दान खातिर कपड़े उतार देह दर्शाने का दर्शन

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: 'मां-बेटे वाला प्यार या रोमांस!' पर एक टिप्पणी : जरूरी नहीं कि सिर्फ आंखों देखी ही हकीकत हो... : शुरुआत महात्मा गांधी जी से, बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो और बुरा मत सुनो। बहुत आसान सी लेकिन उतनी ही गूढ़ बात। कैसे? कभी-कभी इंसान के सामने ऐसी घटनाएं या चीजें होती हैं कि वो उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। यह भावनात्मक, शारीरिक या बौद्धिक रूप उस पर अपना प्रभाव जमाता है और इसका नतीजा अमुक घटना के बाद के उसके कर्मों पर दिखाई पड़ता है।

इसलिए जो भी बुरा है उसे देखो मत, यदि देख लो तो सुनो मत और यदि सुन भी लो तो बोलो मत। यानी अपनी आंखों, कानों और मुंह का किसी बुरी बात के लिए इस्तेमाल बेहद ही गलत है। अब बात ओशो की। महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, दलाई लामा जैसी शख्सियतों को गरियाने वाले ओशो के मुताबिक इन जैसे लोगों ने इंसान के विकास को अवरुद्ध कर दिया। बकौल ओशो इंसान एक स्वतंत्र प्राणी है। इंसान के दिमाग पर समय, किताबें, समाज, संस्कृति, अनुभव आदि बातें प्रभाव डालती हैं और वे उनके अनुरूप अपने कार्मिक प्रदर्शन करता है। दुनिया का कितना भी विद्धान व्यक्ति हो लेकिन मानव मन एक सा ही होता है। हर व्यक्ति का दिमाग उसे सही गलत की राह दिखाता है। लेकिन दिल तो बच्चा है जी की तर्ज पर मन बिल्कुल स्वतंत्र आकाश में भ्रमणशील रहता है।

परिणामस्वरूप मन कब किस बात के लिए हां करे और न करे कुछ नहीं कहा जा सकता। मन से हर व्यक्ति सच्चा होता है फिर चाहे वो एक हत्यारा हो या एक संत। लेकिन अलग-अलग समय पर पैदा हुए विभिन्न नेतृत्वकर्ताओं ने लोगों को अंधविश्वासी, पीछे चलने वाले और अपने मन को मारकर केवल नकल करते हुए एक ही राह पर चलने को विवश किया। लोगों का पूर्ण विकास नहीं हुआ। हर व्यक्ति ने अपनी इच्छाएं दबाकर भीड़ के पीछे चलने का रवैया अपना लिया। लेकिन इससे सबसे बड़ा नुक्सान यह हुआ कि एक व्यक्ति जिसमें अदम्य क्षमता थी वो भी नपुंसक की भांति हो चला।

शायद प्रस्तावना लंबा लगे पर बहुत जरूरी था। कुछ के लिए गांधी अच्छे होंगे तो कुछ के लिए ओशो। सोच के मुताबिक व्यक्ति की गलत-सही बातों में फर्क करने का माद्दा अपेक्षाकृत सभी में कम ही मिलेगा। भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत के लेख इसे मां बेटे का पवित्र प्यार कहेंगे या रोमांस  पर तमाम व्यक्तियों, महानुभावों, वरिष्ठों, कनिष्ठों की टिप्पणी देखी। आश्चर्य हुआ कि मीडिया के अधिकांश व्यक्ति अभी भी पूर्वाभास और अंधेपन से ग्रसित हैं। भड़ास की शुरुआत के बाद से आजतक किसी भी पाठक ने इस पोर्टल पर इस तरह का पोस्ट नहीं देखा। शायद किसी ने इस वजह पर ध्यान ही नहीं दिया। फिर आज यशवंत को इस तरह का लेख और फोटो प्रकाशित करने की जरूरत क्यों पड़ गई? यह विचारयोग्य है।

यशवंत भी एक इंसान है और उसके भी कई पहलू हैं। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर की प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया पर नजर रखने वाले व्यक्ति के सामने से इस तरह का समाचार यूं ही चला जाता, संभव नहीं था। नोज फॉर न्यूज, न्यूज सेंस, एथिक्स और राइट टाइम टू स्ट्राइक द टारगेट  के तमाम उदाहरण पूर्व में दे चुके यशवंत पारदर्शी बनने की राह पर हैं। यानी जो दिल में है वो सामने आना चाहिए। इसके लिए साहसी और जुनूनी होना जरूरी है। फिर चाहें इनका भिखारी बनने का शगल हो, दारू-दर्द की कथा हो, बकचोदी की बात हो या फिर देश के तगड़े मीडिया घरानों के खिलाफ दबंगई के लेख हों।

ऐसे में मां-बेटे के इन चित्रों और कहानियों के बारे में ये न लिखते असंभव सा दिखता है। पर उन्होंने पोस्ट की हेडलाइन में ही प्रश्नचिन्ह खड़ा किया हालांकि प्रश्नसूचक लगाना शायद भूल गए। लेख में उन्होंने हरसंभव जानकारी, मां-बेटे का इतिहास-भूगोल और पूरी सूचना देकर इसका वो आयाम दिखाया जो सिर्फ चित्रों को देखने के बाद शायद केवल एक या दो फीसदी लोगों के ही मन में आया होगा।

यानी सिर्फ आंखों देखी ही हकीकत नहीं होती बल्कि इसका दायरा और बड़ा होता है। कभी कुछ देखने के बाद उसपर विचार करना बहुत ज्यादा जरूरी हो जाता है। यदि भड़ास को अपने हिट्स ही बढ़ाने होते तो न जाने लाखों पोर्नोग्रॉफिक वेबसाइट से कंटेंट लेकर रेगुलर अपडेट्स देते न कि इतने सालों में केवल इस तरह का एक पोस्ट करते। टिप्पणी देने वालों ने केवल वही देखा, वही समझा और वही सोचा जो एक आम आदमी करता। लेकिन इसमें पत्रकारिता का दृष्टिकोण, सोच और समझ नहीं दिखी। न ही टिप्पणी दाताओं ने आलोचना से पूर्व महसूस किया कि यदि इस वेबसाइट पर कुछ ऐसा, अलग और पहली बार पोस्ट हुआ है तो उसकी क्या वजह होगी?

मेरे मित्रों यदि हकीकत में आप पत्रकार हैं तो किसी भी चीज पर लिखने से पहले उसके हर आयाम से वाकिफ होना सीखें। अपने कलम से कुछ भी लिखना बहुत आसान है लेकिन कमाल का और कमल सा लिखना बहुत मुश्किल। कलम के सिपाही की कलम अगर यूं ही एक आयाम देखकर चलने लगी तो आने वाला वक्त पत्रकारिता के लिए बहुत ही संकटग्रस्त होने वाला है।

हां एक बात और...चूंकि यह तस्वीर पश्चिमी देश की है इसलिए एक बात कहना चाहूंगा। हमारे भारत में और वहां की सभ्यता में बहुत अंतर है। हॉलीवुड अदाकारा एंजेलिना जॉली, केट विंसलेट, मडोना, ब्रिटनी के अलावा प्रसिद्ध मॉडल सिंडी क्रॉफोर्ड, नाओमी कैंपबेल, कार्ला ब्रूनी आदि ने केवल चैरिटी (दान) के लिए तमाम मैग्जीनों के कवर पर अपनी नग्न तस्वीर प्रकाशित करवाई। जिसके एवज में मिले लाखों-करोड़ों डॉलर को उन्होंने दान में दे दिया। अभी हाल ही में मशहूर और भूतपूर्व टेनिस चैंपियन आंद्रे अगासी ने अपनी खूबसूरत और पूर्व चैंपियन टेनिस खिलाड़ी स्टेफी ग्राफ की नग्न तस्वीर को एक मैग्जीन के कवर पेज पर प्रकाशित कर उससे मिलने वाली रकम को चैरिटी में दान करने की हामी भरी।

इन सबमें एक बात गौर फरमाने वाली है कि यह हस्तियां भी बाल बच्चे वाली हैं और इनकी यह नग्न तस्वीरें उनके बच्चे-रिश्तेदार भी देखते हैं। लेकिन वे इसका वो मतलब नहीं निकालते जो हम हिंदुस्तानी निकालते हैं। हमारे देश में नग्न या अर्धनग्न महिला या उसकी तस्वीर का सीधा सा मतलब सेक्स से जोड़ा जाता है, जिसमें गलती हमारी नहीं बल्कि हमें मिले उसे अर्धज्ञान की है जिसने हमारी आंखों पर एक पट्टी बांध रखी है। इसलिए हमारी सोच का दायरा सीमित हो गया है। मेरा कहना है कि सोच और समझ को विकसित करें। चीजों को सिर्फ एक ही दृष्टिकोण से न देखें और न सोचें।

कुमार हिंदुस्तानी

एक पत्रकार

ग्रेटर नोएडा

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