यह कमिश्‍नर सरकारी संपत्ति को जागीर समझता है, इसे ट्रेनिंग दिया जाय

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दीपकदेहरादून। कोई नौकरशाह जब अपने पर उतर आए तो वे कैसे भी गुल खिला सकते हैं। उत्तराखंड में स्टर्डिया जमीन घोटाले में राजनेताओं के साथ सरकारी बाबुओं ने कैसा रंग जमाया, यह जमाने के सामने बेपर्दा हो चुका है। अब जनता के पैसे पर पलने वाले नौकरशाहों का एक और चेहरा सामने आया है। एक मामले में हाईकोर्ट का कहना है कि सरकारी संपत्ति को अपनी जागीर समझने वाले कमिश्नर डॉ. उमाकांत पंवार को फिर से ट्रेनिंग के लिए आईएएस एकेडमी भेजा जाय, ताकि उन्हें प्रशासनिक कामकाज और अपने अधिकार क्षेत्र का पता चले सके। बकायदा हाईकोर्ट ने सरकार से इस बाबत हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

मामला कुछ यूं है। राज्स सरकार के स्वामित्व वाले गढ़वाल मंडल विकास निगम में देवी लाल शाह जनरल मैनेजर के पद पर कार्यरत रहते हुए राज्य में यात्रा प्रशासन संगठन में विशेष कार्याधिकारी की भी जिम्मेदारी संभाल रहे थे। शाह 31 अक्टूबर 2008 को सरकारी सेवा से रिटायर्ड हो गए। इस पर जीएमवीएन से तो उनका नाता टूट गया, लेकिन पर्यटन मंत्रालय के अधीन आने वाले यात्रा प्रशासन संगठन से उनका मोह खत्म नहीं हुआ। तब गढ़वाल मंडल के कमिश्नर डॉ. उमाकांत पंवार ने चारधाम यात्रा सीजन को देखते हुए बिना शासन से अनुमति लिए ही 12 फरवरी 2009 को मनमाने तरीके से शाह को अगले आदेश तक सेवा विस्तार देने का फरमान जारी कर दिया। शाह की गिनती भी पहुंचे हुए खिलाड़ियों में होती रही है। उनका मसूरी में पार्किंग निमार्ण के लिए जमीन घोटाले में नाम उछलता रहा। हालांकि अभी तक इस जमीन घोटाले की जांच किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंची।

खैर, ताजा मामले में शाह के वेतन और अन्य देयकों के भुगतान की बारी आई तो पंवार ने आश्चर्यजनक तरीके से अपने सेवा विस्तार के आदेश के छह माह बाद उस पर मुंहर लगाने के लिए 18 अगस्त 2009 को मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा। लेकिन इसे कूड़ेदान के लायक भी नहीं समझा गया। इसके बाद जीएमवीएल और पर्यटन विभाग द्वारा इस मामले में किसी तरह का भुगतान करने से हाथ खड़े किए जाने पर शाह ने हाईकोर्ट का रुख कर लिया। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायधीश बारेन घोष और न्यायधीश वीके बिष्ट की संयुक्त बेंच ने 28 दिसम्बर को अपने फैसले में डॉ उमाकांत पंवार की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, ‘हमे लगता है कि यह उपयुक्त मामला हैं जब राज्य सरकार को अपने अधिकारियों विशेषकर आईएएस कैडर को सही ढंग से प्रशिक्षित किए जाने को उचित दिशा में कदम उठाने चाहिए।

विशेषकर इस मामले में गढ़वाल मंडल का कमिश्नर रहते हुए डॉ. उमाकांत पंवार ने जिस प्रकार एक रिटायर्ड कर्मचारी से काम लेते हुए ऐसे महसूस किया जैसे गढ़वाल मंडल विकास निगम उनकी निजी संपत्ति हो।‘ कोर्ट ने आगे कहा, ‘हम सोचते हैं कि सरकार को इन सज्जन डॉ. उमाकांत पंवार को फिर से आईएएस एकेडमी में ट्रेनिंग के लिए भेजा जाना चाहिए, ताकि वे अपने अधिकार क्षेत्र से भली भांति वाकिफ हो सकें।’ अदालत ने सरकार को इस पर अमल करने के लिए छह माह का वक्त देते हुए एफिडेविट दाखिल करने के आदेश दिए हैं। इससे आगे अदालत ने अपने आदेश के पैरा तीन में कहा है कि चूंकि डॉ. पंवार, गढ़वाल मंडल विकास निगम को अपनी जागीर समझते रहे, लिहाजा याचिकाकर्ता के वेतन व अन्य देयकों का भुगतान उन्हें व्यक्तिगत रूप से करना चाहिए।

हाईकोर्ट का यह आदेश संयोग से उसी दिन सामने आया जब राज्य में बहुचर्चित स्टर्डिया जमीन घोटाले पर भी अदालत ने नौकरशाहों को कोसते हुए अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया। देखने वाली बात होगी कि राज्य सरकार अब अदालत के आदेश पर अपने इस नौकरशाह को फिर ट्रेनिंग लेने के लिए आईएएस प्रशिक्षण संस्थान के लिए रवाना करती है या फिर हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की ओर रुख करती है। जो भी हो, पर यह फैसला इतना जरूर बताता है कि अहम पदों पर बैठे नौकरशाह इस राज्य को मनमाना तरीके से हांकते जा रहे हैं। डॉ. पंवार इन दिनों गढ़वाल मंडल के कमिश्नर से मुक्त होकर राज्य के चिकित्सा, स्वास्थ्य और उर्जा जैसे अहम विभाग के सचिव पद की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

नीचे हाईकोर्ट का आदेश

IN THE HIGH COURT OF UTTARAKHAND AT NAINITAL
Writ Petition (S/B) No. 296 of 2010
Devi Lal Sah S/o late G.L. Sah,
R/o Street No.4 Shastri Nagar,
Dehradun, District Dehradun.

Petitioner

Versus

1. The State of Uttarakhand through Secretary
Tourism Uttarakhand Shasan, Dehradun.
2. The Commissioner, Garhwal Mandal, Pauri,
Pauri Garhwal.
3. The Chairman/Adhyaksha Yatra Administration,
Garhwal Mandal.

Respondents

Present: Mr. A.D. Tripathi, Advocate for the petitioner
Mr. J.P. Joshi, Chief Standing Counsel for the respondents.

Coram :
Hon’ble Barin Ghosh, Chief Justice
Hon’ble V. K. Bist, Judge
Date of Decision : 28.12.2010
Barin Ghosh, C. J. (Oral)

We think that this is a suitable matter, where an appropriate direction should be issued upon the State Government to appropriately train its officers, and specially those of I.A.S. cadre, periodically at its institute known as A.T.I. since they are functioning in a manner, which is absolutely reprehensible. In this case, Dr. Uma Kant Panwar, while holding charge of Commissioner, Garhwal Mandal, asked a retired government employee to discharge government functions. While doing so, he felt that Garhwal Mandal Vikas Nigam is his personal property and, accordingly, he can engage anyone to discharge duties pertaining to the said Nigam. We think the Government must send this gentleman, Dr. Uma Kant Panwar, to A.T.I. for refresher training and, in particular, to teach him what is the limit of his authority. The Government is directed to report back to this Court in six months’ time by filing an affidavit in connection with this writ petition that Dr. Uma Kant Panwar has been appropriately trained at A.T.I.

It appears that in 1989, when the writ petitioner was working with the predecessor in interest of Garhwal Mandal Vikas Nigam, he was appointed as Officer on Special Duty to lookafter Yartra Prashasan Sangathan. On 31st October 2008, petitioner retired from Garhwal Mandal Vikas Nigam. It appears that on or about 12th February 2009, petitioner made a representation before Dr. Uma Kant Panwar to the effect that since 1989 he is Officer on Special Duty in relation to Yatra Prashasan Sangthan in addition to his other duties and is still discharging such duties. On 12th February 2009, on the said representation, the said Dr. Uma Kant Panwar made an endorsement to the effect that the time of forthcoming Yatra is close and, accordingly, petitioner will continue to work as in the past till further order. Since the petitioner has worked on the basis of the said endorsement, the present writ petition has been filed seeking salaries and other remunerations. We are granting specific liberty to the petitioner to claim and recover such salary and other remuneration from Dr. Uma Kant Panwar.

It has been stated that subsequent to 12th February 2009, Dr. Uma Kant Panwar, by his letter dated 18th August 2009 approached the Principal Secretary attached to the office of the Chief Minister requesting grant of sanction to the continuation of petitioner in connection with the affairs of Yatra Prashasan Sangthan. As the said letter was not even worth the waste paper box, in law, the Principal Secretary attached to the office of the Chief Minister did not even bother to look into the same. That appears to be another grievance in the writ petition. We have already stated above that Dr. Uma Kant Panwar could act in the manner he acted only because he felt, and we presume he still feels, that Garhwal Mandal Vikas Nigam belongs to him and it is part of his Jagir. The writ petition is disposed of with liberty to the petitioner as mentioned above and we expect that the petitioner would take appropriate step to recover his salaries and other remunerations from Dr. Uma Kant Panwar.

( V.K. Bist, J.)
(Barin Ghosh, C.J.)
28.12.2010
P. Singh

लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.


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