अब तो सुशील पाठक की मौत पर भी तमाशा

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सत्‍य प्रकाशपत्रकार स्वर्गीय सुशील पाठक की मौत के बहाने काफी कुछ कहा और सुना जा रहा है... हत्या के बाद पुलिस कातिलों और कत्ल में प्रयुक्त हथियार की तलाश एक महीने बाद तक नही कर सकी है... पुलिस की जांच कई दिशाओं में हुई लेकिन अहम सुराग हाथ नही लगे... कोशिशें जारी हैं और पत्रकार भी पुलिस की जांच रिपोर्ट आने का इन्तजार कर रहे हैं... इन सब के बीच सुशील की मौत पर स्यापा जारी है... मौत पर राजनीति या फिर राजनीति के लिए मौत का बहाना तलाशने वालों के कंठ इन दिनों कुछ ज्यादा मुखर हैं... पत्रकार की मौत पर कुछ पत्रकार ही ज्यादा लिख और बोल रहे हैं...

जो जिन्दा इंसान (पत्रकार) के मुँह पर कुछ नही बोल सके वो मौत के बाद सुशील की व्यक्तिगत जिन्दगी के पन्नों को खंगाल रहे हैं... जो बोल रहे हैं वो इशारों की भाषा समझते हैं... एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपनी वेब साइट पर सुशील की मौत और कत्ल से जुड़े कई मामलों को लिखा, उस लेख के आखिरी में प्रेस क्लब के सचिव और पत्रकार स्वर्गीय सुशील पाठक को श्रद्धांजलि भी दी गई... इसे पढ़ने वाले कुछ कथित पत्रकारों ने अपना मत भी व्यक्त किया... एक ने तो लिख दिया कि सुशील की मौत का कफ़न 1998 में ही तय हो गया था... मतलब वो कथित पत्रकार जानता है कि क़त्ल क्यों और किसने किया है...? क्योंकि जितने आत्मविश्वास से लिखा गया है, वो पुलिस को क़त्ल की गुत्‍थी सुलझाने की दिशा में काफी हद तक मदद कर सकता है... पुलिस ने बात सामने आने पर उस कथित कलमकार को थाने ले जाकर पूछताछ की है, जरुरत पड़ने पर और पूछताछ की जाएगी...

सवाल ये खड़ा होता है कि क्या उन लोगों को सुशील के क़त्ल से जुड़े अहम तार का पता तो नही है..? क्या ये लोग जानते हैं कि सुशील की हत्या किसने और क्यों की है? क्योंकि जितना इन लोगों ने कहा है या एसएमएस के जरिये कह रहे हैं, उससे जाहिर है उन्हें काफी कुछ पता है... पत्रकारिता की आड़ में राजनीतिक बिसात पर शह-मात का खेल खेलने वालों ने मौत को जरिया बनाया, ये ज्यादा दुःख की बात है... अरे मौत पर स्यापा करने वाले वो लोग हैं जिन्हें सुशील को श्रद्धांजलि देने का वक्त तक नही मिला... ये वही लोग हैं जिन्हें धरना स्थल पर आकर बैठने में शर्म महसूस हुई... जब शहर का आवाम, पत्रकार कातिलों को गिरफ्तार करने और अमन-चैन के लिए नेहरू चौक पर गला फाड़ रहा था तो ये कथित पत्रकार कहाँ थे...?

अरे सुशील की मौत के बहाने स्यापा करने वालों... कुछ तो सोचा होता, लोग क्या कहेंगे..? जिनके दामन कई दागों से रंगे हैं वो दूसरों के दाग खोजने निकले हैं... जो कहीं और कुछ नहीं है वो कमेंट्स के जरिये अपनी नीयत, नापाक इरादों को सार्वजनिक कर रहे हैं... खैर मुझे इस बात से बहुत ज्यादा इत्तेफाक नहीं है कि वो लोग क्या कर रहे हैं, क्योंकि जो कुछ नहीं है उनके बारे में सोच कर क्यों अपना वक्त जाया करूँ...

मुझे कुछ कहने या लिखने की जरुरत सिर्फ इसलिए महसूस हुई क्योंकि अब तो लोग मौत पर भी तमाशा खड़ा किये हुए है.. "गिलहरी और अखरोट के किस्से'', कहीं "सुशील" और ना जाने क्या-क्या.. "एक सियार को कहीं से अखरोट की थैला मिल गया. उसने गिलहरियों से कहा कि तुम लोग यदि मेरी सेवा करोगे तो तुम्हें मैं अखरोट से भरा ये थैला दे दूंगा. गिलहरियां मन लगा कर सियार की सेवा करने लगीं. इस उमीद में साल दर साल बीतते गये. जब गिलहरियां बुढ्ढी हो गईं तो सियार ने अखरोट का थैला उन्हे दिया, लेकिन तब तक गिलहरियों के दांत टूट चुके थे. यह कहानी छत्‍तीसगढ़ के बिलासपुर के एक पत्रकार ने सुनी और कहा- अच्छा तो गिलहरियां हम हैं और प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति के प्लाट अखरोट हैं तो फिर सियार....? सारी सुशील".

इन किस्से कहानियों,  एसएमएस को कुछ ख़ास लोग मोबाइल के जरिये फैला रहे हैं... उन लोगों को अभी गिलहरी और अखरोट में खूब मजा आ रहा है... हंसी-ख़ुशी के बीच सुशील की मौत पर दंगल लड़ने वालों की जमात अलग भी है और काफी कमजोर भी, तभी तो मौत के बहाने स्यापा करने वाले जानबूझकर वो हरकत कर रहे हैं, जो मानवीयता को शोभा नही देती.

यह लेख सत्‍य प्रकाश पाण्‍डेय के ब्‍लॉग कुछ आपकी, कुछ हमारी से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.


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