राष्‍ट्रीय क्षितिज पर बेअसर हैं हिंदी अखबार

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प्रमोद जोशी1983 में राजेन्द्र माथुर ने टाइम्स ऑफ इंडिया में हिन्दी के दैनिक अखबारों की पत्रकारिता पर तीन लेखों की सीरीज़ में इस बात पर ज़ोर दिया था कि हिन्दी के पत्रकार को हिन्दी के शिखर राजनेता की संगत उस तरह नहीं मिली थी, जिस तरह की वैचारिक संगत बंगाल के या दूसरी अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों-पत्रकारों को मिली थी। आज़ादी से पहले या उसके बाद प्रेमचंद, गणेश शंकर विद्यार्थी या राहुल बारपुते को नेहरू जी की संगत नहीं मिली।

हिन्दी पत्रकारिता के राजनैतिक-सामाजिक असर पर विश्लेषण करते वक्त आगे बढ़ते ही हम पाते हैं कि आज़ादी के बाद हिन्दी अखबारों का विकास प्रादेशिक सरकारों और प्रादेशिक राजनेताओं के गठजोड़ से ही सम्भव हो पाया। माथुर जी ने राहुल बारपुते के बारे में हंस में प्रकाशित अपने लेख में मध्य प्रदेश में लाभचंद छजलानी के असर के बारे में भी लिखा। इसके अलावा हम राजस्थान में कर्पूर चंद कुलिश, उत्तर प्रदेश में नरेन्द्र मोहन जी और डोरी लाल अग्रवाल या पंजाब में लाला जगत नारायण के प्रभाव से परिचित हैं। बावजूद इसके हिन्दी का कोई अखबार केन्द्रीय सरकार नेताओं पर असर डालने लायक नहीं है।

मेरा आशय यह नहीं कि हिन्दी के अखबारों का सामाजिक प्रभाव नहीं है। अपने इलाकों में हिन्दी के अखबार बेहद ताकतवर हैं। सरकारों, राजनेताओं और जनता तीनों के बीच। पर केवल प्रादेशिक मामलों में, राष्ट्रीय क्षितिज पर नहीं। राष्ट्रीय क्षितिज पर अंग्रेजी के अखबार ही प्रभावशाली थे। देश के प्रधानमंत्रियों में अटल बिहारी वाजपेयी और एक हद तक वीपी सिंह का हिन्दी पत्रकारों से सीधा संवाद था। चौधरी चरण सिंह और चन्द्रशेखर को ज्यादा समय नहीं मिला। कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों में नेहरू जी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और मनमोहन सिंह के मुकाबले नरसिंह राव हिन्दी के वैचारिक क्षितिज के ज्यादा करीब थे।

बहरहाल इस वक्त पत्रकार या सम्पादक की परिभाषा बदल रही है। कारोबारी पक्ष इतना हावी है कि सम्पादक के स्थान पर बैठा व्यक्ति अपने आप को ज्यादा से ज्यादा मैनेजर के रूप में सफल साबित करने को उतावला है। और मैनेजर उसका यानी सम्पादक का काम करना चाहते हैं। अखबारों की सामाजिक-राजनैतिक दृष्टि उनके सम्पादकीय पेजों और लिखे गए सम्पादकीयों में पढ़ी जा सकती है। हिन्दी-अखबारों की दृष्टि का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए। कभी समय मिला तो यह काम मैं करूँगा।

इस पोस्ट को लिखने का संदर्भ-बिन्दु सुनन्दा के दत्ता-राय का टेलीग्राफ में छपा लेख है, जिसकी कतरन मैं नीचे लगा रहा हूँ। इस लेख में चीन के राष्ट्रपति हू जिनताओ की अमेरिका यात्रा का संदर्भ है। साथ ही हाल में चीनी प्रधानमंत्री जियाओबाओ की यात्रा का हवाला है। जियाओबाओ ने भारत आकर भारतीय मीडिया पर सनसनीखेज होने का आरोप लगाया था। इसके विपरीत अमेरिका में चीनी राष्ट्रपति अमेरिकी मीडिया से दबे रहे।

सुनन्दा के दत्ता-राय भारत के अंग्रेजी अखबारों और पत्रकारों की प्रभावहीनता का जिक्र कर रहे हैं। अमेरिका में आज भी पत्रकार का असर कम नहीं है। न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट और वॉलस्ट्रीट जर्नल के कॉलम और अग्रलेख अपना असर रखते हैं। वैसा असर हमारे मीडिया का नहीं है। एक उभरते और नई शक्ल लेते देश के लिए यह अच्छी बात नहीं। हमें देखना चाहिए कि क्या ऐसा है। यदि आपको लगता है कि ऐसा है तब देखना चाहिए कि क्यों है। बहरहाल नीचे सुनन्दा के दत्ता-राय के लेख का शुरूआती अंश पढ़ें। पूरी लेख पढ़ना चाहें तो उसकी कतरन भी है।

'A STUDY IN CONTRASTS

There is much that is wrong with India’s media.'

Unlike Wen Jiabao in India, Hu Jintao has not castigated his host country’s media. He wouldn’t dare. His responses to abrasive American reporters at Wednesday’s press conference in Washington mixed defensiveness, evasion and conciliation. In fact, he struck a conciliatory note even before the visit, telling The Washington Post and The Wall Street Journal in written answers to their questions, “There is no denying that there are some differences and sensitive issues between us. We both stand to gain from a sound China-US relationship, and lose from confrontation.”

India and China also stand to gain from a sound relationship, and lose from confrontation. Here, too, there are differences and sensitive issues. But Wen did not bother with the diplomatic niceties that his president employed in the United States of America. Why? One reason is that no Indian publication is any longer taken seriously as an interlocutor like the Post and Journal in the US. It was different in Jawaharlal Nehru’s time when the government paid heed to what newspapers like The Statesman published. His daughter’s attitude was described by her media adviser by quoting a 19th-century English poet, “Thou shalt not kill; but need’st not strive/ Officiously to keep alive.” The distance has widened since then and not only because of official indifference.

National papers of record have become vehicles of private interest. Some are trivial, some project a borrowed ideology, others are obsessed with what are called ‘Page Three people’. Even the nomenclature is imitative, for Page Three is the registered trademark of Britain’s Sun tabloid for its topless models. Here, the driving force is usually profit, not prurience. And it’s not only the owners. Wen is dismissive about media freedom and contemptuous about its “sensationalizing” because he knows his diplomats can buy favourable coverage by extending hospitality to leading commentators and doling out what passes for exclusive titbits of information. The Delhi missions of other countries with problematic relations with India may practise the same tactics but there is no hint of this in the current debate over “paid news” which the press council defines as “any news or analysis appearing in any media (print and electronic) for a price in cash or kind as consideration”.

टेलीग्राफ

लेखक प्रमोद जोशी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. करीब चार दशक से हिंदी मीडिया से जुड़े हुए हैं. हिन्‍दुस्‍तान में स्‍थानीय संपादक भी रह चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र लेखन कर रहे हैं. यह लेख उनके ब्‍लाग जिज्ञासा से साभार लिया गया है.


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Comments (1)Add Comment
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written by umesh shukla, January 24, 2011
aadarniya joshig aapne bilkul sach likha hai ki aaj ka sampadak apne ko kushal manager dikhane ko utawala hai taki naukari aur achchi aay vriddhi pakki rahe. yehi vajah hai ki aaj ke sampadakon ki drishti me lekhan banisbat gaun sa karya hai ve kewal danda phatkarte rahate hai, jyadatar sampadakon me se adhikansh kanaphusi aur management ki paitarenbaazi se jyada aur kuch nahi karte hain. vaise hai to yeh vidambanpurn lekin hai sach.

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