विधायक की हत्‍या से जुड़े सवाल : कौन देगा जवाब

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विधायक राजकिशोर केशरी की हत्या ने कड़ाके की ठंड में बिहार का राजनीतिक तापमान गरम कर दिया है। बिहार के सत्ताधारी गठबंधन के एक विधायक की हत्या हो जाए वो भी दिन के उजाले में, ये घटना सुशासन में आम लोगों की सुरक्षा के सरकारी दावे पर उँगली उठाने के लिए काफी है। पूर्णिया के बीजेपी विधायक राजकिशोर केशरी चौथी बार विधायक बने थे। रुपम पाठक नाम की एक एमए पास शिक्षिका ने विधायक पर यौन शोषण के इल्जाम में उनकी चाकू मारकर हत्या कर दी। पुरूष वर्चस्व वाले समाज में वाकई ये आश्चर्य की बात है कि अब तक की परंपरा के अनुसार एक निरीह अकेली महिला के साथ पुरुष ज्यादती करता था। पर इस घटना में एक महिला ने एक जनप्रतिनिधि की यौन शोषण बदला लेने के लिए हत्या कर दी है।

महिला ने विधायक की हत्या की, इसकी जितनी निंदा की जाय कम है और कानून उसके किये की सजा भी अवश्य देगा। राजकिशोर केशरी पर लगाये आरोप सही थे या गलत ये भी जाँच का विषय हैं, क्योंकि महिला के लगाये गए आरोप विधानसभा के सदस्य की गरिमा और मर्यादा के लिहाज़ से अत्यंत गंभीर हैं। लेकिन इस घटना से सहज ही समझ सकते हैं कि उक्त महिला के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला किस कदर भड़की हुई थी। इस पूरी घटना ने एन चन्द्रा की एक फिल्म - प्रतिघात- का वो अंतिम दृश्य आँखों के सामने घुमा दिया जिसमें फिल्म की हिरोइन ने अपने अत्याचार का प्रतिशोध लिया था। बिहार में किसी महिला का विधायक से बदला लेने की ये पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी -योगेन्द्र सरदार- नाम के विधायकजी ने जब एक महिला को गलत काम के लिए बाध्य करने की कोशिश की तो उस साहसी महिला ने महोदय का गुप्त अंग काट लिया था।

पूर्णिया के बीजेपी विधायक राजकिशोर केशरी की हत्या से बीजेपी जितनी दुखी है उससे ज्यादा कहीं सुशील कुमार मोदी को आघात पहुँचा है। यही कारण है कि केशरी की हत्या के बाद मोदीजी मीडिया के सामने अपने विधायक का चरित्र चित्रण करने में जुटे रहे। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने मीडिया से कहा कि राजकिशोर केशरी ईमानदार, कर्मठ, जुझारू नेता थे। मोदीजी ने ये भी कहा कि महिला ब्लैकमेलर थी यानी गलत थी, इशारा साफ़ था कि चरित्रहीन है। एक जिम्मेदार पद पर बैठे नेता का बयान कई सवाल खड़ा करता है। पहली बात तो ये कि किसी के चरित्र की कोई ठेकेदारी नहीं ले सकता है। सच क्या है वो जांच के विषय हैं, कई बिन्दुओं पर जांच होनी चाहिए - रूपम और राजकिशोर केशरी के बीच क्या सम्बन्ध थे? रूपम विधायक को ब्लैकमेल कर रही थी लेकिन क्यों? क्या ये सच है कि विधायक और उनके सहयोगी विपिन राय रूपम का ब्लैकमेलिंग कर यौन शोषण कर रहे थे? क्या ये बात सच है कि रूपम के बाद उसकी बेटी पर बुरी नज़र रखी जा रही थी? अब जहाँ तक महिला के चरित्रहीन होने की बात है तो क़ानून ये कहता है कि पत्नी के साथ पति का या किसी वेश्या के साथ किसी भी व्यक्ति का जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करना- ये सभी बलात्कार की श्रेणी में आता है।

एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के आंकड़े के अनुसार जो 142 विधायक इस बार की विधानसभा में दागी हैं और इनमें 85 पर गंभीर आरोप हैं। एडीआर की इस लिस्ट में राजकिशोर केशरी भी शामिल थे और उनपर आईपीसी की धारा- 323, 353, 307, 147, 148, 149, 308, 379, 504, 452 और 426 के तहत मामले दर्ज थे। राज्य के मुखिया नीतीश कुमार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान और क़ानून-व्यवस्था के दावे पर भी जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों से बट्टा लग रहा है। सरकार बनने के डेढ़ महीने में ही बीमा भारती, हुलास पाण्डेय, सुनील पाण्डेय और अब राजकिशोर केशरी से जुड़े मामले सुर्खियाँ बन चुके हैं। नीतीश ज़ी की कोशिश भी है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बरती जाय। इस सन्दर्भ में जनप्रतिनिधियों और उनके नजदीकियों से जुड़े मामले का स्पीडी ट्रायल भी एक विचारणीय मुद्दा है।

अफसोस की केशरीजी जनप्रतिनिधि थे और उनकी हत्या हो गई, लेकिन सरकार के सुशासन के दावे के बीच ये घटना सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलता है, यानि जब जनप्रतिनिधि सुरक्षित नहीं हैं तो आम जनता की कौन पूछे। फिर नीतीश बाबू की सरकार बनने के बाद ये विधायकों के साथ हुआ दूसरा मामला है। इससे पहले विधायिका बीमा भारती को उनके क्रिमिनल पति अवधेश मंडल ने अपहरण कर जान से मारने की कोशिश की थी। फिर सवाल महिलाओं के खिलाफ राज्य में हो रहे उत्पीड़न और समय रहते न्याय न मिल पाने का का भी है। लेकिन बिहार की राजनीतिक सर्किल में सनसनीखेज और चर्चित सेक्स स्कैंडल की लिस्ट में श्वेत निशा उर्फ़ बाबी, चंपा विश्वास, शिल्पी-गौतम, रेशमा उर्फ़ काजल के बाद अब "रूपम पाठक- राजकिशोर केशरी" का भी नाम जुड़ गया है।

इन सभी मामलों की परिणति क्या हुई ये किसी से छुपी हुई नहीं है और अभी तक केशरी हत्याकांड में जो प्रगति है उससे इस मामले के हश्र की तरफ एक इशारा मिल गया है। डीआईज़ी ने कहा कि हम हत्याकांड को केंद्र में रखकर पूरे मामले की जांच कर रहे हैं, जबकि ये पूरा मामला सेक्स स्कैंडल का है, जिसमें सही जांच की दिशा कुछ बड़े गिरेबान तक पहुँच सकते हैं। दूसरा कि इस मामले का सबसे पहले खुलासा करने वाले 'Quisling' अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका के संपादक नवलेश पाठक को पुलिस उनके घर से बिना नोटिस के घसीटते हुए अज्ञात जगह ले गयी है। फिलहाल पत्रकार बिरादरी ने चुप्पी साधी हुई है जो वाकई आश्चर्य का विषय है। इस घटना से एक बार फिर स्पष्ट है कि  जनप्रतिनिधियों के चाल- चरित्र- और चेहरे दागदार हैं या बहस का मुद्दा है। यही कारण है कि सार्वजनिक लोगों की निजी जिंदगी में लोगों की खासी दिलचस्पी हमेशा से रही है, पर कई बार जब बड़ी घटना होती है तो वो मीडिया की सुर्खियां भी बन जाता है।

रूपम के साथ क्या हुआ ये जाँच का विषय है। इस पूरी घटना पर सही- गलत का फैसला मोदीजी या मीडिया के कहने से नहीं होगा। इस पूरे मामले में उच्चस्तरीय जाँच ही दूध-का-दूध और पानी-का-पानी स्पष्ट करेगा। तब तक राजकिशोर केशरी या रूपम पाठक- दोनों में से किसी का भी चरित्र चित्रण, चरित्र हनन और महिमामंडन नहीं होना चाहिए। लेकिन पूर्णिया की गलियों में खामोश घूम रही जनता सब जानती है और फैसला क़ानून के हाथ में है, जिसके लिए वाकई इंतज़ार करना होगा। पूर्णिया से लेकर पटना के राजनीतिक गलियारे में इस पूरी घटना को लेकर अलग- अलग तरह की चर्चायें गरम हैं जिसे यहाँ कहना-सुनना फिलहाल ठीक नहीं।

लेखक निखिल आनंद टीवी पत्रकार हैं. ईटीवी, सहारा समय, जी न्‍यूज जैसे संस्‍थानों में काम करने के बाद इनदिनों इंडिया न्‍यूज बिहार के पॉलिटिकल एडिटर हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.


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