कब जेसिका के पास पहुंचा देंगे, पता नहीं

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चंद रोज पहले 12 जनवरी को मेरे एक लेख विनोद शर्मा के मीडिया हाउस से दूर रहें स्वाभिमानी पत्रकार पर कुछ स्वाभिमानी व कुछ कथित चाटुकारों ने अपनी-अपनी टिप्पणियां दी। मैं सर्व प्रथम इन तमाम टिप्पणियों का एक-एक कर जवाब देना चाहता हूं इसलिए नहीं कि टिप्पणी देना मेरी कोई मजबूरी है, बल्कि इसलिए कि पत्रकारिता का स्तर आज किस हद तक गिर चुका है, यह आकलन इन चंद टिप्पणियों से सहज लगाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त लेख के साथ दिए गए मेरे फोन नम्‍बर पर मुझे दो सौ से अधिक कॉल आई।

जाहिर है अधिकांश कॉल उक्त मीडिया समूह के चम्‍मचों की थी या फिर उन बेगैरत पत्रकारों की, जिन्हें पत्रकारिता या वेश्यावृति में कभी कोई फर्क नज़र नहीं आया या यूं कहें कि जिन्होंने पत्रकारिता की वेश्यावृति के लिए ही इस पेशे में कदम रखा है। मैंने सभी फोन कॉल्‍स का इत्मिनान से जवाब दिया कुछ मुझसे सहमत थे और कहीं नौकरी मिलते ही इस संस्थान को अलविदा कहने की बात करते थे, तो कुछ पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। कुछ प्रभु चावला, वीर सांघवी व बरखा दत्त की ओट लेकर खुद को सांत्वना दे रहे थे, तो कुछ कोई भी मीडिया दूध का धुला नहीं है का राग अलापते हुए खुद को तस्सली देते नज़र आए। कुछ ने ऐसा करने के लिए मुझे बुरा-भला कहा और यह लेख मुझे कितना मंहगा पड़ने वाला है, ऐसी धमकियां भी दी। मुझे प्राप्त हुई लगभग सभी कॉल्‍स की मैंने रिकार्डिंग की ताकि यदि महेश भट्ट कभी नो वन किल्ड जेसिका पार्ट टू के बारे विचार करें तो इन कॉल्‍स में से कुछ उल्लेखनीय काल्स का इस्तेमाल संभवतयः वे इस फिल्म के किसी दृश्‍य में कर सकें। खैर यह तो हुई फोन कॉल्‍स की बात। इसके बाद बारी आती है टिप्पणियों की जो मुझे भड़ास4मीडिया पर पढ़ने को मिली।

इन टिप्पणियों में पहली टिप्पणी लेख के समर्थन में है। टिप्पणीकर्ता ने लेख का समर्थन करते हुए उक्त चैनल में काम करने वालों के जमीर मरने की बात कही है। और चैनल मालिक को गलतफहमी का शिकार भी बताया है। टिप्पणीकर्ता का नाम नीरज है। सत्योदय ने अपनी टिप्पणी में संभवतयः सत्य उद्घाटन ही किया है कि काम काम होता है। उनका कहना है कि इंडिया न्यूज़ में काम करना स्वाभिमान की कसौटी नहीं है। भाई अपने दिल पर हाथ रख कर निर्णय लो। मुझे जो लगा वह मेरी व्यक्तिगत राय है, उन पत्रकार भाईयों के लिए जो मेरी समान विचारधारा के हैं। आपको यदि वास्तव में ऐसा ही लगता है जैसा आप लिख रहे हैं, तो एक बार यह फिल्म गौर से देखना और जेसिका के घर के किसी सदस्य के रूप में खुद को खड़ा कर लेना। बुरा मत मानना छोटा सा प्रयोग सही। फिर अपनी राय पर गौर करना, मुझे बताने के लिए नहीं ना ही मुझसे बहस करने के लिए, बस अपने ज़मीर को जगाने के लिए। और ज़मीर जागे तो उस परमात्मा को धन्यवाद करना जिसने तुम्हारा ज़मीर जगाने के लिए इतना आयोजन किया।

अंकुर सक्सेना जी लिखते हैं कि क्या राहुल देव, मनोहर नायक या राजीव पाण्डेय जी जैसे लोग स्वाभिमानी नहीं हैं। अंकुर जी आपने कभी महाभारत पढ़ी हो तो आपको समझना आसान होगा कि कौरवों की सेना में दर्जन भर ऐसे स्वाभिमानी लोग मौजूद थे, जो कभी भी दिल से कौरवों के साथ नहीं थे किंतु उन्हें अंत तक लड़ना पड़ा कौरवों की ओर से, क्यूं जरा सोचो। संभवतयः तुम्हारा जवाब तुम्हें मिल जाए। मंसूर नकवी जी आप ठीक कह रहे हैं रोटी का वास्ता देकर तो आप कुछ भी करें, वह संभवतयः आपको पाप न लगेगा। किंतु सिर्फ एक बार आप सच्चे हृदय से अल्‍लाह ताला से पूछकर तो देखिए क्या वह आपके तर्क से राजी हैं। यदि नहीं तो आप उसी से अपने चूल्हा जलाने के लिए फरियाद करें क्योंकि मैं आप तक इन शब्दों को पहुंचा पाऊं यह अक्ल भी तो उसी ने मुझे बख्शी है जो आप तक यह तमाम जवाब पहुंचा रहा हूं।

विरेंद्र जी की टिप्पणी है कि मीडिया में हैं तो स्वाभिमान की जरूरत ही क्या है। जैसे मीडिया वर्कर वैसे सेक्स वर्कर। भाई विरेंद्र जी आपकी टिप्पणी वह कड़वा सच है, जो सटीकता से मीडिया की आज की स्थिति को बयां करता है। और हम सब मीडियाकर्मी इस निर्लज्जता पर फर्क कर रहे हैं। मुझे मिल रही अधिकांश टिप्पणियां तो इसी ओर संकेत कर रही हैं। अगली टिप्पणी अर्जुन थापा जी की है। अर्जुन जी पत्रकार का स्वाभिमान उसके आचरण से होता है चैनल से नहीं। आप ठीक कहते हैं किंतु जिस चैनल की बुनियाद ही गलत आचरण को ठीक साबित करने के लिए डाली गई हो, उसमें रह कर क्या आप अपना आचरण ठीक रख पाएंगे। यदि अभी तक ठीक रख पाए हैं तो अपने दिल से पूछिए आप वास्तव में बधाई के पात्र हैं।

आगे रामजी की टिप्पणी है कि इस चैनल का काम भी औरों की तरह सिर्फ पैसा कमाना है। यह चैनल मनु शर्मा के केस में सिर्फ मालिकों का पक्ष रखता है। ईमानदार टिप्पणी है। टिप्पणीकर्ता का कहना है कि अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा। भाई क्षमा करें। गड़े मुर्दे मैंने नहीं महेश भट्ट ने उखाड़े हैं, मैं तो सिर्फ मुर्दों के हालात बयां कर रहा हूं। धमकियां इतनी आ रही है कि कब जेसिका के पास पहुंच जाऊं पता नहीं। जो लोग एक पैग के लिए किसी को मौत के घाट उतार देते हैं मैंने तो उनकी छाती पर कबड्डी खेली है।

अगली टिप्पणी में संदीप जी का कहना है कि चैनल वाले प्रोफइल देख कर खबर चलाते हैं। संदीप जी सही बात है तभी तो यह खबरें दबा दी गई थी, वह तो भला हो तहलका वालों का जिन्होंने स्टिंग किया और सच्चाई जनता के सामने आई। एनडीटीवी ने पहल कर इसे जनता को दिखाया यह उत्कृष्‍ट मीडिया का उदाहरण है। विशाल जी की तल्ख टिप्पणी इस लेख के पक्ष में थी जिसे मंसूर नकवी जी ने संभवतयः पर्सनल लेकर उसका जवाब इसी अंदाज में दिया है। मैं सभी टिप्पणीकर्ताओं का दिल की गहराईयों से आभार व्यक्त करता हूं, साथ ही मुझे मोबाल के माध्यम से संपर्क करने वाले सज्जनों का भी मैं शुक्रगुजार हूं। धमकी भरे फोन काल्स की सूची मैं जल्द ही चंडीगढ़ के पुलिस अधिकारियों को सौंपने जा रहा हूं ताकि मुझे जेसिका के पास पहुंचाने के लिए उत्सुक लोगों की खिदमत के लिए भाविष्य में यह तथ्य काम आएं। धन्यवाद।

कृष्‍ण चंद

चंडीगढ़


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