मालिक हो तो अतुल माहेश्‍वरी जैसा

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सुभाष कुछ लोग बहुत अच्छे पत्रकार होते हैं, कुछ बहुत अच्छे मालिक, कुछ लोग बेहतरीन इंसान होते हैं। ये सब मिलकर बने थे अतुल माहेश्वरी। एक बेखौफ पत्रकार, कई साल आगे की सोचकर तकनीकी और रणनीति तय करने वाले नियोजक और मानवीय गुणों – संवेदनाओं से लबालब मालिक। ऐसा ऐसा मालिक जो सिर्फ ख्वाब बुनता नहीं, अपनी पूरी टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्हें खून पसीने से सींचना और हकीकत में बदलना भी जानता था। अखबारी दुनिया में सबसे ज्यादा अच्छे तरीके से दूसरों से काम लेने और खुद काम करने के इस हुनर के पीछे को किसी शातिर प्रबंधन वाला अंदाज नहीं, बल्कि एक ऐसी मासूमियत और भोलापन हर जगह नजर आता था, जिससे हर कोई कायल हो जाता है।

अतुल जी के निकट सम्पर्क में रहकर 18 साल काम करने के दौरान मुझे बार बार उन्हें बहुत नजदीक से जानने समझने का मौका मिला। उनकी नेतृत्व क्षमता और कई साल आगे का सटीक अनुमान लगाने की खूबी उनके हर कदम से जाहिर होती थी। आज जब लोग प्रोफेशनल होने का अर्थ महज कामकाज से मतलब रखने के रूप में लेते हैं, तो हमेशा दिमाग में अतुल जी का नाम कौंधता है। उन्होंने अपनी जिंदगी में हजारों बार अपने व्यवहार से ये साबित किया कि मैनेजमेंट में मानवीय गुणों का समावेश किसी भी कम्पनी को बुलंदी तक पहुंचा सकता है। उनकी संवेदनशीलता और उनके व्यक्तित्व से जुड़ी दर्जनों घटनाएं ऐसी हैं, जिन्हें एक सबक के रूप में लिया जा सकता है। ऐसी ही कुछ घटनाओं का जिक्र करना चाहता हूं.....

पहली घटना वर्ष 1985 की है। अमर उजाला, बरेली से ट्रेनी संवाददाता के जुड़े एक युवक ने काम शुरू करने के कुछ ही दिनों बाद अपनी पांच महीने की पगार से अधिक रुपये एडवांस के रूप में देने का अनुरोध अतुल जी से किया। ये वो दौर था, जब हर महीने की 20-22 तारीख को कोई भी कर्मचारी अपनी पे का 40 प्रतिशत हिस्सा एडवांस के रूप में ले सकता था। लेकिन एक साथ पांच महीने की पगार से ज्यादा धन किसी नए व्यक्ति को देने की कोई व्यवस्था नहीं थी। लेखा विभाग ने नियमों का हवाला देते हुए उस युवक को एडवांस देने से इनकार कर दिया था। रात करीब साढ़े दस बजे इस युवक ने अतुल से ये एडवांस दिलाने की अपील की। तब तक लेखा विभाग के लोग घर जा चुके थे। अतुल जी ने पैसे की जरूरत पड़ने की वजह के साथ ही उस युवक से ये भी पूछा कि वह अपने घर कब जाना चाहता है। सुबह आठ बजे उसके घर जाने की बात सुनकर उन्होंने सुबह सात बजे आने को कह दिया।

बरेली में काम करने वाले सब लोग जानते थे कि रात दो – तीन बजे तक दफ्तर में रहकर एक एक खबर को खुद देखने वाले अतुल जी सुबह देर से उठते हैं। एडवांस की अपील करने वाला युवक भी इससे अनजान नहीं था। सुबह सात बजे बुलाने को उनका शालीन अंदाज में इनकार मानने के बावजूद उम्मीद की एक किरण थी कि वह युवक हिचकते हिचकते सुबह करीब आठ बजे दफ्तर पहुंच गया। उसे पक्का यकीन था कि अतुल जी अपने टाइम पर ही उठेंगे। लेकिन बरेली ऑफिस के गेट पर पहुंचते ही वह ये जानकार दंग रह गया कि अतुल जी सुबह सात बजे से तब तक तीन बार उसके बारे में पूछ चुके हैं। एक छोटे से कर्मचारी के लिए अपनी नींद छोड़कर अतुल जी उसका इंतजार कर रहे थे।

दूसरी घटना मेरठ की है। अमर उजाला का मेरठ संस्करण शुरू होने के बाद अतुल जी और उनके पिताश्री भी हम लोगों के साथ नेहरू रोड के एक फ्लैट में रहते थे। वहां रहने वाले ज्यादा थे और कमरे कम। लिहाजा, कई लोगों ने एक हॉल में जमीन पर गद्दे डाल लिये थे। देर रात तक काम करने के बाद इस फ्लैट पर पहुंचते-पहुंचते अक्सर रात के ढाई – तीन बज जाते थे। एक दिन अतुल जी के पहुंचने से पहले फ्लैट पर पहुंचा एक साथी उस बेड पर सो गया, जहां अतुल जी सोते थे। कुछ देर बाद पहुंचे अतुल जी उस रात जमीन पर लगे गद्दे पर सोये। उन्होंने सम्पादकीय के दूसरे लोगों को भी उस सोते हुए युवक को उठाने से रोक दिया, जो चाहते थे कि अतुल जी नीचे न सोयें।

वर्ष 1986 में मेरठ संस्करण शुरु होने के बाद अतुल जी अमूमन हर रात पहली मंजिल पर बने प्रोसेसिंग विभाग में सम्पादकीय और प्रोसेसिंग के लोगों के साथ होटल से आई ठंडी रोटियां हीटर पर गर्म करके खाते थे। पेज बनाने का काम पूरा होने के बाद होटल से मंगाए गए खाने के पैकेट खोले जाते थे, जो कभी गर्म-गर्म नहीं परोसे गए। अतुल जी हर रात गर्म खाना खा सकते थे। लेकिन वे और भइयू जी कभी इसके लिए तैयार नहीं हुए कि स्टाफ ठंडा खाना खाए और वे गर्म।

वर्ष 1986 में दिसम्बर और जनवरी की सर्द रातों में कई बार ऐसा भी हुआ कि कहीं खाना नहीं मिला। तब कई बार अतुल जी रात में ढाई – तीन बजे खुद गाड़ी चलाकर परतापुर या मोदीनगर में खाना खिलाने ले जाते थे। शायद ही अखबारी दुनिया में संवदेनशीलता और स्टाफ को अपने सगों जैसा मानने की ऐसी कोई मिसाल मिले।

अतुल जी बेखौफ पत्रकार थे, ये तो सब जानते हैं। ये शायद ज्यादा लोगों को मालूम नहीं होगा कि वे अपने संवाददाताओं की खुद भी इज्जत करते थे और दूसरों से उन्हें सम्मान दिलाना भी खूब जानते थे। मेरठ में वर्ष 1988 में एक सरकारी अस्पताल में एक नवजात शिशु को चूहों ने कुतर डाला। जिस वक्त ये घटना हुई, उस समय अस्पताल में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की पत्नी ड्यूटी पर तैनात थी। एक संवाददाता यह समाचार खोजकर लाया, तो अतुल जी ने कई तरह के दबावों के बावजूद कोई समझौता नहीं किया। ऐसे किसी मामले में मैंने उन्हें कभी बीच का रास्ता निकालने की जुगत भिड़ाते नहीं देखा।

करीब दो दशक उनसे जुड़कर कार्य करने के दौरान सैकड़ों बार ऐसे मौके आए। वे हर बड़े समाचार और हर घटना के बारे में पहले ही संवाददाताओं से चर्चा करके अपनी राय बना लेते थे। इसके बाद चाहे हल्ला बोल हुआ हो, या कुछ और.... अतुल जी कभी किसी प्रभावशाली नेता या ब्यूरोक्रेट के दबाव में नहीं आए।

सदा-सदा के लिए लोगों को जोड़ने की अतुल माहेश्वरी जी की ये खूब प्रबंधकीय कौशल की एक बेहतरीन मिसाल हो सकती है, लेकिन इसकी बुनियाद में छिपे मानवीय गुण उनका दर्जा और ऊंचा बना देते हैं। उनके गुणों में से एक है, जिस पर विश्वास करो, आखिर तक करते जाओ। शायद उनकी सोच थी कि विश्वास का नतीजा हमेशा किसी न किसी रूप में अच्छा ही होगा.... या तो आपको कुछ अच्छे साथी और मिल जाएंगे या फिर एक अच्छा सबक। कई बार नुकसान उठाकर भी विश्वास करते रहने की सोच के पीछे शायद उनकी यही भोली सोच थी।

लेखक सुभाष गुप्‍ता वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. अमर उजाला से ये लगभग 18 वर्षों तक जुड़े रहे. फिलहाल वॉयस ऑफ इंडिया टीवी के रेजीडेंट एडिटर के रूप में देहरादून में कार्यरत हैं.


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Comments (5)Add Comment
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written by Veetika Gupta, January 14, 2011
Good to read incidents about Atul Ji, I was really shocked to hear this
and Pray for Peace with AU, the family and his Soul.

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written by सम्मी, January 12, 2011
वाकई अतुल जी पर सबको नाज है। लेकिन एक सवाल अपनी जगह है कि ऐसा क्यों होता है कि इतनी महान विभूति भी उस तरह के लोगों के शिकंजे में फंस जाती है.. जो महज अपने पिट्ठुओं की फौज लेकर चलते है और दूसरों के विश्वास का फायदा उठाकर अपने गधों को देशी घी का हलवा खिलाते हैं। शायद वो अतुल जी के जीवन की सबसे बडी भूल थी। लेकिन सुभाष गुप्ता ने सही तो लिखा है कि नुकसान उठाकर भी विश्वास करते रहने की उनकी भोली सोच थी, इससे उन्हें बहुत बडा सबक भी मिला है। बहरहाल, उडते हुए जहाज के पायलट बनने के लिए बहुत से लोग मौका ढूंढते रहते हैं। अब अमर उजाला को क्षितिज पर बने रहने के लिए बहुत भरोसे वाले और ईमानदार लोगों की जरूरत होगी।जिनकी उपलब्धी सिर्फ मीठी बातें करना हैं, वे लोग मैनैजमैंट को घेरने की पूरी कोशिश करेंगे। ये समय बहुत फूंक फूंक कर कदम रखने का है। पर विश्वास है कि राजुल माहेश्वरी हर परीक्षा में खरे उतरेंगे, उन्हें अच्छे बुरे लोगों की पहचान अवश्य होगी।
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written by maruti chatterjee, January 12, 2011
Kaash aisa patrkar har akhbar ko mile mere 38 saal ke carrior me shri Atulji dusre sakhsh hai isse pehal udaipur express ke shri Brijendra rehi ji ka namm vishesh roop se loonga
Maruti Chatterjee
Evening Post Jaipur
09928239745
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written by anil mishra, January 12, 2011
us samay shayad atul ji isse bhi achche the. lekin atul ji ko sachchi shraddhanjali tabhi hogi jab amar ujala safalta ki sediyan chadta rahe. wo tabhi sambhav hai jab unke bhai rajul ji baad mai aaye atul ji ke badlaav aur unse huye nuksaan ko imandari se samjhen. shashi shekhar ne rajneeti ke tahat purane logo ko nikala aur atul ji khamosh rahe.ye wo log the jinhone amar ujala ko apni jawani di, jindagi di, kaamyabi di. unke bachcho ka kya hoga, ye atul ji ne bhi nahi socha. un logo ko pareshan kar shashi shekhar ne amar ujala par apna ekchatra raj to bana liya magar amar ujala aur atul ji ko kya mila? amar ujala ko agarwals se rojana ki mukadmebaaji aur atul ji ko maut?
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written by lokesh, January 12, 2011
very very good

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