुराने-नए साल के संधिकाल में नैनीताल गया. बर्फ में खेलने-कूदने-सरकने, पहाड़ों पर घूमने से मिली खुशी नए साल के शुरुआती दो-तीन दिनों में काफूर हो गई. पहली दुखद खबर.

नैनीताल में ही मुझे पता चला कि नैनीताल क्लब में कार्यरत एक कर्मचारी रात में बैठे-बैठे ही हीटर से जलकर मर गया. बताने वाले बता रहे थे कि वो ज्यादा पी गया था, पीने के बाद हीटर के आगे बैठकर आग सेक रहा था, और बैठे-बैठे सो गया और उसे पता ही नहीं चला कि कब गुनगुनी गरमाहट खूंखार आग में तब्दील होकर बदन से खून पीने लगी. बगल में उसके बच्चे सोए थे, उनकी भी नींद नहीं खुली. बेहद ठंड के मारे. गरमाहट से लगी आग की मौत भी मंजूर शायद! सबेरे सबको पता चला.

नैनीताल क्लब में मैं रुका नहीं था लेकिन जहां रुका था, वहां मिलने आए एक पत्रकार साथी ने यह सूचना दी. पहाड़ों पर ठंड बहुत पड़ती है, खासकर ठंड के दिनों में. बचने के लिए हर शख्स आग मिलते ही हाथ सेकने को बैठ जाता है. पहाड़ पर दारू भी खूब पी जाती है. दारू, आग और आदमी. तोनों का चोली-दामन का साथ है पहाड़ पर. लेकिन इनके बेसुरे संगम से कैसे दर्दनाक-खौफनाक मौत हो जाया करती है, यह जानने को मिला. बहुत देर तक सोचता रहा. वो मरने वाला शख्स चतुर्थ श्रेणी का, चपरासी टाइप कर्मचारी था, सो उसकी मौत ज्यादा बड़ी खबर नहीं बन सकती थी.

कल नैनीताल से लौट रहा था. संपर्क क्रांति से. एक बजे के करीब कई मित्रों के फोन अचानक आने लगे. पता चला कि अतुल माहेश्वरी की मौत हो गई. मैं ट्रेन में ही चिल्ला पड़ा- क्या, कैसे, अरे.....? दिल्ली चार बजे पहुंचा तो सीधे अतुलजी के नोएडा वाले घर पहुंचा. भड़ास4मीडिया आफिस से कंटेंट एडिटर अनिल सिंह को भी साथ कार पर बिठाया. सीधे घर के अंदर घुस गया. पार्थिव शरीर के अगल बगल में रोते बिलखते परिजन. थोड़ी देर बाद शवयात्रा शुरू हुई. सारे ग़मज़दा लोग राम नाम सत्य बोलते हुए चल पड़े 'अंतिम निवास' की ओर. 'अंतिम निवास' नामक स्थान नोएडा-दिल्ली बार्डर पर श्मशान गृह है.

शवयात्रा शुरू होते वक्त कोई फोटोग्राफर या कैमरामैन नहीं था. सो, मैं भी थोड़ा हिचका. लेकिन मुझे लगा कि अगर मैं सच्चा पत्रकार हूं तो अपना काम मुझे करना चाहिए, अगर कोई रोकता या टोकता है तो देखा जाएगा. मैंने मोबाइल का वीडियो आन किया और शूट करने लगा. वहां से अंतिम निवास हम लोग पहुंचे. सैकड़ों लोग पहुंचे हुए थे. अंतिम क्रिया कराने वाला व्यक्ति जोर-जोर से बोलकर सारे संस्कार करा रहा था. पुत्र तन्मय माहेश्वरी ने मुखाग्नि दी और फिर चिता पर घी डालते रहे.

थोड़ी ही देर में अंतिम निवास में चिता की लकड़ियों ने चड़चड़ाहट के साथ जलते हुए देह को लाखों चिंगारियों में तब्दील करना शुरू कर दिया. तन्मय की निगाह अचानक उपर, उन चिनगारियों पर टिक गईं, अटखेलियां करतीं चिनगारियां और फिर उड़नछू. वे निहारते रहे. फफकते रहे. घी डालते रहे. चिनगारियों की मात्रा बढ़ाते रहे.

कभी मुस्कराहट के टुकड़े की तरह लगतीं वे चिनगारियां तो कभी किसी प्रकाशमान एटम की माफिक.

मैंने कल अतुलजी के घर पर अतुलजी के चेहरे को देखा था. पार्थिव शरीर के चेहरे को. शांत. गहरी निद्रा में लीन. चेहरा वैसे का वैसा. लगा ही नहीं कि मृत्यु के बाद वाला ये चेहरा है. पर वे जीते रहते तो शायद इस तरह सोते नहीं, वे तो ढेर सारे जिंदगियों के सुर-लय-ताल का संचालन कर रहे होते, तब ये भला मातम क्यों होता. घर में जमीन पर लेटे अतुलजी, चार कंधों पर सवार होकर निकलते अतुलजी, अंतिम निवास में चिनगारी में तब्दील होते अतुलजी. कबीर के भजनों के बीच अंतिम क्रिया के संपन्न हो जाने के बाद क्रिया कर्म कराने वाले व्यक्ति ने सबको गायत्री मंच तीन बार पढ़ने को कहा ताकि जो चला गया, उसकी आत्मा को शांति नसीब हो सके, स्वर्ग में जगह मिल सके.

समवेत स्वर में गायत्री मंत्र का पाठ, चिताओं की आग भरी आवाज, लाउडस्पीकर पर बजते कबीर के भजन, आती-जाती-भागती गाड़ियों का शोर, लाइटों की जगमग जल-बुझ.... कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था, जिसके हम आदी नहीं.

अंतिम निवास में एक और चिता जल रही थी. चिता अभी जवान थी. स्पीडी धधकन.  सब समेट लेने की जल्दी वाली धधक. लेकिन चिता अकेले थी. कोई दिल्ली के अशोक नगर का शख्स था. पोस्टमार्टम हाउस से उसकी लाश परिजन लेकर आए थे और जलाने के तुरंत बाद चले गए. उस चिता के आसपास कोई न था. अकेली जल रही जवान चिता थी वो, जिसकी तरफ हम लोगों की पाठ थी और उसके घरवालों ने तो पूरी पीठ फेर ली थी. मानवों का रेला अतुलजी की चिता को घेरे था. मौत मौत में फर्क था क्योंकि जीवन दोनों ने अलग अलग जिया था.

अतुलजी ने हजारों-लाखों लोगों को जीवन जीना सिखाया, इसमें दो राय नहीं. सो, जिन-जिन को खबर लगी और जो-जो पहुंच सके, पहुंचे. कई परिचित मिले. सबके मुंह पर अतुल जी के किस्से. मानवीयता के किस्से. बड़प्पन के किस्से. दर्शन के किस्से. सहजता के चर्चे. उदारता की बातें. मेरठ में छंटनी के नाम पर आठ चपरासी मैनेजरों ने निकाल दिए तो अतुलजी को बात मालूम हुई तो बोले- चपरासियों को निकलने से मंदी नहीं खत्म होगी. इन्हें बहाल करिए. पिछले दिनों एक पुराने पत्रकार जो काफी दिनों से बेराजगार हैं और उनका जीवन दारू के लिए पैसे इकट्ठे करने और फिर दारू पीकर मस्त रहने में व्यतीत होता है, अतुलजी से मिलने पहुंचे. वे पत्रकार अमर उजाला में लंबे समय तक काम कर चुके हैं. अतुल जी ने कहा कि नौकरी तो नहीं दूंगा, आपके एकाउंट में पैसे डलवा देता हूं ताकि आपके परिवार को कोई दिक्कत न हो. बताते हैं कि पचास हजार रुपये उन्होंने अपने एकाउंट विभाग से कहकर उन पत्रकार सज्जन के पारिवारिक बैंक एकाउंट में डलवाए.

अंतिम निवास को खुली और कातर आंखों से निहारकर जब वापस घर की तरफ लौटा तो दिल्ली में घर वापसी का रेला सड़कों पर झमाझम जमा था...  पों, ठों... टर्र... घर्र... भुर्र... अचानक लाल... और सब जाम. जगह-जगह जाम से रुक-रुक हुचक हुचक चल रही थी गाड़ियां, शायद दिमाग का भी यही हाल था.

जाम से निजात पाकर जाम की तलाश में एक शराबखाने की ओर बढ़ा. दिन भर में जिन जिन के काल को अटेंड न कर पाया था, उन सबको रिंग बैक करना शुरू किया, दारू पीते हुए, कार में ही बैठकर, अकेले. ज्यादातर उन लोगों के फोन थे जो अतुलजी की मौत को कनफर्म करना चाह रहे थे, जो सुनना चाह रहे थे कि भड़ास कह दे कि खबर झूठी है. लेकिन क्या करें, वो तो न भड़ास के वश में है और न अमर उजाला के और न सोनिया - मनमोहन और ओबामा के. जैसे हर चीज के दो पहलू वैसे मौत के दो पहलू. मौत से डर लगता है. मौत से दुख होता है. लेकिन मौत से ताजगी बनी रहती है. मौत से सिस्टम सही रहता है. ताजगी यानी पतझड़ से ही नए पत्ते निकलते हैं, कोंपल आती हैं. प्रकृति का चक्र बना रहता है. पुराना जाता है, नया आता है. नया आएगा तो पुराना जाएगा ही. और पुराना जब जाएगा तभी नए के आने का मार्ग प्रशस्त होगा. पर बात मौत के समय की है.

अतुलजी को खुद नहीं पता था कि वे इतने जल्दी चले जाएंगे. तभी तो उन्होंने अकेले के दम पर बहुत सारे पंगे, धंधे, प्रोजेक्ट, मिशन पाल-प्लान रखे थे. एक क्रांतिकारी कामरेड टाइप व्यवसायी से घोर बाजारू कारपोरेट हस्ती बनने की अतुल माहेश्वरी की स्याह-सफेद यात्रा में दागदार क्षण बेहद कम हैं, उजले बहुत ज्यादा. इधर कुछ वर्षों से अतुल माहेश्वरी कई वजहों से निगेटिव न्यूज के हिस्से बन गए थे. पर उसकी तह में जाकर अगर पता किया जाए तो लगेगा कि अतुल माहेश्वरी अपने विजन से इत्तफाक न रखने वालों को अपने से दूर रखते थे तो उसी सोच के तहत उन्होंने अपने साझीदारों को एक-एक कर अलग करना शुरू किया.

बहुत मुश्किल था यह फैसला लेना लेकिन अतुल माहेश्वरी तो नाम उसी व्यक्ति का है जो हिम्मती, मुश्किल फैसले लेने के लिए जाना जाता है. चाहें कारोबार हिंदी अखबार के प्रकाशन का मामला हो या पंजाब कश्मीर में अमर उजाला के लांच करने का या फिर शशि शेखर के हवाले अमर उजाला करने का या फिर अजय अग्रवाल को अमर उजाला से अलग करने का या फिर अशोक अग्रवाल को भी विदा करने का.... ये सारे फैसले कोई साहसी, विजनरी और अदम्य इच्छा शक्ति वाला व्यक्ति ही ले सकता था. जब आप सौ फैसले लेते हैं तो दो-चार फैसले गलत हो ही जाते हैं, दो-चार फैसलों की आलोचना होने लगती है, लेकिन आलोचना के डर से फैसले लेना तो नहीं बंद किया जा सकता. अतुल माहेश्वरी की शिकायत करने वाले उनके कुछ गलत फैसलों का उल्लेख कर सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि वे गलत फैसले उनके कुल फैसलों के दो-चार फीसदी ही होंगे और ऐसे अपवादों के आधार पर किसी के व्यक्तित्व में नकारात्मकता नहीं तलाशी जानी चाहिए.

दो लोगों से ही फोन पर बात कर पाया था कि मेरी जुबान लड़खड़ाने लगी और बातचीत के दौरान अंतिम निवास के दृश्य का बयान करते करते आंखें नम. दिमाग में प्रविष्ट दिल्ली की भयानक व्यावहारिकता-दुनियादारी-सांसारिकता-गुणा-गणित का आक्रांत आतंक लिक्विड के असर से खत्म होने लगा. उसकी जगह नया लेपन... नंगे खड़े विकल मनुष्य की बेचैन करने वाली भावुकता का लेप. एक पौव्वा खत्म कर चुका था. फोन करने-आने का सिलसिला जारी. बोलते सुनते मुंह खुश्क. लगा, अभी कुछ पिया नहीं, जिया नहीं. कार बैकगीयर में. मुंह शराबखाने की सड़क की ओर. फिर एक क्वार्टर लिया. दारू की दुकान के ठीक बगल में पानी बेचने वाला अधेड़ बंगाली मुस्कराया. वो पीता नहीं. पहले पौव्वे को ले जाते वक्त उससे हेलो हाय हुई थी. दूसरे पौव्वो को ले जाते वक्त वह चालढाल की लड़खड़ाहट ताड़ चुका था. न पीने वाले पीने वालों पर मुस्कराते हैं और पीने वाले न पीने वालों पर.

दो चवन्नी शीशियां सड़क पर, बेजान. इस दूसरे ने खुद के खत्म होते होते मेरे दिल-दिमाग के बीच की दीवार को नरम कर ढहा दिया था. अब सब एक था. जाने किन किन जानने वाले, दोस्तों, वरिष्ठों, कनिष्ठों को फोन करता रहा और रोता रहा, गाता रहा, सुनाता रहा.

और, रोने वाले को दूसरा रोने वाला मिल जाए तो फिर क्या, कभी समवेत रुदन, तो कभी पारी-परंता. एक की रुलाई दूसरे को रोने के लिए उकसाती है. दूसरे की रुलाई पहले वाले के कंधा को तलाशती है. हंसने में भी ऐसा होता है. रोने-हंसने में बहुत साम्य है.  लेकिन हंसना ठीक और रोना खराब क्यों माना जाता है. जैसे जिंदगी ठीक और मौत बुरी.

मेरठ से एक पत्रकार साथी का फोन था. रो रहे थे. नशे के अतिरेक में वे भी थे. अतुलजी को पिता बता रहे थे. यह भी कि उन्होंने किस किस तरह से उनकी कब कब गुपचुप तरीके से आर्थिक मदद की. बात खत्म तो उनका संगीत शुरू. निर्गुण भजन. एक शराबी गाये और दूसरा न सुनाये. मैंने भी सुनाया... ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी, सज धज के मौत की जब शहजादी आएगी...... (नीचे के प्लेयर पर क्लिक करके ओरीजनल सुन सकते हैं)

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अभी बस इतना ही.

अतुल जी की अंतिम यात्रा का एक वीडियो अपलोड कर दिया गया है, यही लिखना था, इसी से संबंधित इंट्रो लिखना था, ( वीडियो देखने के लिए क्लिक करें- Atul Ji Ki Antim Yatra) लेकिन जाने क्या क्या लिख गया.

सच कहूं तो शब्दों और लिखने से वो बात निकलती नहीं जो कहना चाहता हूं. विचारों भावनाओं का स्पीडी प्रोडक्शन अकुलाहट के जिस लेवल को क्रिएट करता है, उसे पूरा का पूरा डाउनलोड करना मुश्किल है. पर दुर्भाग्य यह कि आपको मैं और मुझे आप बस उतना ही जान पाएंगे जितना हम अभिव्यक्त हो पाते हैं.  बाजार के इस दौर में मुश्किल ये है कि अगर अच्छा-खासा आदमी खुद की अच्छाई की मार्केटिंग न करे तो गंदा-बुरा साबित करे वाले उसे ठिकाने लगाने में वक्त न लगाएंगे. और, अतुल माहेश्वरी ने कभी खुद के सुयश के लिए अपने को प्रोजेक्ट नहीं किया, निजी तौर पर खुद को मार्केट नहीं किया. वे वही करते रहे, जो वे दिल से चाहते थे, भले किसी को बुरा लगे तो लगे. और उनके करने में एक वृहत्तर संदर्भ होता था, बड़ा फलक होता था जिसकी परिणति मनुष्यता को मजबूत बनाना था.

इसी कारण वे मालिक होते हुए भी बनिया नहीं बन पाए, यह उनकी जीत रही. आज के बनिया मीडिया मालिकों के दौर में अतुल माहेश्वरी एक मर्द किस्म का मालिक था, जिसके पास सपना, समझ और सच्चाई थी. कई बार किसी एक फिसलन को हम कैमरे में कैद पर आदमी के पतन के रूप में चित्रित कर देते हैं पर लेकिन जब पूरी फिल्म देखते हैं तो पता चलता है कि वो तो एक फकीर था जो अपनी मस्ती में मशगूल रहने के कारण, अपनी मंजिल पर निगाह गड़ाए रखने के चक्कर में अपने ठीक आगे के गड्ढे से बेजार था, अनजान था, परे था. पर दोस्त, आजकल कोई किसी की जिंदगी की पूरी फिल्म नहीं देखना चाहता, हम सब अपने-अपने मन मुताबिक दूसरों के जीवन के एक-एक रसदार सीन कट कर करके अपनी अपनी पीठों पर इन सीनदार पोस्टरों को चिपकाए मुंह बिचकाए घूमते रहते हैं, किसी उल्लू, गधे, बकलोल की तरह. ऐसे उल्लुओं, गधों, बकलोलों से अतुल माहेश्वरी बन पाने की उम्मीद पालना दुस्साहस के समान होगा.

स्वीकार करना चाहता हूं, कहना चाहता हूं कि अमर उजाला ने मुझे बनाया है, पत्रकारीय समझ दी है, सच के साथ खड़े होने का साहस दिया है. अगर अमर उजाला में मैंने काम न किया होता, अगर अमर उजाला में वीरेन डंगवाल न होते, अगर अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी न होते तो शायद मैं न होता. और ये मैं, सिर्फ मैं नहीं, मेरे जैसे हजारों लाखों हैं.

मैं एक लाजवाब किस्म के मनुष्य के इस दुनिया यशवंत सिंहसे असमय चले जाने से निजी तौर पर बेहद आहत हूं और भविष्य की पत्रकारिता को लेकर असुरक्षित. ईश्वर अमर उजाला ग्रुप को ताकत दे कि वे उन लक्ष्यों-सपनों से न डिगें, जिसे अतुल माहेश्वरी कहा-देखा-माना करते थे.

प्रणाम

यशवंत
एडिटर, भड़ास4मीडिया

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