एक संपादक को देशद्रोही बनाने की तैयारी!

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शेषजी: महाराष्‍ट्र पुलिस ने 'विद्रोही' के संपादक सुधीर ढवले को गिरफ्तार किया : महाराष्ट्र पुलिस ने भी छत्तीसगढ़ पुलिस की तरह गरीबों के अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों की धरपकड़ शुरू कर दी है. इस सिलसिले में दलित अधिकारों के चैम्पियन और मराठी पत्रिका, 'विद्रोही' के संपादक सुधीर ढवले को गोंदिया पुलिस ने देशद्रोह और अनलाफुल एक्टिविटीज़ प्रेवेंशन एक्ट की धारा 17, 20 और 30 लगाकर गिरफ्तार कर लिया. उन पर आरोप है कि वे आतंकवादी काम के लिए धन जमा कर रहे थे और किसी आतंकवादी संगठन के सदस्य थे.

पुलिस ने उनको नक्सलवादी बताकर अपने काम को आसान करने की कोशिश भी कर ली है. अभी पिछले हफ्ते गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने महाराष्ट्र सरकार से आग्रह किया था कि नक्सलियों के खिलाफ अभियान को तेज़ किया जाए. सबको मालूम है कि जब पुलिस के ऊपर आला अफसरों का दबाव पड़ता है तो वे सबसे आसान पकड़ उन वामपंथियों को मानते हैं जो गरीब आदमियों के बीच काम कर रहे हों. छत्तीसगढ़ में डॉ. बिनायक सेन ऐसे ही शिकार थे और अब महाराष्ट पुलिस ने वही कारनामा कर दिखाया है. सुधीर ढवले ने वर्धा में रविवार को अंबेडकर-फुले साहित्य सम्मलेन को संबोधित किया था और गिरफतारी के समय ट्रेन से वापस मुंबई जा रहे थे. उन्हें गिरफ्तार करके 12 जनवरी तक पुलिस हिरासत में रखा जाएगा.

गोंदिया की पुलिस ने दावा किया है कि कुछ लोगों ने उसे बता दिया था कि सुधीर ढवले किसी नक्सलवादी संगठन के राज्य स्तर के पदाधिकारी हैं और उनके पास एक कम्प्यूटर है जिसमें सारा नक्सलवादी साहित्य रखा हुआ है. सुधीर का कम्प्यूटर भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया है. सुधीर की गिरफ्तारी को सभ्य समाज के लोग किसी भी विरोधी आवाज़ को कुचल देने की सरकारी साज़िश का हिस्सा मान रहे हैं, सुधीर सुधीर ढवले कोई लल्लू पंजू सड़क छाप नेता नहीं है. महाराष्ट्र में दलित अधिकारों के लिए चल रहे आन्दोलन के चोटी के नेता हैं. महाराष्ट्र में जाति के विनाश के लिए चल रहे आन्दोलन में वे बहुत ही आदर के मुकाम पर विराजमान हैं.

2006 में जब खैरलांजी में दलितों की सामूहिक ह्त्या की गयी थी तो महाराष्ट्र के नौजवानों में बहुत गुस्सा था. उसके बाद 6 दिसंबर 2007 को डॉ. अंबेडकर के महापरिनिर्वाण के दिन रिपब्लिकन जातीय अन्ताची चालवाल की स्थापना करके सुधीर ढवले ने जाति के विनाश के डॉ अंबेडकर के अभियान को आगे बढ़ाया था. यह आन्दोलन आज मुंबई में एक मज़बूत आन्दोलन है. इस बात में दो राय नहीं है कि वे सरकार के लिए असुविधाजनक हमेशा से ही रहे हैं. महाराष्ट्र में चल रहे उस आन्दोलन की अगुवाई भी वे कर रहे थे जिसमें मुंबई और महाराष्ट्र के सभ्य समाज के लोग डॉ. बिनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ लामबंद हो गए थे.

सुधीर की गिरफ्तारी के बाद मुंबई के संस्कृतिकर्मियों के बीच बहुत गुस्सा है. फिल्मकार आनंद पटवर्धन ने कहा कि सुधीर धावले बहुत ही भले आदमी हैं. उनको भी उसी तर्ज़ पर पकड़ा गया है जिस पर बिनायक सेन को पकड़ा गया था. फिल्मकार सागर सरहदी ने भी सुधीर ढवले के एगिराफ्तारी को गलत बताया है.

लेखक शेष नारायण सिंह देश में हिंदी के जाने-माने स्तंभकार, पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.


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Comments (3)Add Comment
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written by John Denis Horo, January 11, 2011
एक ओर सरकार माओवादी आतंक से ‘आतंकित’ है तो दूसरी ओर उन पत्रकारों पर शामत आई है जो सामाजिक विषमताओं व मुद्दों को उजागर कर मानवीय संवेदनाओं को उद्वेलित करता है ताकि एक भावात्मक व प्रगतिशील समाज का गठन हो और देश उन्नति के पथ पर अग्रसित हो. लेकिन अब हो कुछ और रहा है. गरीबों के मसिहाओं को बार-बार सूली चढ़ाया जा रहा है. ऐसे भी अमीरों की ऐय्यासी के लिए गरीबों की ही आहुति दी जाती है. अब पत्रकारों के लिए पत्रकारिता की परीधि सीमित व संकुचित होती जा रही है. पत्रकार करे तो क्या करे ?
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written by meenakshi srivastava, January 10, 2011
kuch hi patrakar to bache hain jo patrakar khlane k layak hain...unke sath b aisa bartaw patrakarita k bhavishya par sawaliya nishhan hai.....
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written by mohan , January 08, 2011
es system mai har imandar patrkar ki jagaha jail he hai..sudir ji ko bhi us emandari ki saja mila hai.........sudir ji ka salam hai.......

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