विनोद शर्मा के मीडिया हाउस से दूर रहें स्वाभिमानी पत्रकार!

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: ''नो वन किल्ड जेसिका'' के बहाने एक टिप्पणी : मीडिया के गले में पट्टा डाल घुमाने पर आमादा मनु का बाप : हरियाणा के एक कांग्रेसी मंत्री के पुत्र द्वारा की गई जेसिका की हत्या पर आधारित फिल्म 'नो वन किल्ड जेसिका' राजनेताओं द्वारा सत्ता व पैसे की ताकत के खुले दुरूपयोग की कहानी है। इस फिल्म में रानी मुखर्जी एक पत्रकार की भूमिका में हैं और स्टिंग के जरिए जेसिका कांड में न्यायालय द्वारा बेकसूर ठहराए गए अपराधी मनु शर्मा को एक बार फिर सलाखों के पीछे पहुंचा देती हैं। 'नो वन किल्ड जेसिका' हमारे सिस्टम पर करारा तमाचा है।

एक पैसे वाला बाप किस कदर अपने बेटे को बचाने के लिए ताकत का इस्तेमाल करता है, इसका जीवंत चित्रण इस फिल्म में बखूबी किया गया है। वास्तव में जेसिका हत्याकांड में तहलका की इनवेस्टीगेशन ने मीडिया की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित किया। एनडीटीवी द्वारा किया गया साहस मीडिया के गौरव को बढ़ाता प्रतीत हुआ। कहानी एक पत्रकार की जुबानी बुनी गई कत्ल की ऐसी निर्मम गाथा है जो हमारे देश के कानून व्यवस्था पुलिस प्रशासन व नेताओं की करनी की पोल खोलती है।

जनता की ताकत और मीडिया चाहे तो क्या नहीं कर सकता, का संदेश देती यह फिल्म वास्तव में झकझोर कर रख देती है। कहानी में सिर्फ इस घटना के दौरान गवाहों को डराने-धमकाने व खरीदने तथा मीडिया में मामला उछालने के घटनाक्रम का ही चित्रांकन किया गया है। फिल्म में उन संभावित तथ्यों को छूने का दुस्साहस नहीं किया गया है जो इस घटना के मूल कारक रहे। हालांकि इस बात के सबूत नहीं हैं किंतु शक की सूई न्यायपालिका की ओर भी घूमती है कि न्यायपालिका ने इस प्रकरण में पैसे व राजनैतिक दबाव का पूरा सम्मान किया और झूठे गवाहों के बूते एक खतरनाक कातिल को बरी कर दिया।

खिसियानी बिल्ली खंम्भा नोचे की तर्ज पर आज मनु शर्मा के पिता विनोद शर्मा मीडिया पर अपनी खीज उतार रहे हैं। इसके लिए उन्होंने बाकायदा मीडिया में पदार्पण किया। इंडिया न्यूज़ चैनल लांच किया और आज समाज दैनिक अखबार भी शुरू कर दिया। इंडिया न्यूज नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका भी लांच की गई ताकि ढोल की पोल खोलने का साहस रखने वाले मीडिया को ही कुत्ता बना कर रखा जा सके। किंतु मनु के पिताश्री यह भूल गए कि चंद चाटुकार मीडियाकर्मियों को तो संभवतः वे पैसे के बूते पर खरीद भी लें किंतु स्वाभिमानी मीडियाकर्मियों से वे पैसे के बूते एक शब्द अपने पक्ष में नहीं लिखा सकेंगे। माना कि देश भ्रष्टाचार में जकड़ चुका है किंतु आज भी देश के अधिकांश लोगों का स्वाभिमान जिंदा है। वे बिकाऊ नहीं हैं। स्वाभिमानी मीडिया कर्मियों को कलुषित मानसिकता से शुरू किए गए इन मीडिया माध्यमों से दूर रहना चाहिए।

कृष्ण चंद

चंडीगढ़


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