पत्रकारिता में नौकरी प्रथा खत्‍म होनी चाहिए

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प्रिय यशवंतजी, सर्वप्रथम आपको धन्यवाद आपकी पत्रकारिता जगत की खबरों के प्रभावी प्रस्तुतीकरण के लिए. लगभग 11 वर्षों से मैं इस जगत से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हूँ. एक बात जो व्‍यथित करती है और जब आपका ब्लॉग देखता हूँ तो बेचैनी बढ़ा देती है, वो है पत्रकारिता जगत के आपसी तालमेल और कार्यप्रणाली की. जितना पिछड़ा और शोषित मैं इस क्षेत्र को देखता हूँ उतना और कोई क्षेत्र मुझे दूसरा नहीं दिखाई देता. आपके ब्लॉग पर प्रकाशित होनेवाली आपसी छींटाकशी और इस जगत की विसंगतियों को उजागर करती खबरें इस बात का पुष्ट प्रमाण हैं.

अब समय आ गया है कि हम कम से कम इस जगत से नौकरी प्रथा को खत्म करें. यह एक अनावश्यक आडम्बर है, जिससे मालिक और नौकर दोनों को भारी नुकसान होता है. यदि हमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना है तो हमें पत्रकारिता जगत में work at  home की नीति अपनानी होगी. जो आज अमेरिका और यूरोप में प्रचलित है. इस आधुनिक युग में ऐसे तमाम संसाधन उपलब्ध हैं, जिनसे उच्च श्रेणी का काम घर से किया जा सकता है. कुछ मामलों में यह आज संभव न लगे परन्तु प्रिंट मीडिया में लगभग 82 प्रतिशत और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 52-55 प्रतिशत तक के मनुष्य बल को क्रियान्वित किया जा सकता है.

अगर बात प्रिंट मीडिया की करें तो अधिकांश काम व्यक्तिगत स्तर का होता है और जहाँ अन्य लोगों के हस्तक्षेप की जरूरत हो वहां- स्काइप, फेसबुक, ट्विटर, जीमेल ऑडियो-विडियो चैट ऐसे तमाम साधन उपलब्ध हैं, जिनसे सामूहिक स्तर पर एक साथ बात और विचार विनिमय हो सकता है और सुझाव चाहे निर्देश हो या डाक्‍यूमेंट, सभी ट्रान्सफर हो सकते हैं. केवल प्रिंटिंग और निरीक्षक के स्तर पर मनुष्‍य बल की आवश्यकता होगी.

इस कार्यप्रणाली की सबसे अच्‍छी बात ये है कि व्यक्ति की उपलब्धता 24 घंटों में से कम से कम 12 घंटे हो जाती है. वह जब भी काम करता है तो अपनी उर्जा के उच्च स्तर पर काम करता है. ट्रॉफिक जाम, देर से आना, काम को अगले दिन पर टालना जैसी बातों से भी दूर रहता है. इससे उसकी क्षमता बढ़ती है. साथ ही वह अपने पारिवारिक दयित्त्वों का भी निर्वहन भलीभांति कर सकता है.

मालिक के स्तर पर भी या काफी फायदेमंद सौदा है, क्योंकि इससे खर्च में औसतन 28-33 प्रतिशत तक की कमी आती है. जैसे बड़े-बड़े कारपोरेट हाउस की बजाय एक छोटे मुख्यालय से काम चल जायेगा. ऑनलाइन मॉनिटरिंग आसान और पारदर्शी भी है. इन सभी का रिकॉर्ड भी होता हैं और कार्य क्षमता का विवेचन भी किया जा सकता है. कर्मचारियों की उपलब्धता भी बढ़ती है और गति भी. किसी विवाद पर दोनों पक्ष अपनी बात आसानी से रख सकते हैं और उसके पुनः संवाद की आवश्यकता नहीं पड़ती. जिससे समय और खर्च दोनों बचता है.

एक उदाहरण के लिए- मान लीजिये मैं एक लेखक हूँ और मेरी तनख्वाह मासिक 20 हज़ार है. मुझे ऑफिस में जो जगह और संसाधन मुहैया कराया जाता है, उस पर औसतन मासिक आठ हज़ार खर्च होते हैं. अपनी छुट्टियों और वीकली ऑफ को जोडूं तो लगभग इस दौरान जो व्यक्ति मेरी जगह काम करता है, उस पर 4 हज़ार का खर्च होता है. इस तरह संस्‍थान लगभग 32 हज़ार मुझ पर मासिक खर्च करता है. और अगर मैं घर से काम करता हूँ तो उतनी ही तनख्वाह में और केवल 2 हज़ार संसाधन खर्च के नाम पर संस्‍थान मुझे मासिक 22 हज़ार देगा और बदले में मेरी उपलब्धता डेढ़ गुने की होगी. इस तरह मैं संस्‍थान को लगभग 30 हज़ार का काम दूंगा. क्योंकि ट्राफिक जाम, लंच, चाय, कॉफी का समय वैसे ही बचेगा, क्योंकि इसे अपनी सुविधानुसार मैं समायोजित कर सकूंगा. संस्‍थान का लगभग 30-35 प्रतिशत की बचत होगी. साथ ही कर्मचारी की सुरक्षा, कैब आदि की भी बचत होगी.

ये बात तो केवल मोटे तौर पर है हालाँकि विस्तार में यह लेख काफी लंबा होता. सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें व्यक्तिगत कार्य प्रणाली और प्रस्तुतीकरण की आजादी होगी. इससे अच्छे और कर्मठ लोग प्रमाणित होंगे. पारदर्शिता होने के कारण आपसी राजनीति पर लगाम लगेगी. आवागमन, मीटिंग, कैब, सुरक्षा, देरी आदि झंझटों से मुक्ति मिलेगी. और हमें एक अच्‍छी जीवन शैली मिलेगी. आशा करता हूँ कि इस दिशा में अब यह जगत विचार करेगा.

सतीश उपाध्‍याय

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