एफएम रेडियो पर बीबीसी यानि हिंदी जन से दूर बीबीसी

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शेषजी ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन के कई सेक्शन बंद किये जा रहे हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि हिन्दी सर्विस में भी बंदी का ऐलान कर दिया गया है. इसका मतलब यह हुआ कि बीबीसी रेडियो की हिंदी सर्विस को मार्च के अंत में बंद कर दिया जाएगा. बीबीसी की हिन्दी सेवा का बंद होना केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं है.

यह संस्कृति को प्रभावित करने वाला इतिहास का ऐसा मुकाम है जिसकी धमक बहुत दिनों तक महसूस की जायेगी. हालांकि इस बात में भी दो राय नहीं है कि बीबीसी की हिंदी सर्विस ने अपना वह मुकाम खो दिया है, जो उसको पहले हासिल था. पहले के दौर में बीबीसी की ख़बरों का भारत में बहुत सम्मान किया जाता था. 1975 में जब इमरजेंसी लगी और भारत की आकाशवाणी और दूरदर्शन इंदिरा सरकार की ढपली बजाने लगे तो जो कुछ भी सही खबरें इस देश के आम आदमी के पास पहुंचीं वे सब बीबीसी की कृपा से ही पहुंचती थीं. इसके अलावा भी देश के हिन्दी भाषी इलाकों में रेडियो के श्रोताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग है, जिसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बीबीसी रेडियो पर हिन्दी खबरें सुनना  एक ज़रूरी काम की तरह है. उत्तर प्रदेश और बिहार में पढ़े-लिखे लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग है जिसके लिए कोई भी सूचना खबर नहीं बनती, जब तक कि उसे बीबीसी पर न सुन लिया जाए. इस तरह की संस्था का बंद होना निश्चित रूप से इस देश के लिए दुःख की बात है.

पता चला है कि बीबीसी हिन्दी की वेब खबरों का सिलसिला जारी रहेगा. लेकिन अभी वेब का नाम उतना नहीं है कि वह लोगों की आदत में शुमार हो सके. अपने देश में बीबीसी की विश्वसनीयता बहुत ज्यादा थी. हालांकि बाद के दिनों में यह थोड़ी कम हो गयी थी लेकिन पत्रकारिता के सर्वोच्च मानदंडों का वहां हमेशा ख्याल रखा जाता था. मैंने अपने बचपन में देखा था कि जब दो लोग बहस कर रहे हों और बात सहमति पर न पहुंच रही हो तो कोई एक पक्ष बीबीसी का नाम लेकर बहस को समाप्त कर देता था. अगर आप मेरी बात नहीं मान रहे हैं और मैं कह दूं कि मैंने यह बात बीबीसी पर सुनी है तो अगले की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि बहस को आगे बढाए.

पहले के ज़माने में चुनाव पूर्व सर्वे या एक्जिट पोल नहीं होते थे. ज़्यादातर अखबार अपने आकलन देते थे और बीबीसी ने अगर कभी कोई आकलन दे दिया तो उस पर सबको विश्वास हो जाता था. बीबीसी का इस्तेमाल आरएसएस ने भी खूब किया. 1991 में जब मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए जुटी भीड़ पर गोलियां चलवा दी थीं तो आरएसएस के प्रिय अखबारों ने खबर दी कि अयोध्या में सरजू नदी में इतना खून बह गया था कि वह लाल हो गयी थी तो उन खबरों का तब तक विश्वास नहीं किया गया जब तक कि उन खबरों के साथ-साथ यह अफवाह फैलाने वालों को नहीं लगाया गया. भाइयों ने अफवाह फैला दी कि यह खबर बीबीसी पर सुनी गयी थी. पूरा देश तो बीबीसी सुनता नहीं लेकिन बीबीसी के नाम पर इस देश का आम आदमी झूठ पर भी विश्वास कर लेता था.

नेताओं ने कई बार देश में दंगे फैलाने के लिए बीबीसी का इस्तेमाल किया है. अफवाह फैला दी जाती थी कि फलां खबर बीबीसी पर सुनी है बस फिर क्या था. उस खबर को सच मान कर प्रतिक्रिया होती थी और कई बार तो दंगे भी शुरू हो जाते थे. इंदिरा गाँधी की मौत की खबर सबसे पहले बीबीसी ने ही दी थी और उसके बाद जो सिखों का क़त्ले आम कांग्रेस के दिल्ली वाले नेताओं ने करवाया, उसमें भी बीबीसी का इस्तेमाल किया गया. हुआ यह कि दुष्टों ने प्रचार करवा दिया कि बीबीसी में खबर आई है कि कुछ इलाकों में सिखों ने इंदिरा गाँधी के क़त्ल के बाद मिठाई बांटी. ऐसा बीबीसी ने कभी नहीं कहा था लेकिन उस पर लोगों का भरोसा इतना था कि बात फैल गयी. यहाँ इन बातों को बताने का उद्देश्य केवल इतना है कि कि बीबीसी इस देश में हमेशा ही एक भरोसेमंद संवाद का सोर्स रहा है और अब उसके बंद हो जाने पर ग्रामीण भारत में खबरें सुनने और विश्वास करने का फैशन बदल जाएगा.

एक व्यक्तिगत अनुभव भी है. मेरी आवाज़ बीबीसी के सुबह के प्रोग्राम में कई साल तक सुनी जाती रही थी. कई बार ऐसा हुआ कि जब भी मैंने किसी ट्रेन में या किसी पूछताछ दफ्तर में बात की तो लोगों ने आवाज़ पहचान ली और सम्मान दिया. यह मेरा निजी सम्मान नहीं होता था. यह बीबीसी की विश्वसनीयता पर आम आदमी के भरोसे की मुहर लगती थी. अब वह सब नहीं होगा. अप्रैल के बाद से बीबीसी की हिन्दी सर्विस इतिहास के कोख में जा छुपेगी. हालांकि बीबीसी के एफएम रेडियो पर हिन्दी बोली तो जायेगी, लेकिन बीबीसी हिन्दी के खबरें अब इस देश के हिन्दी जानने वाले के लिए सपना हो जायेंगी. इतिहास हो जायेंगी.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने जर्नलिस्ट हैं.


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