टोरेंटो से एक खूबसूरत पत्र, ग़ालिब साहब के बहाने

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आजकल मैं हवा में उड़ रहा हूं. कभी कनाडा से पचास डालर की मदद भड़ास के लिए, तो अगले ही पल टोरंटो से मिर्जा ग़ालिब साहब के बहाने एक खूबसूरत पत्र, मेरे नाम. कभी बनारस स्थित काशी विद्यापीठ में मुख्य वक्ता की हैसियत से संबोधन तो कभी पटना में भाजपा नेता सुशील मोदी के हाथों मोमेंटो न लेकर वाहवाही पाने की अनियोजित परिघटना. कभी गली में निकलते ही अचानक किसी का हाथ उठाकर प्रणाम करते हुए बोलना कि सर आप भड़ास वाले हैं ना....

तो कभी रात में ज्यादा पीकर लगातार कई घंटे रोना और फलस्वरूप भारी राहत महसूस करना. तो कभी दिन में अकेले ड्राइविंग करते हुए लगातार चिल्ला चिल्लाकर गाना... छोटा सा तू, कितने बड़े अरमान हैं तेरे, मिट्टी का तन सोने के सामान हैं तेरे... ये पाप की नैया तुम्हें जिस दिन डुबायेगी.... और गाते ही रहना तो कभी किसी वीरान में घुसकर घंटों पेड़-पौधों और बनस्पतियों को निहारना, घूरना और उनसे मौन बातचीत करते हुए मुस्कराना. कभी एक अदभुत उदात्त मानवीय धर्म (आजकल धर्म बोलना भी अधर्म सा लगता है, धार्मिकों ने ऐसा कर दिया है) की परिकल्पना करते हुए उस पर काम करने की मंशा पालना तो कभी सब कुछ जान बूझ चुके होने के कारण घर-बार छोड़कर कहीं निकल लेने का जी करना, तो कभी पत्नी का यह कहना कि उसकी जीन्स पहनने की इच्छा पूरी नहीं हुई है सो उन्हें जीन्स पहनाकर नैनीताल में घुमाना तो कभी बच्चों को आठ दस साल की उम्र में ही कार चलाना सिखाकर उनमें सीखने के प्रति उत्कट इच्छा भरना...

कभी कंप्यूटर लैपटाप बंद कर एक-दो दिनों तक यूं ही दारू पीकर दिन-रात दिल्ली के मालों व झुग्गियों में घूमना-भटकना और किन्हीं अपरिचित फटेहाल शराबियों के गले लगकर रोना-गाना तो कभी एक चरम चतुर दुनियादार की तरह पत्रकारिता से राजनीति में जाकर सोने की लंका के सृजन का भाव-आवेग उपजना, कभी कट्टा उठाकर कुछ किंतु परंतु लेकिन टाइप लोगों को ठोकने की मंशा पालना तो कभी गौतम बुद्ध की तरह चुपचाप सब त्यागकर उस अंतिम सच को जानने के लिए निकल पड़ने की इच्छा होना जिसकी तलाश में कई सौ सदियां शहीद हो चुकी हैं पर अंतिम सत्य की परिभाषा हर एक सदी के बाद बदल-सी जाती है और हमारे जन फिर सच झूठ के दर्शन दर्पण में फंसकर मरते-जीते रहते हैं- बेहद हताश और विक्षिप्त खुशियों के साथ.

कभी बदले हुए दौर में क्रांति के नए तौर-तरीके, हथियारों, फार्मेट के बारे में शोध करने की इच्छा होना तो कभी मार्क्स और अध्यात्म के मिक्सचर के जरिए एक ऐसे वैचारिक रसायन के इजाद का मन होना जिससे फंसी हुई, कराहती हुई सभ्यताओं के दुखों को छूमंतर किया जा सके तो कभी परम कामी मनुष्य की माफिक किसी दिल-दिमाग से सुंदर बाला के साथ रोमांस और सेक्स की इच्छा का घनीभूत होना. कभी सुंदर संगीत की श्रृंखलाओं के जरिए मनुष्य को दुखों-अवसादों से पार ले जाने की योजना बनाना, गाते-गुनगुनाते....

जाने कितने अरमान हैं मेरे .... तभी तो लगने लगा है, लगता है कि अब मैं हो रहा हूं जवान.... इससे पहले तो जिंदगी व मानवता की पाठशाला का ट्रेनी था, फिर प्राइमरी व मिडिल के बाद हाईस्कूल व इंटर पहुंचा और अब ग्रेजुएट होकर कालेज से मुक्त हो सका हूं, अपनी जिंदगी जीने.. प्यार करने, गाने, पाने.... प्यार करने, रचने.... झूमने-नाचने.... नचाने और गवाने... सबको.... सो, जाने कितनी कामनाएं हैं, अरमान हैं, और सबको किस करता हुआ, चूमता हुआ, गले लगाता हुआ, इन्हें भरपूर जी लेने व पा लेने का नारा लगाते हुए भागा जा रहा हूं सरपट, उस सड़क की ओर जो कुछ दूर बाद ही धरती-आकाश के मिलन बिंदु में दाखिल हुई जाती है.

मिर्जा साहब के शब्दों में-- हजारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले...

अनंत इच्छाओं, वासनाओं, कामनाओं, महत्वाकांक्षाओं से लैस मैं जब सुबह धीरे-धीरे कंबल-रजाई में नींद खुलते हुए अपने दिमाग को सोचने-समझने लायक पाता हूं तो पहले एक अजीब उदासी से भर जाता हूं, क्यों खुल रही है नींद, क्यों जग रहा हूं मैं, फिर शुरु हो जाएंगे जीवन के वे सब चिरकुट कारोबार जिन्हें रोज करता हूं और रोज-रोज दुखी होता हूं, रोज-रोज मोहभंग होता है और रोज-रोज नया कुछ न कर पाने की पीड़ा से बोझिल होकर एक अमूर्त और प्लैटोनिक दुनिया की यात्रा पर मयखाने में लगी सीढ़ियों के माध्यम से निकल पड़ता हूं, और उस मनोरंजक-एडवेंचरस यात्रा का अंत मेरी उस खुलती हुई नींद के जरिए होता है जिसके माध्यम से मैं पुनः इस बोझिल दुनिया में प्रवेश कर रहा होता हूं.

काश, खुलती हुई नींद के जरिए शुरू होने वाली यात्रा भी उतनी ही मजेदार व मुक्तकामी होती जितनी मयखाने की सीढ़ियों के माध्यम से किसी और दुनिया में प्रविष्टने से प्रारंभ होती है और इस प्रवेश के माध्यम से इंद्रियजन्य सुखों को जी कर-भोग कर और एतदद्वारा इंद्रियजन्य जरूरतों-कुंठाओं से बहुत देर-दिनों के लिए मुक्त होकर सहजता-संतई की चरमावस्था प्राप्त होती है. और, यह क्रम जारी रहने से कई बार सहजता-संतई बिना कुछ किए शरीर-मन में महसूस होने लगती है जैसे बिना पिए कई बार खुद को नशे में होने का एहसास होने लगता है, पीते-पीते जीते रहने के कारण.

यूं कहें कि एक नई छत खड़ी नजर आती है, बिना बल्लियों-खंभों के सहारे, दिनों बाद बैसाखियों से मुक्त होकर. बैसाखियों की अपनी महत्ता है, एक लंबी छलांग के लिए, एक नई छत के निर्माण के लिए, एक नई झोपड़ी के उठान के लिए... पर बैसाखियां ही जिंदगी है, ये पागलपन जीना ठीक नहीं और जब आप जान जाएं कि ये पागलपन जी रहे हैं आप, और फिर भी इसे जीते रहें तो आप से बड़ा पागल कौन. पर, लगे रहो पगलों, अच्छे लोगों ने तो दुनिया को पागलखाना बना रखा है, शायद ये पागल ही मर्ज की दवा तलाश पाएं.

लिखना था क्या, लिखता क्या चला गया. जो बूझे सो निहाल, सतश्री अकाल....

टोरंटो से अपने वरिष्ठ साथी कृष्णा के इस प्यारे पत्र को पढ़िए. आज तो मेरे लिए यही पत्र वो ऊर्जा है जिसके सहारे कई दिनों तक रोमांचित रह सकता हूं. इसलिए नहीं कि मेरे नाम है, व मेरे काम की तारीफ है, इसलिए कि दिन की शुरुआत में किसी बढ़िया अजनबी से मुलाकात हो जाए, चाहे सशरीर या चाहे पत्र के जरिए, वो आह्लादित तो करता ही है. हम छोटी-छोटी चीजों में खुशियां तलाशने वाले लोग इन छोटी-छोटी घटनाओं से अपने इर्द-गिर्द ऊर्जा का वर्तुल चक्र बना लेते हैं और इस ईंधन के जरिए हम संसाधनहीन जिंदगी की गाड़ी को तूफानी गति से दौड़ा ले जाते हैं....

जय हो.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपर्क - This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it


Dear Yashwant Singhji

A friend sent me your labor of love about Mirza Ghalib.  First of all I want to profusely thank you for the effort. When I was younger, (now this goes back to 1957) I would ask my grand father about meaning of certain She'r of Ghalib.  He would explain, but before that he'd say read Ghalib's Farsi poetry.  I of course did not know Urdu let alone Farsi.  He knew Farsi, Arabic, Urdu, Sanskrit, and of course English and Hindi.

My interest in Ghalib was aroused by reading in Hindi with the meanings written on the bottom of the page, as probably most non-Urdu people do.  Then later in life, I came across two very important books on Ghalib.  One is in English, Interpretations of Ghalib, author J. L. Kaul.  It is, as the title suggests not a translation, but a wonderful interpretation in free verse.  the second is Mirza Ghalib by Ali Sardar Jafri.  I recommend this to everyone who wants to learn about poetry of Ghalib.  Its a massive work of very superior quality.  You probably already know about it.

Next, I'd share, that when I was in Toronto, one Hifzul Kabir Querishi, a Linguist, and a Litterateur, and I formed Ghalib Study Circle.  We would meet every Wednesday evening and read one Ghazal, delving ito its literal and in-depth nuances, which was followed by tea and halwa at the end, courtesy Mrs Qureshi.  Our group numbered upto ten people.  Then other members expressed to have meetings rotated at their residence.  This went on until we reached nearly the end of the Diwan.   Members also brought their own creations that did not escape rigorous critiquing.

I have read poetry in several languages translated as well, but nothing comes near Ghalib's. Poetry of Tennyson, Keats,  Byron, Wordsworth, Shakespeare, all the way to Ezra Pound, Pablo Neruda and later, is poetry of observation of nature, human condition and human behavior, reaction to oppression dominated by overt sexual and violent depiction of human behavior.  Ghalib's poetry is far above, into depths of human condition and not behavior.

I have now come to this conclusion that: What a Human experiences in the course of his existence, the complexity of his feelings, the inner struggles, can Only be the subject of Art, whether it is depicted through poetry, drama, sculpture, prose, frescoe, painting or any other medium.  Now, what the Human does in reaction to his experiences, takes a gun and kills himself or kills others, or maims others, or deprives others, or starves, may be explained with whatever justification suits the action and reaction But it is not and can not be a subject matter for Art.  Cannot be called Art.  I have arrived at this after studying Ghalib's poetry that is so precise, subtle and yet obvious in this regard.

Ghalib regards Majnoo as greater aashiq than Farhad:

Juz Qais Aur Koi Na Aaya Baru-e-kaar
Sahra Magar Batangi-e-Chash-e-Husood Tha

Here, of course, Ghalib alludes to having not enough room for any other aashiq in the jungle, like the envious eye (Hasad ki Aankh) being narrow.  Then he follows with this Makta to end the Ghazal.

Teeshe Baghair Mar Na Saka Kohkan 'Asad'
Sar Gashti-e-Khumaare Rasoom-o-Qayood tha

I am sorry to have taken your time but I must say that your write up inspired me, and took me into the last 50+ years of my fascination with Ghalib's poetry.

Please keep generating interest in Ghalib.  You must know that Ghalib's letters are also on the internet in audio as well.

Thanks and Good Work
regards,

Krishna


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Comments (3)Add Comment
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written by madan kumar tiwary, January 22, 2011
शहजादी को गले लगाने के लिये तैयार रहना है गुरु । आजकल मुझे भी शह्जादी खुब नचाती है , खासकर जब पीने बैठता हूं ।
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written by राजीव शर्मा, January 22, 2011
यशवंत जी आपने तो कबीर को बहुत पढ़ा और जाना और जिया है, फिर भी भावुकता वश कुछ दोहे भेज रहा हूं...

1- माटी कहे कुम्हार से तू क्या रूंधे मोय, एक दिन ऐसा आएगा मैं रूंधुंगी तोय।।
2- पानी केरा बुलबुला अस मानस की जात, देखत ही छुप जाएगा ज्यों जागत प्रभात।।
3- साहिब तेरी साहिबी सब घट रही समाय, ज्यों मेंहदीं के पात में लाली रखी न जाए
4- आए हैं तो जाएंगे राजा रंक फकीर, इक सिंहासन चढ़ि चले इक बंधे जंजीर
और अंत में
5- राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय, जो सुख साधु संग में सो बैकुण्ठ न होय।।
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written by sikanderhayat, January 22, 2011
or to sab tik ha lakin sharab to chod hi do bhai aap jese logo ka jinda rehna vo bi badia health k 7 bahut jaruri ha

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